भारत के शहर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक बस सेवा उनकी रफ्तार से काफी पीछे छूट गई है। सीएसई और सिटीज फोरम की नई रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 400 से ज्यादा शहरों में नियमित बस सेवा नहीं है, जबकि शहरी सार्वजनिक परिवहन की जरूरत और उपलब्धता के बीच करीब 70 फीसदी की कमी है।
फिलहाल हर एक लाख शहरी आबादी पर सिर्फ 13-14 बसें उपलब्ध हैं, जबकि 2047 तक यह संख्या बढ़ाकर 88 बसें करने की जरूरत होगी।
इस दौरान शहरी आबादी 49 करोड़ से बढ़कर 76.3 करोड़ होने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार, 2047 तक नियमित शहरी बसों का बेड़ा 65 हजार से बढ़ाकर 6.71 लाख करना होगा और 90 फीसदी बसों को इलेक्ट्रिक बनाना होगा।
इसके लिए हर साल बस खरीद की रफ्तार करीब 17 गुना बढ़ाकर औसतन 41,500 बसें करनी होंगी। यह बदलाव सिर्फ सफर आसान करने के लिए नहीं, बल्कि ट्रैफिक, प्रदूषण और निजी वाहनों पर निर्भरता घटाने के लिए भी जरूरी है।
रिपोर्ट ने इसके लिए राष्ट्रीय शहरी बस मिशन और करीब 14.2 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता बताई है।
सुबह समय पर ऑफिस पहुंचने की होड़ हो या अस्पताल जाने की लाचारी, बस स्टॉप पर घटों इंतजार करता आम आदमी रोज एक ही सवाल से जूझता है—मेरी बस कब आएगी?" स्मार्ट सिटी और तेज रफ्तार कॉरिडोर्स के बीच भारत में शहरी परिवहन का एक ऐसा कड़वा सच सामने आया है, जो चिंतित कर देने वाला है।
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी कंसल्टेंसी फर्म सिटीज फोरम ने अपनी नई रिपोर्ट ‘रीइन्वेंटिंग द अर्बन बस’ में खुलासा किया है कि भारत के 400 से ज्यादा शहरों में अभी नियमित बस सेवा ही नहीं है। यानी इन शहरों में रहने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक परिवहन का भरोसेमंद साधन अभी भी दूर की कौड़ी है।
400 शहरों में बस का इंतजार, 70 फीसदी की कमी
हालात यह हैं कि देश में शहरी सार्वजनिक परिवहन की जरुरत और उपलब्धता के बीच करीब 70 फीसदी की भारी कमी है। यानी भारत में सार्वजानिक परिवहन व्यवस्था समय के साथ रफ्तार पकड़ने के बजाय सुस्त पड़ रही है।
ऐसे में अगर समय रहते इस खाई को न भरा गया तो बढ़ती आबादी के साथ निजी वाहनों का बोझ, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण कहीं ज्यादा गंभीर रूप ले सकते हैं।
यह रिपोर्ट देश की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में मौजूद खामियों को ही उजागर नहीं करती बल्कि उसे कैसे दूर किया जाए इस पर भी प्रकाश डालती है। रिपोर्ट के मुताबिक यदि भारत को सार्वजानिक परिवहन व्यवस्था को सशक्त करना है तो उसे 2047 तक शहरों में मौजूद नियमित बस सेवा के बेड़े को 65 हजार से बढ़ाकर 6.71 लाख करना होगा। यानी अगले दो दशकों में इसे करीब दस गुणा बढ़ाना होगा।
यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़कों पर दौड़ती बसें महज लोहे से बनी गाड़ियां नहीं हैं। वे लाखों लोगों के लिए रोजगार, शिक्षा, इलाज और बेहतर जिंदगी तक पहुंच का साधन हैं। एक सस्ती और भरोसेमंद बस किसी मजदूर को काम तक, किसी बच्चे को स्कूल तक और किसी मरीज को अस्पताल तक पहुंचाती है। यानी बस सेवा आम नागरिक की सामाजिक और आर्थिक आजादी का अहम जरिया है।
2047 तक दस गुणा बढ़ानी होगी बसों की संख्या
हालांकि आंकड़ों की तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। 2026 तक भारत की शहरी आबादी करीब 49 करोड़ पहुंच चुकी है और 2047 तक इसके बढ़कर 76.3 करोड़ होने का अनुमान है। मतलब कि इन दो दशकों में भारतीय शहरों में 27 करोड़ से अधिक लोग और जुड़ जाएंगे। यानी शहर बढ़ रहे हैं, आबादी बढ़ रही है, लेकिन सार्वजनिक बसों की रफ्तार उस जरूरत के मुकाबले बेहद धीमी है।
रिपोर्ट में सामने आया है कि फिलहाल हर एक लाख शहरी आबादी पर देश में महज 13 से 14 बसें ही उपलब्ध हैं, जो उन्हें नियमित सेवा प्रदान करती हैं, जबकि सरकार का अपना मानक ही 44 बस प्रति एक लाख आबादी का है। ऐसे में इसका असर साफ तौर पर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिखता है।
बसों की इस कमी का मतलब है कि नौकरी, स्कूल, अस्पताल या बाजार तक पहुंचने के लिए लोगों को निजी वाहन, ऑटो या अन्य महंगे साधनों पर निर्भर होना। इससे सड़कों पर भीड़ बढ़ती है, जाम लगता है और हवा में प्रदूषण का बोझ बढ़ता है।
देश में बसें हैं, लेकिन शहरों के लिए पर्याप्त नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा नहीं कि भारत में बसे नहीं हैं। भारत में करीब 14.5 लाख पंजीकृत बसें हैं और राज्य परिवहन उपक्रमों के पास करीब 2.9 लाख स्टेज-कैरिज बसें हैं। इसके बावजूद नियमित शहरी बस सेवा में महज 65 हजार बसें ही चल रही हैं। यानी समस्या सिर्फ बसों की कुल संख्या की नहीं, बल्कि शहरों की जरूरत के मुताबिक बसों की उपलब्धता और व्यवस्था की भी है।
रुझान दर्शाते हैं कि देश में बस बेड़े का 55 फीसदी हिस्सा केवल पांच राज्यों- मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सिमटा है। हालांकि बसों की कुल संख्या से यह पता नहीं चलता कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन कितना पर्याप्त है।
इसकी वजह यह है कि इन बड़े राज्यों की बड़ी संख्या में बसें शहरों के बजाय एक जिले से दूसरे जिले या अंतरशहरी मार्गों पर चलती हैं। इसलिए शहरों में बसों की वास्तविक कमी इससे कहीं ज्यादा हो सकती है।
इससे राज्यों और शहरों के बीच सार्वजनिक परिवहन में मौजूदा असमानता की बड़ी खाई सामने आती है।
अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं 40 हजार बसें
शहरी बस व्यवस्था की समस्या केवल संख्या तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में बसें पुरानी भी हो चुकी हैं। रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 हजार शहरी बसें 15 साल की निर्धारित उम्र पार कर चुकी हैं।
वहीं देशभर में सभी तरह की बस सेवाओं को देखें तो वित्त वर्ष 2026 से 2030 के बीच करीब 5.8 लाख बसें अपनी तय उम्र पूरी कर लेंगी। यह सार्वजनिक परिवहन के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में नई बसें खरीदना और पुरानी बसों को समय पर हटाना दोनों ही जरूरी है।
हर साल 41,500 नई बसें खरीदने की है जरूरत
रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि 2047 तक 90 फीसदी बसों को इलेक्ट्रिक बनाने के लिए शहरी बसों की खरीद में करीब 17 गुणा तेजी लाने की आवश्यकता है। अभी हर साल करीब 2,500 बसें खरीदी जाती हैं, जिसे बढ़ाकर हर साल औसतन 41,500 बसों पर लाना होगा। इसके बाद मांग बढ़कर एक समय (2040 के दशक के मध्य) में 78,000 बसों तक पहुंच सकती है।
2047 का लक्ष्य: 90 फीसदी बसें इलेक्ट्रिक
2047 के लिए सुझाए गए लक्ष्य के तहत हर एक लाख आबादी पर 88 बसें उपलब्ध कराने और शहरी बस बेड़े का 90 फीसदी हिस्सा इलेक्ट्रिक करने की बात भी कही गई है।
सीएसई में रिसर्च और एडवोकेसी की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी का कहना है, विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बस परिवहन व्यवस्था में बदलाव बेहद जरूरी है। इससे साफ हवा, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु कार्रवाई में मदद मिलेगी।"
उनके मुताबिक इस बदलाव में बसों की सबसे अहम भूमिका हो सकती है। एक बस सड़क से 40 से 50 निजी कारों को हटाने में सक्षम है। इससे सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी को 70 से 75 फीसदी तक बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यानी बेहतर बस सेवा केवल सफर को आसान बनाने का माध्यम नहीं है। यह शहरों में ट्रैफिक, प्रदूषण, ईंधन की खपत और कारों पर निर्भरता घटाने का बड़ा हथियार भी बन सकती है।
बसों की कमी से बढ़ रही कारों पर निर्भरता
रिपोर्ट में बस व्यवस्था को बढ़ाने के लिए तीन अलग-अलग विकल्पों के तहत लागत का अनुमान लगाया गया है। इसमें कम वृद्धि वाले विकल्प में 2047 तक हर एक लाख आबादी पर 44 बसें उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इसके लिए करीब 4.2 लाख नई बसें खरीदनी होंगी और कुल बस बेड़ा 3.36 लाख होगा। इस पर करीब 6.55 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
वहीं तेज वृद्धि वाले विकल्प में 2030 तक आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के मानकों को हासिल करने और 2040 तक हर एक लाख आबादी पर 60 बसें उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इसके तहत 6.8 लाख बसें खरीदनी होंगी, जिससे कुल बेड़ा 4.58 लाख बसों का होगा। इसकी अनुमानित लागत 10.55 लाख करोड़ रुपये है।
वहीं, सुझाए गए लक्ष्य के तहत 2047 तक हर एक लाख आबादी पर 88 बसें उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसे हासिल करने के लिए करीब 9.1 लाख नई बसें खरीदनी होंगी, जिससे देश में बसों की संख्या बढ़कर 6.71 लाख हो जाएगी। इनमें 90 फीसदी बसें इलेक्ट्रिक होंगी। इस बदलाव के लिए करीब 14.2 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी।
ऐसे में अगर 2039-40 तक खरीदी जाने वाली सभी नई बसें इलेक्ट्रिक हों, तो 2047 तक देश में करीब 6.04 लाख इलेक्ट्रिक शहरी बसें चल रही होंगी। इस पूरी इलेक्ट्रिक बस सेवा को चलाने के लिए करीब 121 गीगावॉट-घंटे बैटरी क्षमता और हर साल करीब 37,000 मिलियन यूनिट बिजली की जरूरत होगी। यह भारत के 2024 में कुल बिजली उत्पादन का करीब 1.8 फीसदी है, जिसे आसानी से पूरा किया जा सकता है।
राष्ट्रीय शहरी बस मिशन की सिफारिश
अध्ययन में नेशनल अर्बन बस मिशन शुरू करने की सिफारिश की गई है। इसके साथ नेशनल अर्बन बस इलेक्ट्रिफिकेशन फंड, ग्रीन बस बॉन्ड, रियायती ऋण, क्रेडिट गारंटी और परिणाम आधारित वित्तीय व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया गया है।
साथ ही वित्तीय संकट से जूझ रहे परिवहन उपक्रमों को पुनर्गठित करने, पुरानी बसों को हटाने, टैक्स व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने और 2039-40 के बाद खरीदी जाने वाली सभी नई शहरी बसों को इलेक्ट्रिक करने की भी सिफारिश की गई है।
शहरों का भविष्य सिर्फ चौड़ी सड़कों से नहीं बनेगा
भारत के शहरों में हर दिन लाखों लोग बस का इंतजार करते हैं। कहीं बस आती ही नहीं, कहीं एक बस में जरूरत से कई गुणा ज्यादा लोग सफर करते हैं और कहीं पुरानी बसें बार-बार खराब होकर यात्रियों की मुश्किल बढ़ाती हैं। दूसरी तरफ सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में 2047 का विकसित भारत केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और तेज रफ्तार वाहनों से नहीं बनेगा। शहर तभी सचमुच विकसित होंगे, जब हर व्यक्ति को सुरक्षित, सस्ती, भरोसेमंद और साफ-सुथरी सार्वजनिक बस सेवा आसानी से मिल सके।