स्वास्थ्य

खामोश जहर, छिनता बचपन: हर साल 35 लाख से अधिक मौतों की वजह बन रहा है सीसा

सीसे के संपर्क में आने से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 18 से 24 अक्टूबर तक ‘अंतरराष्ट्रीय सीसा विषाक्तता रोकथाम सप्ताह’ मनाया जा रहा है

Lalit Maurya

  • सीसा एक ऐसा खामोश जहर है, जो रोजमर्रा की चीजों के जरिए शरीर में पहुंचकर सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल 35 लाख से अधिक मौतों के लिए कहीं न कहीं सीसा जिम्मेवार है, जबकि करोड़ों बच्चे इसके खतरे का सामना कर रहे हैं।

  • बच्चों के लिए इसका असर विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यह उनके मस्तिष्क, सीखने-समझने की क्षमता और शारीरिक विकास को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। वयस्कों में भी इसके संपर्क से हृदय और गुर्दों से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ता है।

  • सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सीसे के संपर्क के लक्षण कई बार दिखाई नहीं देते और नुकसान का पता देर से चलता है।

  • इसके बावजूद, दुनिया के आधे से भी कम देशों में सीसायुक्त पेंट पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नियंत्रण की पुष्टि हुई है। इसी खतरे को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने देशों से सीसे के स्रोतों को खत्म करने, नियमों को सख्ती से लागू करने और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की अपील की है।

रसोई के चमकते बर्तन, बच्चों की खिलखिलाहट से सजे रंग-बिरंगे खिलौने, खाने का स्वाद बढ़ाते मसाले और घर की दीवारों पर चढ़ा खूबसूरत पेंट... ये सभी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन्हीं चीजों के जरिए एक खतरनाक जहर हमारे शरीर में दाखिल हो सकता है? इस जहर का नाम है सीसा यानी 'लेड'। आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर में हर साल 35 लाख मौतों के लिए कहीं न कहीं लेड जिम्मेवार है।

यह एक ऐसा अदृश्य खतरा है, जो न केवल हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी गहरा असर डाल सकता है। इससे उनकी सीखने-समझने की क्षमता से लेकर व्यवहार और शारीरिक विकास तक पर असर पड़ सकता है।

इसका असर बड़ों के दिल और गुर्दों पर भी पड़ता है। सबसे डरावनी बात यह है कि सीसे के संपर्क में आने के बाद कई बार कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, जबकि शरीर के भीतर नुकसान जारी रहता है। और जब तक इसका पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी हो सकती है। मतलब कि किसी 'अदृश्य दीमक' की तरह यह धीरे-धीरे हमारी सेहत को खोखला कर सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, सीसे का संपर्क दुनिया भर में हर साल 35 लाख से अधिक मौतों की वजह बन रहा है, जबकि करोड़ों बच्चे इस जहरीली धातु की चपेट में आने के खतरे का सामना कर रहे हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि सीसे से होने वाले इस नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके बावजूद, दुनिया के अनेक देशों में सीसे के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है। नतीजतन, रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली चीजों के जरिए यह जहरीली धातु लोगों के शरीर में पहुंच रही है और सेहत के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है।

इसी को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने देशों से सीसे के प्रदूषण को रोकने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की अपील की है। गौरतलब है कि सीसे के जहरीले प्रभावों से लोगों को बचाने और इसके संपर्क से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 18 से 24 अक्टूबर तक ‘अंतरराष्ट्रीय सीसा विषाक्तता रोकथाम सप्ताह’ मनाया जा रहा है।

इस वर्ष की थीम है, ‘पता लगाने से रोकथाम तक’। संदेश स्पष्ट है—लोगों के शरीर में सीसा पहुंचने के बाद उसका पता लगाने के बजाय उन स्रोतों को ही खत्म किया जाए, जहां से यह जहर उनके जीवन में प्रवेश करता है।

बच्चों के मस्तिष्क पर ऐसा असर, जिसकी भरपाई मुश्किल

सीसा एक ऐसी विषैली धातु है, जिसका संपर्क कई रोजमर्रा की वस्तुओं और पर्यावरणीय स्रोतों के जरिए हो सकता है। इसकी थोड़ी-सी मात्रा भी शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इसके संपर्क का कोई ऐसा स्तर ज्ञात नहीं है जिसे पूरी तरह सुरक्षित माना जा सके। बच्चों में इसका असर विशेष रूप से गंभीर होता है, क्योंकि उनका मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र अभी विकसित हो रहे होते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक सीसे के संपर्क से बच्चों की सीखने और समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। उनके व्यवहार और विकास में समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जिनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है। कई मामलों में नुकसान स्थाई होता है और उसे पूरी तरह ठीक करना संभव नहीं होता।

हालांकि खतरा केवल बच्चों तक सीमित नहीं। वयस्कों में भी सीसे के संपर्क से हृदय संबंधी बीमारियों और गुर्दों को नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ सकता है। यानी यह जहरीली धातु शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सीसे के संपर्क में आने के बाद हमेशा लक्षण तुरंत दिखाई नहीं देते। ऐसे में व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि उसके शरीर को नुकसान पहुंच रहा है। जब तक समस्या की पहचान होती है, तब तक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ चुका होता है।

आधे से भी कम देशों में सीसायुक्त पेंट पर कानूनी रोक

भले ही सीसे के खतरे को दशकों से पहचाना जाता रहा है, लेकिन इसे रोकने के लिए दुनिया भर में किए गए प्रयास अभी काफी नहीं हैं। डब्ल्यूएचओ के नवीनतम प्रकाशित वैश्विक आकलन के अनुसार, आधे से भी कम देशों में सीसायुक्त पेंट पर रोक लगाने वाले कानूनी रूप से बाध्यकारी नियमों की पुष्टि हुई है।

यह स्थिति बताती है कि लोगों को ऐसे उत्पादों से बचाने के लिए अभी काफी काम किया जाना बाकी है, जिनके इस्तेमाल से सीसा उनके शरीर तक पहुंच सकता है।

डब्ल्यूएचओ के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन हेल्थ विभाग के कार्यवाहक निदेशक ब्रूस गॉर्डन का कहना है, सीसे के संपर्क में आने के कई प्रमुख स्रोतों की पहचान हो चुकी है और इससे बचाव के प्रभावी तरीके भी मौजूद हैं।

ऐसे में अब देशों को ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि रोजमर्रा के उत्पादों और पर्यावरण में मौजूद सीसे को खत्म किया जा सके। मकसद साफ है, सीसे को बच्चों के शरीर में पहुंचने से पहले ही रोकना, ताकि यह उनके स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को नुकसान न पहुंचा सके।

2027 में वैश्विक कार्ययोजना और तकनीकी दिशा-निर्देश

सीसे से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए डब्ल्यूएचओ वैश्विक स्तर पर प्रयास तेज करने की तैयारी कर रहा है। सदस्य देशों ने सीसे के संपर्क को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता मानते हुए संगठन को इसके दुष्प्रभावों में कमी लाने के लिए एक वैश्विक कार्ययोजना तैयार करने की अपील की है। इस योजना को 2027 में विश्व स्वास्थ्य सभा के सामने पेश किया जाएगा।

इसके अलावा, डब्ल्यूएचओ ने सीसा विषाक्तता की रोकथाम के लिए 2027 में एक ‘तकनीकी पैकेज’ भी जारी करने की बात कही है। इसके जरिए देशों को यह पहचानने में मदद मिलेगी कि सीसे के संपर्क के सबसे बड़े स्रोत कौन-से हैं, किन उपायों से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है और नियमों को प्रभावी ढंग से कैसे लागू किया जाए।

इसमें सीसे के संपर्क की निगरानी करने और रोकथाम के प्रयासों की प्रगति को मापने के लिए भी व्यावहारिक दिशा-निर्देश दिए जाएंगे। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक जानकारी को ऐसे ठोस कदमों में बदलना है, जिनसे बीमारियों और समय से पहले होने वाली मौतों को रोका जा सके।

भारत समेत कई देशों में रक्त जांच की क्षमता बढ़ाने की पहल

सीसे के संपर्क का समय रहते पता लगाने के लिए रक्त में इसकी मात्रा की जांच करना महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से डब्ल्यूएचओ ने पिछले वर्ष अपने साझेदारों के साथ मिलकर ‘लीड पॉइजनिंग प्रिवेंशन इनिशिएटिव’ के तहत प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने और रक्त में सीसे की जांच की व्यवस्था मजबूत करने की पहल की थी।

इस कार्यक्रम के तहत ब्राजील, भारत और नेपाल के अलावा उप-सहारा अफ्रीका के छह देशों इथियोपिया, घाना, मलावी, रवांडा, दक्षिण अफ्रीका और तंजानिया में तकनीकी सहायता और प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने पर काम किया जाएगा।

इससे सीसे के संपर्क का पता लगाने और उसकी निगरानी करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, केवल जांच की व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ उन स्रोतों पर रोक लगाना भी जरूरी है, जिनके जरिए यह जहरीली धातु लोगों तक पहुंचती है।

सीसे के खतरे को रोकने के लिए क्या करना होगा?

डब्ल्यूएचओ ने अंतरराष्ट्रीय सीसा विषाक्तता रोकथाम सप्ताह के दौरान सरकारों, उद्योगों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नागरिक संगठनों और समुदायों से मिलकर काम करने का आह्वान किया है। इसके लिए कुछ प्रमुख कदम जरूरी हैं:

  • खतरनाक उत्पादों पर रोक: पेंट और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं में सीसे के इस्तेमाल से पैदा होने वाले जोखिम को खत्म करना।

  • कानूनों का प्रभावी पालन: सीसे के इस्तेमाल पर नियंत्रण के लिए मजबूत नियम बनाना और उनका सख्ती से क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।

  • निगरानी और जांच: सीसे के संपर्क के स्रोतों की पहचान करना और रक्त में इसकी मात्रा की जांच की सुविधा बढ़ाना।

  • सुरक्षित औद्योगिक प्रक्रियाएं: उद्योगों और कचरा पुनर्चक्रण से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना।

  • जन-जागरूकता: लोगों को सीसे के स्रोतों, उसके स्वास्थ्य संबंधी खतरों और बचाव के उपायों की जानकारी देना।

  • बच्चों की सुरक्षा: बच्चों और अन्य संवेदनशील समूहों को सीसे के संपर्क से बचाने को प्राथमिकता देना।

सच कहें तो सीसे के प्रदूषण को रोकने का फायदा केवल बीमारियों और मौतों में कमी तक सीमित नहीं है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च घट सकता है, बच्चों की पढ़ाई और सीखने की क्षमता बेहतर हो सकती है और समाज को लंबे समय में आर्थिक लाभ मिल सकता है।

देखा जाए तो सीसे का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इसका नुकसान अक्सर तब तक दिखाई नहीं देता, जब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए जरूरत केवल यह जानने की नहीं है कि कौन इसके संपर्क में आया है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि सीसा लोगों के घरों, रोजमर्रा के उत्पादों और आसपास के पर्यावरण में मौजूद ही न रहे। बच्चों के स्वस्थ बचपन और सुरक्षित भविष्य के लिए यही सबसे प्रभावी रास्ता है।