हिमालय पर जमा बर्फ सिर्फ पहाड़ों की खूबसूरती नहीं बढ़ाती, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन की उम्मीद भी है। लेकिन अब यही उम्मीद तेजी से बढ़ती गर्मी का शिकार बन रही है।
आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए नए अध्ययन से पता चला है कि जम्मू-कश्मीर का हिमालयी क्षेत्र पिछले दो दशकों में करीब एक डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुका है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि गुलमर्ग, पहलगाम और भद्रवाह जैसे ऊंचे पर्वतीय इलाके, जम्मू जैसे निचले क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। वैज्ञानिक इस प्रवृत्ति को 'एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग' कहते हैं।
अध्ययन के मुताबिक पहाड़ों पर रात का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियरों को दोबारा जमने का समय नहीं मिल रहा और उनके पिघलने की रफ्तार तेज होती जा रही है।
शोधकर्ताओं ने इसके पीछे बर्फ के सिकुड़ने और वातावरण में बढ़ती नमी को प्रमुख कारण बताया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो हिमालय के ग्लेशियर समय से पहले खत्म हो सकते हैं, जिससे बाढ़, भूस्खलन और अंततः गंभीर जल संकट का खतरा बढ़ जाएगा।
इसका असर नदियों के प्रवाह, कृषि, पेयजल, जलविद्युत उत्पादन और भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है।
हिमालय महज बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। इसकी गोद से निकलने वाली नदियां खेतों को सींचती हैं, शहरों की प्यास बुझाती हैं और पूरे उत्तर भारत की जीवनरेखा हैं। लेकिन अब यही हिमालय बढ़ते तापमान के साथ तेज बुखार से तपने लगा है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के सेंटर फॉर ओशियन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज (कोरल) से जुड़े वैज्ञानिकों ने इसको लेकर अपने नए अध्ययन में खुलासा किया है कि जम्मू-कश्मीर का हिमालयी क्षेत्र बीते महज दो दशकों में करीब एक डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुका है। देखा जाए तो यह बदलाव सिर्फ मौसम ही नहीं, बल्कि भविष्य में जल सुरक्षा, कृषि और पर्वतीय जीवन के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत है।
बता दें कि इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं, जिसमें वैज्ञानिकों ने 1980 से 2024 के बीच 44 वर्षों के मौसम और वायुमंडलीय आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
वहीं ब्रिटेन के डरहम विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में सामने आया है कि सदी के अंत तक मध्य हिमालय में आने वाली भीषण बाढ़ों का आकार 84 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसका असर भारत-नेपाल में रहने वाले लोगों पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन को जिम्मेवार माना है।
निचले इलाकों की तुलना में कहीं तेजी से गर्म हो रहे ऊंचे पहाड़
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है ऊंचे पहाड़ अब नीचे के समतल इलाकों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से तप रहे हैं। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि गुलमर्ग, पहलगाम और भद्रवाह जैसे खूबसूरत पर्वतीय इलाके, जम्मू जैसे कम ऊंचाई वाले शहरों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं।
विज्ञान की भाषा में इसे 'एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग' (यानी ऊंचाई के साथ बढ़ती गर्मी) कहते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो पहाड़ जितने ऊंचे हैं, वहां गर्मी का प्रकोप उतना ही तीखा होता जा रहा है।
रुझानों से पता चला है कि हिमालय के मध्य-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान हर दशक औसतन 0.3 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है। यह दर भारत के सबसे तेजी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में शामिल है। आंकड़े दर्शाते हैं कि जहां भद्रवाह के औसत तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से वृद्धि हुई है। वहीं जम्मू में यह आंकड़ा 0.1 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रिकॉर्ड किया गया।
पहाड़ों पर रातें भी तेजी से हो रही हैं गर्म
अध्ययन का सबसे डरावना पहलू यह है कि पहाड़ों पर अब रातें भी ठंडी नहीं रह गई हैं। मानसून से ठीक पहले के महीनों में, पहाड़ों पर कुछ इलाकों में रात का तापमान हर दशक 0.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है।
अध्ययन के अनुसार, हिमालय के मध्य और अधिक ऊंचाई वाले कई क्षेत्रों में तापमान हर दशक औसतन 0.1 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ रहा है। वहीं, दिन के अधिकतम तापमान में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत धीमी रही और यह हर दशक औसतन करीब 0 से 0.2 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज की गई।
रातों में बढ़ती यह गर्मी हिमालय के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। रातें ठंडी न होने के कारण ग्लेशियरों को खुद को संभालने और बर्फ को दोबारा जमने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। इसका नतीजा यह है कि बर्फ पिघलने का दौर अब थमता ही नहीं, जिससे ग्लेशियर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं।
आखिर क्यों तप रहा है हिमालय?
अब सवाल यह है कि अपने बर्फीले ग्लेशियरों के लिए जाना जाने वाला हिमालय आखिर इतनी तेजी से क्यों गर्म हो रहा है? वैज्ञानिकों ने इस तेजी से बढ़ती तपिश के पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं। पहला सफेद बर्फ का सिमटना।
जब पहाड़ों पर बर्फ की ताजा सफेद चादर होती है, तो वह सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज देती है, जिससे ठंडक बनी रहती है। लेकिन गर्मी के कारण जब बर्फ पिघलती है, तो नीचे की गहरे रंग की चट्टानें और मिट्टी बाहर आ जाती हैं। ये डार्क सतहें सूरज की गर्मी को सोखने लगती हैं, जिससे पहाड़ और ज्यादा गर्म होने लगते हैं। इसे ही स्नो-अल्बीडो फीडबैक कहते हैं।
इसका दूसरा प्रमुख कारण है वातावरण में बढ़ती नमी। वैज्ञानिकों के मुताबिक हवा में बढ़ रही नमी एक अदृश्य चादर (ग्रीनहाउस गैस) की तरह काम कर रही है, जो रात के समय गर्मी को पहाड़ों की वादियों में ही कैद कर लेती है। नतीजन न्यूनतम तापमान लगातार बढ़ता जाता है।
हिमालय का बढ़ता तापमान क्यों है बड़ी चिंता का विषय?
बता दें कि हिमालय को 'एशिया का वाटर टावर' भी कहा जाता है क्योंकि यहां से निकलने वाली गंगा और सिंधु जैसी नदियां भारत सहित कई देशों में करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं। ये नदियां खेतों को हरा-भरा रखती हैं और बिजली उत्पादन में भी मदद करती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि बढ़ती तपिश का यह रुझान जारी रहा तो हिमालय के ग्लेशियर समय से बहुत पहले खत्म हो जाएंगे। शुरुआत में बर्फ के तेजी से पिघलने से अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) और भूस्खलन जैसी आपदाएं कहर ढाएंगी, और फिर नदियों के सूखने से एक भयावह जल संकट खड़ा हो जाएगा। इससे नदियों के प्रवाह का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। नतीजन कृषि, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स अम्हर्स्ट से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में हाल ही में किए एक अन्य अध्ययन में खुलासा हुआ है कि तेजी से पिघलते ग्लेशियर और बारिश का बदलता पैटर्न एशिया की हजारों नदियों के प्रवाह में बदलाव की वजह बन रहे हैं। आशंका है कि जिस तेजी से ये बदलाव हो रहे हैं वो भारत, चीन, नेपाल सहित इस क्षेत्र के अन्य देशों में बिजली, पानी और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन में हिमालय के कुछ हिस्सों और गंगा के निचले इलाकों में नदी के जल प्रवाह में कमी देखी गई है, जबकि दक्षिण-पश्चिमी गैर-हिमनद क्षेत्रों में इसका प्रवाह तेजी से बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने दी निगरानी और तैयारी बढ़ाने की सलाह
शोधकर्ताओं का कहना है कि हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है और यहां तापमान सभी ऊंचाइयों पर समान गति से नहीं बढ़ रहा। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की लगातार निगरानी, बेहतर जलवायु मॉडल और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन (एडाप्टेशन) की रणनीतियां अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई हैं।
उनका मानना है कि यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो हिमालय में हो रहे ये बदलाव आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवन, आजीविका और जल संसाधनों पर गहरा असर डाल सकते हैं।