जलवायु संकट से निपटने में अफ्रीकी देशों का अनुभव, स्थानीय ज्ञान और पारंपरिक उपाय बन सकते हैं वैश्विक समाधान। फोटो साभार: आईस्टॉक
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दुनिया में सुपर अल नीनो का खतरा: अफ्रीका से सीखा जा सकता है निपटने का तरीका: शोध

सुपर अल नीनो से बढ़ी दुनिया की चिंता, लेकिन अफ्रीका के अनुभव और जलवायु अनुकूलन की रणनीतियां भविष्य के लिए दे रही हैं नई राह

Dayanidhi

  • सुपर अअल नीनो के खतरे से सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट की आशंका बढ़ी, दुनिया की नजरें तैयारियों पर टिकीं।

  • जलवायु संकट से निपटने में अफ्रीकी देशों का अनुभव, स्थानीय ज्ञान और पारंपरिक उपाय बन सकते हैं वैश्विक समाधान।

  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, बेहतर योजना और समय पर सहायता से प्राकृतिक आपदाओं के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • ज्वार, बाजरा और अन्य जलवायु अनुकूल फसलें बदलते मौसम में अफ्रीका की खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में मददगार साबित होंगी।

  • जलवायु अनुकूलन के लिए धन और समान साझेदारी जरूरी, ताकि अफ्रीका अपने सफल समाधानों को बड़े स्तर पर लागू कर सके।

जून 2026 में जलवायु वैज्ञानिकों ने बताया कि अल नीनो फिर से शुरू हो गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इस बार बहुत अधिक शक्तिशाली हो सकता है। यदि ऐसा हुआ, तो यह अब तक के सबसे बड़े "सुपर अल नीनो" में से एक होगा। इस खबर के बाद दुनिया के कई देशों में चिंता बढ़ गई है, क्योंकि अल नीनो का असर मौसम, खेती, पानी और लोगों के जीवन पर पड़ता है। यह शोध फ्रंटियर्स इन वॉटर नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

क्या होता है एल नीनो?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है। यह हर दो से सात साल के बीच कभी भी हो सकता है। इस दौरान प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र का तापमान बढ़ने से दुनिया के कई हिस्सों का मौसम बदल जाता है। कहीं बहुत अधिक बारिश होती है, तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है। कई जगहों पर गर्मी भी बहुत बढ़ जाती है।

इस बार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 के अंत तक प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से लगभग तीन डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है। यही कारण है कि इसे "सुपर अल नीनो" कहा जा रहा है।

अफ्रीका पर सबसे अधिक असर

अल नीनो का असर अफ्रीका के अलग-अलग इलाकों में अलग तरीके से दिखाई देता है। दक्षिण अफ्रीका में आमतौर पर बहुत गर्म और सूखा मौसम रहता है। इससे खेती खराब होती है और लोगों के सामने भोजन की कमी की समस्या खड़ी हो जाती है। पहले भी ऐसे हालात में लाखों लोग भूख का सामना कर चुके हैं।

पूर्वी और मध्य अफ्रीका में इसके कारण भारी बारिश और बाढ़ आती है। पहले की घटनाओं में लाखों घर नष्ट हो गए थे। खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो गई और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी बुरा असर पड़ा। पश्चिमी अफ्रीका में फसल कम होने से खाद्यान्न की कीमतें बढ़ जाती हैं और गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाना मुश्किल हो जाता है।

साल 2015-16 के सुपर एल नीनो के दौरान पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में 3.6 करोड़ से अधिक लोग भूख से प्रभावित हुए थे। इस घटना ने पानी, स्वास्थ्य, खेती और लोगों की आजीविका पर गंभीर असर डाला था।

केवल खतरे की नहीं, अनुभव की भी कहानी

अफ्रीका को अक्सर केवल जलवायु संकट से सबसे अधिक प्रभावित महाद्वीप के रूप में देखा जाता है। यह सच है कि वहां गरीबी, कमजोर बुनियादी ढांचा और विकास की कमी जैसी चुनौतियां हैं। लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है।

अफ्रीकी देशों ने कई दशकों तक सूखा, बाढ़ और मौसम की अनिश्चितता का सामना किया है। लगातार आने वाली प्राकृतिक चुनौतियों ने वहां के लोगों, किसानों, वैज्ञानिकों और सरकारों को कई महत्वपूर्ण अनुभव दिए हैं। आज दुनिया इन अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकती है।

तैयारी सबसे बड़ा बचाव

अफ्रीका ने यह समझा है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने से बेहतर है कि पहले से तैयारी कर ली जाए। समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियां, पहले से बनाई गई योजनाएं और जरूरत के समय तुरंत सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था नुकसान को काफी कम कर सकती है।

हालांकि कई देशों में अभी भी संसाधनों की कमी है, फिर भी शुरुआती चेतावनी प्रणाली पहले की तुलना में मजबूत हुई है। यदि लोग पहले से तैयार रहें, तो उन्हें अपनी बचत खर्च करने या कर्ज लेने की जरूरत कम पड़ती है।

स्थानीय फसलें बन सकती हैं समाधान

जलवायु परिवर्तन के दौर में केवल गेहूं और मक्का जैसी फसलों पर निर्भर रहना सुरक्षित नहीं माना जा रहा है। अफ्रीका में लंबे समय से ज्वार, बाजरा, बाम्बारा ग्राउंडनट और लोबिया जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती रही हैं। ये फसलें कम पानी और कठिन मौसम में भी अच्छी तरह उग जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी जलवायु-सहिष्णु फसलों को बढ़ावा देने से खाद्य सुरक्षा मजबूत हो सकती है।

सभी समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं

जलवायु परिवर्तन का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। जब सूखा पड़ता है, तो फसल कम होती है। इससे भोजन महंगा हो जाता है। पानी की कमी से स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता है। बिजली की समस्या सिंचाई और अस्पतालों दोनों को प्रभावित करती है।

इसी कारण विशेषज्ञों का कहना है कि पानी, ऊर्जा, भोजन, पर्यावरण और स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ जोड़कर योजनाएं बनानी चाहिए।

सबसे बड़ी चुनौती है धन की कमी

अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन से निपटने के कई सफल उपाय पहले से मौजूद हैं। किसान नई तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं और सरकारें भी कई योजनाएं चला रही हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या धन की कमी है।

सिंचाई, स्वास्थ्य केंद्र, सड़कें, फसल बीमा और गरीब परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता की जरूरत है। कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहायता का वादा तो किया जाता है, लेकिन धन देर से मिलता है या उसकी शर्तें इतनी कठिन होती हैं कि जरूरतमंद लोगों तक मदद समय पर नहीं पहुंच पाती।

बराबरी की साझेदारी जरूरी

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि जलवायु संकट का समाधान केवल बाहर से तैयार योजनाएं भेजने से नहीं होगा। स्थानीय लोगों की जरूरतों और अनुभवों को समझना जरूरी है। अफ्रीका के पास अपना ज्ञान, अपने विशेषज्ञ और अपनी सफल रणनीतियां हैं।

इसलिए दुनिया को अफ्रीकी देशों के साथ बराबरी के आधार पर काम करना चाहिए। ऐसी साझेदारी में सीखने, सहयोग और सम्मान की भावना होनी चाहिए।

दुनिया के लिए एक संदेश

सुपर एल नीनो अफ्रीका के लिए एक बड़ी परीक्षा हो सकता है। फिर भी यह दुनिया को यह दिखाने का अवसर भी है कि अफ्रीका केवल जलवायु संकट से प्रभावित महाद्वीप नहीं है, बल्कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के व्यावहारिक अनुभव और मजबूत समाधान भी दुनिया को दे सकता है। यदि इन अनुभवों का सही उपयोग किया जाए और पर्याप्त आर्थिक सहयोग मिले, तो भविष्य की जलवायु चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सकता है।