पर्यटन, पर्वतारोहण, खेती और कचरे से निकलने वाले प्लास्टिक कण हिमालयी पर्यावरण में लगातार पहुंच रहे हंं और प्रदूषण बढ़ा रहे। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
प्रदूषण

हिमालय की बर्फ और ग्लेशियरों तक पहुंचा प्लास्टिक, जल सुरक्षा व पर्यावरण पर बढ़ा खतरा

हिमालय की बर्फ, नदियों और मिट्टी में पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक, एशिया के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और पर्यावरण पर बढ़ा गंभीर खतरा

Dayanidhi

  • 562 अध्ययनों की समीक्षा में हिंदू कुश हिमालय की बर्फ, ग्लेशियर, नदियों और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण सामने आया।

  • पर्यटन, पर्वतारोहण, खेती और कचरे से निकलने वाले प्लास्टिक कण हिमालयी पर्यावरण में लगातार पहुंच रहे हंर और प्रदूषण बढ़ा रहे।

  • हवा और मानसूनी हवाएं मैदानी शहरों तथा औद्योगिक क्षेत्रों से माइक्रोप्लास्टिक कणों को ऊंचे हिमालयी इलाकों तक पहुंचाती हैं।

  • ग्लेशियरों पर जमा माइक्रोप्लास्टिक बर्फ की सतह प्रभावित कर सकता है, जबकि पिघलती बर्फ कणों को नदियों तक पहुंचाती है।

  • विशेषज्ञों ने प्लास्टिक कचरा घटाने, बेहतर निगरानी, कृषि में प्लास्टिक नियंत्रण और क्षेत्रीय सहयोग को जरूरी कदम बताया है।

हिमालय को दुनिया की सबसे स्वच्छ और प्राकृतिक पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है। लेकिन अब यहां भी प्रदूषण का एक नया खतरा तेजी से बढ़ रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की बर्फ, ग्लेशियर, नदियों, मिट्टी और आसपास के पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच चुका है। माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से छोटे कण होते हैं।

हिंदू कुश हिमालय को ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है, क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां एशिया के करोड़ों लोगों के लिए पानी का प्रमुख स्रोत हैं। इस क्षेत्र से गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, मेकांग, यांग्त्जे और येलो नदी जैसी बड़ी नदियां निकलती हैं। इसलिए हिमालय में बढ़ता प्रदूषण केवल पहाड़ों की समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

562 अध्ययनों का किया गया विश्लेषण

शोधकर्ताओं ने इस विषय पर प्रकाशित 562 अध्ययनों की समीक्षा की है। इस काम में भारत, जापान, ताइवान और हिमालयी क्षेत्र से जुड़े कई शोध संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल रहे। अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत, उसके फैलाव और पर्यावरण पर उसके होने वाले प्रभावों को एक साथ समझने की कोशिश की गई है।

एनवायर्नमेंटल सस्टेनेबिलिटी नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल शहरों या समुद्रों तक सीमित नहीं है। यह ऊंचे पर्वतीय इलाकों और ग्लेशियरों तक भी पहुंच रहा है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए स्थानीय गतिविधियों के साथ-साथ हवा और पानी के जरिए होने वाले दूर-दराज के प्रदूषण को भी जिम्मेदार बताया है।

पर्यटन और खेती भी बड़ा कारण

हिमालय में बढ़ता पर्यटन माइक्रोप्लास्टिक का एक महत्वपूर्ण स्थानीय स्रोत बन रहा है। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण, धार्मिक यात्राओं और पर्यटक गतिविधियों के दौरान बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। यदि इस कचरे का सही तरीके से निपटारा नहीं किया जाए तो वह टूटकर छोटे-छोटे कणों में बदल सकता है।

कई ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कैंप और बस्तियों के आसपास प्लास्टिक प्रदूषण अधिक पाया गया है। इसके अलावा खेती में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक शीट, सिंचाई की पाइप और खाद की प्लास्टिक पैकिंग भी समय के साथ टूटकर मिट्टी और पानी में पहुंच सकती है।

हवा भी ला रही है प्रदूषण

माइक्रोप्लास्टिक के हिमालय तक पहुंचने का एक दूसरा रास्ता हवा है। मैदानी इलाकों के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले हल्के प्लास्टिक कण तेज हवाओं के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं। मानसूनी हवाएं और पश्चिमी हवाएं भी इन कणों को ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचा सकती हैं।

इसका मतलब है कि किसी दूर-दराज के ग्लेशियर में मिला माइक्रोप्लास्टिक जरूरी नहीं कि वहीं पैदा हुआ हो। वह सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर किसी इलाके से हवा के साथ वहां पहुंच सकता है।

ग्लेशियरों पर भी असर की आशंका

बर्फ और ग्लेशियरों पर जमा होने वाले माइक्रोप्लास्टिक को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ रही है। जब ये कण बर्फ की सतह पर जमा होते हैं तो वे सतह के रंग और सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इससे बर्फ अधिक गर्मी सोख सकती है।

हालांकि माइक्रोप्लास्टिक का ग्लेशियर पिघलने में कितना योगदान है, इसे स्पष्ट रूप से समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। ग्लेशियरों के पिघलने में तापमान वृद्धि और ब्लैक कार्बन जैसे अन्य कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

नदियों और जीव-जंतुओं के लिए चिंता

ग्लेशियर और बर्फ पिघलने के साथ जमा माइक्रोप्लास्टिक नदियों में पहुंच सकता है। इन कणों को छोटे जलीय जीव और मछलियां भोजन समझकर निगल सकती हैं। इससे उनके पाचन तंत्र और स्वास्थ्य पर असर पड़ने की आशंका है।

मिट्टी में पहुंचने वाला माइक्रोप्लास्टिक भी उसकी संरचना, पानी रोकने की क्षमता और पोषक तत्वों के संतुलन को बदल सकता है। इसका असर खेती और स्थानीय जैव विविधता पर पड़ सकता है।

अभी भी कई सवाल बाकी

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र में अभी काफी जानकारी जुटाना बाकी है। अलग-अलग अध्ययनों में नमूने लेने और माइक्रोप्लास्टिक की जांच करने के तरीके अलग रहे हैं। इसलिए विभिन्न स्थानों के आंकड़ों की सीधी तुलना करना मुश्किल है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय में प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए कचरा प्रबंधन मजबूत करना, पर्यटन क्षेत्रों में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना, कृषि में प्लास्टिक के बेहतर विकल्प अपनाना और अलग-अलग देशों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है।

हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों का समूह नहीं है। यह एशिया की बड़ी नदियों और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। इसलिए यहां बढ़ता माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण इस बात की चेतावनी है कि दुनिया के सबसे दूरस्थ प्राकृतिक क्षेत्र भी मानव गतिविधियों से अछूते नहीं रहे हैं।