अवैध खनन का खेल; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
खनन

सिंगरौली में अवैध बालू खनन पर एनजीटी सख्त: प्रशासन-खनन माफिया के गठजोड़ पर गिरेगी गाज

सिंगरौली में अवैध बालू खनन से सूखती नदी, कटते जंगल और बिगड़ते पर्यावरण पर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • मध्य प्रदेश के सिंगरौली में कथित अवैध बालू खनन और उससे हो रहे पर्यावरणीय विनाश पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।

  • एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की है, जो हरहवा, पिपराकुंड, ओरगई, कंदोपानी और उर्ती समेत प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर वास्तविक स्थिति की जांच करेगी।

  • ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण मंत्रालय, जिला प्रशासन और खनन निगम सहित कई एजेंसियों को नोटिस भी जारी किए हैं।

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों और निजी ठेकेदारों की मिलीभगत या लापरवाही के चलते पट्टा सीमाओं से बाहर भारी मशीनों द्वारा नदी के भीतर तक रेत खनन किया जा रहा है। इससे नदियां सूख रही हैं, पानी प्रदूषित हो रहा है और जलीय जैव विविधता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

  • साथ ही अवैध रेत परिवहन के लिए जंगलों में रास्ते बनाकर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वन भूमि पर अतिक्रमण किए जाने के आरोप भी लगे हैं। यह मामला अब सिर्फ अवैध खनन का नहीं, बल्कि सिंगरौली की नदियों, जंगलों और पर्यावरणीय अस्तित्व को बचाने की लड़ाई बन चुका है।

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिला में अवैध बालू खनन और उससे हो रहे पर्यावरणीय नुकसान के आरोपों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए 15 मई 2026 को एनजीटी की केंद्रीय पीठ ने दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। समिति को हरहवा, पिपराकुंड, ओरगई, कंदोपानी, उर्ती और आसपास के ग्राम पंचायत क्षेत्रों में मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का जायजा लेने और की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं।

ट्रिब्यूनल ने इस मामले में कई सरकारी एजेंसियों को नोटिस जारी किया है। इनमें मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, सिंगरौली के जिला मजिस्ट्रेट, मध्य प्रदेश राज्य खनन निगम और मध्य प्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण शामिल हैं।

यह पूरा मामला सिंगरौली जिले के हरहवा, पिपराकुंड, ओरगई, कंदोपानी और उर्ति गांवों समेत आस-पास की कई ग्राम पंचायतों से जुड़ा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दायर एक याचिका में आरोप लगाया गया है कि क्षेत्र में सरकारी तंत्र और निजी खनन ठेकेदारों के बीच एक गहरा गठजोड़ काम कर रहा है।

खनन माफिया और सिस्टम की नाकामी?

आरोप है कि अधिकारियों और निजी ठेकेदारों की मिलीभगत या नाकामी से स्वीकृत पट्टा क्षेत्र की सीमाओं को लांघकर भारी मशीनों के जरिए रेत खनन किया जा रहा है। इसमें नदी के भीतर मशीनों से हो रहा खनन भी शामिल है, जिससे पर्यावरण को गंभीर और अपूरणीय क्षति पहुंच रही है।

बताया गया है कि भारी-भरकम मशीनों से नदी तल पर हो रही अवैध गतिविधि से न केवल नदी का पानी सूख रहा है, बल्कि वो अत्यधिक प्रदूषित भी हो चुका है। इसका सीधा असर जलीय जैव विविधता पर पड़ा है और पानी में रहने वाले जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।

क्या अवैध परिवहन के लिए काटे गए पेड़

इतना ही नहीं, रेत के अवैध परिवहन के लिए जंगलों के बीच से जबरन रास्ते बनाए जा रहे हैं, जिसके लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई है और वन भूमि पर धड़ल्ले से अतिक्रमण जारी है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस गंभीर विषय पर स्थानीय प्रशासन से लेकर संबंधित विभागों तक कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन अधिकारियों ने आंखें मूंद रखी हैं। यह लापरवाही जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अपने कानूनी और वैधानिक कर्तव्यों से पूरी तरह मुंह मोड़ने जैसी है। इससे पर्यावरण कानूनों के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सच कहें तो सिंगरौली का यह मामला सिर्फ अवैध बालू खनन का नहीं, बल्कि उन नदियों, जंगलों और गांवों के अस्तित्व से जुड़ा सवाल है, जिन्हें मुनाफे की अंधी दौड़ में लगातार उजाड़ा जा रहा है।

अब सबकी नजरें एनजीटी की जांच समिति और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या सचमुच पर्यावरण कानूनों की धज्जियां उड़ाने वाले खनन माफिया और उनके संरक्षण में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिरेगी, या फिर प्रकृति की कीमत पर चलता यह खेल यूं ही जारी रहेगा।