उत्तराखंड के मैदानी इलाकों और घाटियों में प्रदूषण अधिक मिला, जबकि ऊंचे पहाड़ों की हवा तुलनात्मक रूप से साफ दर्ज की गई। फोटो साभार: आईस्टॉक
वायु

उत्तराखंड की हवा में घुल रहा प्रदूषण, सर्दियों में तीन गुना बढ़ जाता है पीएम2.5

उत्तराखंड में सर्दियों के दौरान पीएम2.5 का स्तर 40 (भारत में सामान्य) से 80 माइक्रोग्राम तक पहुंचा, जबकि धूल, पराली और जंगलों की आग ने पहाड़ों तक प्रदूषण फैलाया।

Dayanidhi

  • उत्तराखंड में सर्दियों के दौरान पीएम2.5 का स्तर 40 से 80 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुंचा, गर्मियों में अपेक्षाकृत कम रहा।

  • मैदानी इलाकों और घाटियों में प्रदूषण अधिक मिला, जबकि ऊंचे पहाड़ों की हवा तुलनात्मक रूप से साफ दर्ज की गई।

  • घाटियों में रात के समय ठंडी हवा और तापमान उलटाव के कारण प्रदूषक जमा हुए, जिससे पीएम2.5 का स्तर बढ़ा।

  • मई-जून 2022 में धूल भरी हवाओं ने पूरे उत्तराखंड को प्रभावित किया, ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों तक प्रदूषण के कण पहुंचे।

  • अक्टूबर-नवंबर 2022 में पराली जलाने और जैविक पदार्थों के धुएं से मैदानी इलाकों, घाटियों तथा ऊंचे पहाड़ों में प्रदूषण बढ़ा।

हिमालय की स्वच्छ हवा को लेकर आम धारणा के बीच एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चौंकाने वाली तस्वीर सामने रखी है। उत्तराखंड के मैदानी इलाकों और घाटियों में सर्दियों के दौरान हवा में मौजूद बेहद महीन प्रदूषक कण पीएम2.5 की मात्रा गर्मियों के मुकाबले दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मैदानी क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण, धूल और फसल अवशेष जलाने से उठने वाला धुआं पहाड़ों तक पहुंचकर हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

यह अध्ययन शोध पत्रिका एटमोस्फियरिक एनवायरनमेंट में प्रकाशित किया गया है। इसमें साल 2022 के दौरान उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में लगाए गए 15 विशेष सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में उपग्रह से मिले आंकड़ों और मौसम संबंधी दोबारा विश्लेषित आंकड़ों की भी तुलना की गई। इसका उद्देश्य यह समझना था कि हिमालय के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रदूषण किस तरह बदलता है और बाहरी क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषक पहाड़ों की हवा को कितना प्रभावित करते हैं।

सर्दियों में 40 से 80 तक पहुंचा पीएम 2.5

अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक, सर्दियों में उत्तराखंड के मैदानी इलाकों और घाटियों में पीएम पीएम2.5 का स्तर लगभग 40 से 80 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया। इसके मुकाबले गर्मियों में इसकी मात्रा सामान्यतः 10 से 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच रही। यानी मौसम बदलने के साथ प्रदूषण के स्तर में बड़ा अंतर दिखाई दिया।

पीएम 2.5 ऐसे बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। अपने छोटे आकार के कारण ये सांस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश कर सकते हैं और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। वायु प्रदूषण का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मौसम, जलवायु और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर सकता है।

मैदानों में सबसे ज्यादा, ऊंचे पहाड़ों पर अपेक्षाकृत साफ हवा

शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के निगरानी स्थलों को तीन श्रेणियों में बांटा। इनमें मैदानी क्षेत्र, मध्य ऊंचाई वाली घाटियां और पहाड़ों की चोटियां या ढलानें शामिल थीं। इन तीनों क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर अलग-अलग पाया गया।

मैदानी इलाकों में सर्दियों के दौरान पीएम 2.5 का मध्य स्तर लगभग 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। घाटियों में यह करीब 20 से 25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जबकि ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में यह 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से भी कम रहा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पहाड़ों की हवा हमेशा साफ रहती है। प्रदूषित हवा के बड़े प्रवाह के दौरान ऊंचाई वाले इलाकों में भी प्रदूषण बढ़ने के संकेत मिले।

शोध के अनुसार, देहरादून, हल्द्वानी और मैदानी क्षेत्रों के अन्य निगरानी स्थलों पर कुछ दिनों में पीएम 2.5 का स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि स्थानीय गतिविधियों और बाहर से आने वाले प्रदूषण का मिला-जुला असर हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

रात में घाटियों में जमा होता है प्रदूषण

अध्ययन में दिन और रात के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर सामने आया। गर्मियों में मैदानी क्षेत्रों में दोपहर के समय हवा में प्रदूषण कम होता दिखाई दिया, क्योंकि गर्म हवा ऊपर उठने और वायुमंडल में हवा के बेहतर मिश्रण से प्रदूषक फैल जाते हैं। लेकिन रात में हवा की गति और वायुमंडलीय परिस्थितियां बदलने के कारण प्रदूषण फिर जमा होने लगता है।

सर्दियों में मैदानी इलाकों में रात और सुबह के समय पीएम 2.5 का स्तर 60 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा। घाटियों में रात के दौरान यह मात्रा 40 से 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही। कुछ घाटियों में रात का प्रदूषण दिन के मुकाबले लगभग दोगुना हो गया।

इसका एक प्रमुख कारण तापमान का उलटाव है। सामान्य स्थिति में गर्म हवा ऊपर उठती है, लेकिन सर्दियों में जमीन के पास ठंडी हवा और उसके ऊपर अपेक्षाकृत गर्म हवा की परत बनने से प्रदूषक नीचे फंस सकते हैं। पहाड़ों की बनावट और ठंडी हवा का घाटियों में जमा होना इस समस्या को और बढ़ा देता है।

धूल भरी हवा ने बढ़ाया प्रदूषण

अध्ययन में 29 मई से 10 जून 2022 के बीच धूल के एक बड़े क्षेत्रीय प्रभाव का विश्लेषण किया गया। इस दौरान थार मरुस्थल की ओर से आने वाली धूल ने उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों, घाटियों और ऊंचाई वाले इलाकों को प्रभावित किया। मैदानी क्षेत्रों में पीएम 2.5 का प्रति घंटे का औसत स्तर लगभग 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा, जबकि घाटियों में यह 40 से 50 और ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर चला गया।

वैज्ञानिकों ने पाया कि धूल का प्रभाव केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं रहा। हवा के साथ ऊपर पहुंचने वाले प्रदूषक कणों ने पहाड़ी क्षेत्रों की हवा को भी प्रभावित किया। इससे साफ होता है कि हिमालय की वायु गुणवत्ता को समझने के लिए केवल स्थानीय प्रदूषण पर नजर रखना पर्याप्त नहीं है।

पराली के धुएं का असर हिमालय तक

सर्दियों से पहले और शुरुआती सर्दियों के दौरान पंजाब और हरियाणा सहित उत्तर-पश्चिमी भारत में फसल अवशेष जलाने से उठने वाला धुआं भी उत्तराखंड तक पहुंचा। शोधकर्ताओं ने 8 अक्टूबर से 15 नवंबर 2022 के बीच इस प्रभाव का अध्ययन किया।

इस अवधि में मैदानी इलाकों में रात के समय पीएम 2.5 का स्तर 60 से 80 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा। घाटियों में यह 40 से 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी धुएं के कारण सामान्य स्तर से 10 से 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

अध्ययन के अनुसार, मैदानी इलाकों में प्रदूषण पहले बढ़ा, फिर घाटियों में देर से जमा हुआ। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम, लेकिन स्पष्ट था। यह पैटर्न बताता है कि प्रदूषण हवा के साथ लंबी दूरी तय कर सकता है और पहाड़ों तक पहुंचकर स्थानीय मौसम के कारण अलग-अलग स्थानों पर जमा हो सकता है।

उपग्रह के आंकड़ों में भी दिखा प्रदूषण

वैज्ञानिकों ने वर्ष 2001 से 2025 तक के उपग्रह आंकड़ों का भी विश्लेषण किया। इसमें धूल के मौसम और मानसून के बाद फसल अवशेष जलाने की अवधि के दौरान वायुमंडल में एरोसोल की मात्रा बढ़ने के संकेत मिले। एरोसोल हवा में मौजूद छोटे ठोस और तरल कणों को कहा जाता है।

अध्ययन में उपग्रह के दो उपकरणों की तुलना करने पर पाया गया कि एक्वा उपग्रह के आंकड़ों का जमीन पर मापे गए पीएम2.5 से संबंध टेरा उपग्रह के मुकाबले बेहतर था। हालांकि, पहाड़ी इलाकों में केवल उपग्रह या कंप्यूटर मॉडल के आंकड़ों से प्रदूषण की सही मात्रा का पता लगाना कठिन हो सकता है।

निगरानी बढ़ाने की जरूरत

यह अध्ययन आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज), नैनीताल सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया गया। उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में लगाए गए 15 सीयूपीआई सेंसरों ने पहली बार राज्य के मैदानी इलाकों, घाटियों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पीएम 2.5 के अंतर को एक साथ समझने का अवसर दिया।

शोध का मुख्य संदेश है कि हिमालय की हवा को हमेशा प्रदूषण से मुक्त नहीं माना जा सकता। सर्दियों में प्रदूषकों का जमाव, गर्मियों में धूल और दूर-दराज से आने वाला धुआं पहाड़ी क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए नियमित निगरानी, स्थानीय प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण और उपग्रह आंकड़ों के साथ जमीन पर माप की व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। इससे उत्तराखंड में प्रदूषण के बदलते स्वरूप को बेहतर ढंग से समझने और प्रभावी वायु गुणवत्ता प्रबंधन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।