रिपोर्ट से पता चला है कि पुडुचेरी के लोग सालाना औसतन 92 घंटे, आंध्र प्रदेश के 88.6 घंटे और केरल के 88.3 घंटे की नींद गर्म रातों के कारण गंवा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से अतिरिक्त नींद की कमी तमिलनाडु (7.9 घंटे) और कर्नाटक (7.8 घंटे) में सबसे अधिक दर्ज की गई। महानगरों में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां हर व्यक्ति सालाना 93 घंटे तक कम सो पा रहा है। मुंबई (84 घंटे), कोलकाता (80 घंटे) और दिल्ली (66 घंटे) भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
जलवायु

बढ़ती गर्मी से हर साल 93 घंटे तक कम हो रही एक आम भारतीय की नींद, दक्षिण भारत सबसे प्रभावित

भारत के दक्षिणी हिस्सों में रहने वाले लोग हर साल औसतन 91 घंटे तक की नींद सिर्फ तपती रातों की वजह से खो रहे हैं। इनमें से 8 से 9 घंटे की नींद तो सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है।

Lalit Maurya

  • भीषण गर्मी अब सिर्फ दिन की परेशानी नहीं रही, बल्कि रातों की सुकून भरी नींद भी छीन रही है। नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया है जहां लोग सबसे अधिक नींद खो रहे हैं।

  • सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत में दिख रहा है। पुडुचेरी के लोग सालाना औसतन 92 घंटे, आंध्र प्रदेश के 88.6 घंटे और केरल के 88.3 घंटे की नींद गर्म रातों के कारण गंवा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से अतिरिक्त नींद की कमी तमिलनाडु (7.9 घंटे) और कर्नाटक (7.8 घंटे) में सबसे अधिक दर्ज की गई।

  • महानगरों में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां हर व्यक्ति सालाना 93 घंटे तक कम सो पा रहा है। मुंबई (84 घंटे), कोलकाता (80 घंटे) और दिल्ली (66 घंटे) भी इस संकट से अछूते नहीं हैं।

  • यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन करोड़ों परिवारों की हकीकत है जो बिना एसी-कूलर के तपती रातों में सोने को मजबूर हैं।

  • विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि लगातार नींद की कमी से उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह, मानसिक तनाव और कार्यक्षमता में गिरावट का खतरा बढ़ता है। साफ है कि जलवायु परिवर्तन अब पर्यावरण ही नहीं, हर भारतीय के बेडरूम और सेहत तक पहुंच चुका है।

दिन भर की भाग दौड़ और भीषण गर्मी के बाद जब इंसान बिस्तर पर लेटता है, तो सुकून की नींद की उम्मीद करता है। लेकिन बढ़ती गर्मी आम आदमी से यह सुकून भी छीन रही है। सच कहें तो भारत में तपती रातें अब सिर्फ बेचैनी नहीं, बल्कि सेहत पर भी हमला कर रही हैं।

इस बारे में जारी एक नई वैश्विक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत जलवायु परिवर्तन के कारण नींद खोने वाले दुनिया के सबसे प्रभावित देशों में शामिल हो गया है।

चिंता की बात है कि इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत के राज्यों और बड़े शहरों में देखा गया है, जहां गर्म और उमस भरी रातें लोगों की नींद और स्वास्थ्य दोनों पर भारी पड़ रही हैं। क्लाइमेट सेंट्रल ने अपनी नई रिपोर्ट में जानकारी दी है कि भारत के दक्षिणी हिस्सों में रहने वाले लोग हर साल औसतन 78 से 91 घंटे तक की नींद सिर्फ तपती रातों की वजह से खो रहे हैं।

इनमें से 8 से 9 घंटे की नींद तो सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है। यह स्थिति भारत को मध्य पूर्व के बाहर दुनिया के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में शामिल करती है।

दक्षिण भारत बना 'स्लीप लॉस' का हॉटस्पॉट

रिपोर्ट के अनुसार गर्मी और तापमान बढ़ने से तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के लोगों की नींद में सबसे ज्यादा कमी दर्ज की गई है। हालात यह हैं कि लगातार गर्म और उमस भरी रातें लोगों को पूरी नींद नहीं लेने दे रही, जबकि जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।

इसका सबसे ज्यादा असर पुडुचेरी में दर्ज किया गया, जहां हर व्यक्ति औसतन 92 घंटे की नींद सालभर में खो देता है। इसके बाद आंध्र प्रदेश (88.6 घंटे) और केरल (88.3 घंटे) का स्थान है।

तमिलनाडु पर सबसे ज्यादा पड़ा जलवायु परिवर्तन का असर

जलवायु परिवर्तन से नींद में होने वाली अतिरिक्त कमी के मामले में तमिलनाडु देश में सबसे आगे है। यहां हर व्यक्ति की करीब 7.9 घंटे की अतिरिक्त नींद केवल जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है।

ठंडे मौसम के लिए जाने जाने वाले कर्नाटक में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां क्लाइमेट चेंज की वजह से लोग सालाना 7.8 घंटे की नींद खो रहे हैं। वहीं मरुस्थलीय राज्य राजस्थान में यह आंकड़ा 7 घंटे है।

जबकि महाराष्ट्र के 22 शहरों के विश्लेषण से पता चला कि वहां के लोग हर साल औसतन 76.3 घंटे की नींद खो रहे हैं, जिनमें 5.8 घंटे का नुकसान सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी लोग सालाना करीब 69 घंटे की नींद खो रहे हैं, जिनमें 4.9 घंटे जलवायु परिवर्तन की वजह से कम हो रहे हैं।

बड़े शहरों की रातें भी बन रहीं बेचैन

रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख महानगरों में लोग हर साल औसतन 65 से 93 घंटे तक की नींद खो रहे हैं। इन शहरों में चेन्नई सबसे अधिक प्रभावित है, जहां हर व्यक्ति सालाना औसतन 93 घंटे की नींद गंवा रहे हैं। इनमें 5 घंटे सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण हैं। मुंबई में यह आंकड़ा 84 घंटे और कोलकाता में 80 घंटे रिकॉर्ड किया गया है।

इसी तरह बेंगलुरु में जलवायु परिवर्तन का असर सबसे तेज दिखा, जहां हर साल 8 घंटे अतिरिक्त नींद की कमी केवल बदलती जलवायु से जुड़ी है। वहीं हैदराबाद में यह नुकसान 7 घंटे, जबकि अहमदाबाद और पुणे में 6-6 घंटे है।

दिल्ली में कुल नींद की कमी अपेक्षाकृत कम (66 घंटे) रही, लेकिन यहां भी 5 घंटे की अतिरिक्त नींद जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है।

कंक्रीट के जंगल और सुलगती रातें

देखा जाए तो यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि देश के करोड़ों आम परिवारों की रोजमर्रा की कहानी है। बड़े शहरों में बन चुके कंक्रीट के जंगल (अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट) दिन भर की धूप को सोख लेते हैं और सूरज ढलने के बाद भी गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते। नतीजा यह होता है कि रातें ठंडी होने के बजाय सुलगती रहती हैं।

इस बदलते मौसम की सबसे भारी कीमत समाज का वो तबका चुका रहा है जो सबसे कमजोर है, बुजुर्ग, महिलाएं, झुग्गियों या तंग कमरों में रहने वाले कमजोर परिवार और वे लोग जिनके पास तपती रातों से बचने के लिए एसी या कूलर जैसी सुविधाएं नहीं हैं।

नींद की कमी से सिर्फ थकान नहीं, गंभीर बीमारी का भी खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी नींद शरीर और दिमाग दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन गर्म रातें शरीर को ठंडा होने और दिनभर की थकान से उबरने का मौका ही नहीं देतीं।

इससे उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, कमजोर प्रतिरक्षा, मानसिक तनाव, याददाश्त में कमी, दुर्घटनाओं का खतरा और कार्यक्षमता में गिरावट जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लगातार नींद पूरी न होने से सोचने-समझने की क्षमता कमजोर होती है, मानसिक तनाव और डिप्रेशन बढ़ता है, और शरीर की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) घटती है।

लंबे समय तक 7 घंटे से कम सोने का सीधा संबंध दिल की बीमारियों, स्ट्रोक, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापे से है। रात में जब तापमान कम नहीं होता, तो इंसानी शरीर को दिन भर की गर्मी से उबरने का मौका नहीं मिलता। यह स्थिति बुजुर्गों, नवजात शिशुओं और गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक है।

पांच दशकों में दोगुना हुआ संकट

रिपोर्ट से पता चला है कि न केवल भारत बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी लोगों की नींद पर गर्मी और जलवायु परिवर्तन ने असर डाला है। इस रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार, 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नींद की कमी करीब-करीब हर बड़े शहर में दोगुणी हो चुकी है।

2020-2025 के दौरान दुनिया में औसतन हर व्यक्ति ने गर्म रातों के कारण करीब 56 घंटे की नींद खोई, जिनमें 10 फीसदी से अधिक नुकसान सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा पाया गया। हालात यह हैं कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों को अंधाधुंध जलाने और जंगलों के सफाए ने पूरी दुनिया में रातों को गर्म कर दिया है।

ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और शहरों को गर्मी से बचाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में रातें और गर्म होंगी तथा लोगों की नींद, स्वास्थ्य और उत्पादकता पर इसका असर और गंभीर पड़ेगा।

ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ एलायंस से जुड़ी डॉक्टर कर्टनी हॉवर्ड इस बारे में चेताती हैं कि वयस्कों को स्वस्थ रहने के लिए 7 से 9 घंटे की नींद बेहद जरूरी है। यदि जलवायु परिवर्तन की इस रफ्तार को रोकने के लिए दुनिया ने सख्त कदम नहीं उठाए, तो यह न सिर्फ स्वास्थ्य पर असर डालेगा, बल्कि लोगों की काम करने की क्षमता और अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचाएगा।

रातों का यह बढ़ता तापमान एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ बाढ़, सूखा, ग्लेशियर पिघलने या जंगलों की आग तक सीमित नहीं है, यह हमारे बेडरूम तक पहुंच चुका है और हमारी सेहत की सबसे बुनियादी जरूरत, यानी सुकून भरी नींद पर भी डाका डाल रहा है।