भारत का ई-सफर: वाहनों से होने वाले प्रदूषण के प्रति कितना गंभीर है गुजरात

आर्थिक रूप से समृद्ध गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा में पीएम10 स्तर राष्ट्रीय मानक से अब भी काफी ऊपर, वाहनों की बढ़ती संख्या और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता वायु गुणवत्ता सुधार की कोशिशों को कमजोर कर रही है
गुजरात के शहर सूरत में निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। फोटो: राजू सजवान
गुजरात के शहर सूरत में निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। फोटो: राजू सजवान
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सारांश
  • गुजरात की आर्थिक प्रगति के बावजूद अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा में पीएम10 और पीएम2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से काफी ऊपर बना हुआ है।

  • सीपीसीबी और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वाहनों से निकलने वाला धुआं, डीजल-पेट्रोल पर भारी निर्भरता, तेजी से बढ़ती वाहन संख्या, कमजोर सार्वजनिक परिवहन और लगातार निर्माण कार्य वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

  • सीएनजी वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ने के बावजूद कुल वाहनों में उनकी भागीदारी सीमित है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में सड़क परिवहन की हिस्सेदारी 2005 से 2023 के बीच लगभग पांच गुना बढ़ी है।

  • अहमदाबाद में परिवहन क्षेत्र पीएम2.5 और पीएम10 का बड़ा स्रोत है, जबकि पूरे गुजरात में सड़क परिवहन से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 18 साल में 6.7 से बढ़कर 32.2 मिलियन टन हो गया।

  • 2.93 करोड़ से अधिक पंजीकृत वाहनों में पेट्रोल और डीजल वाहनों की संख्या 2.51 करोड़ से ज्यादा है, डीजल वाहनों के नए पंजीकरण में 37 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई है और सीएनजी की हिस्सेदारी केवल 8.1 प्रतिशत के आसपास है।

  • कैग की रिपोर्ट ने पीयूसीसी नवीनीकरण में भारी लापरवाही और नियमों के कमजोर अनुपालन को उजागर किया, जिससे स्पष्ट होता है कि वाहन प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास अभी पर्याप्त नहीं हैं।

आर्थिक समृद्धि के लिए दुनिया भर में मशहूर राज्य गुजरात भी वायु प्रदूषण अछूता नहीं है। राज्य के चार बड़े शहरों को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) में शामिल किया गया है, लेकिन चारों शहर अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा में पीएम10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से काफी ऊपर है। इन शहरों में प्रदूषण के कारणों में वाहनों से निकलने वाली गैस, धुआं व सड़कों की धूल को प्रमुख माना गया है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पीआरएएनए पोर्टल पर उपलब्ध 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार गुजरात के चार एनसीएपी शहरों अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा में पीएम10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से काफी ऊपर है।

अहमदाबाद में 2025-26 में पीएम10 का वार्षिक औसत करीब 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 2017-18 के करीब 162 माइक्रोग्राम से इसमें कमी जरूर आई है, लेकिन मौजूदा स्तर भी राष्ट्रीय मानक से करीब 67 प्रतिशत अधिक है।

सूरत में 2025-26 में पीएम10 करीब 86 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 2017-18 के करीब 130 माइक्रोग्राम की तुलना में इसमें कमी हुई है, लेकिन यह अब भी राष्ट्रीय मानक से करीब 43 प्रतिशत अधिक है।

राजकोट में 2025-26 में पीएम10 का स्तर करीब 98 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 2017-18 में यह करीब 149 माइक्रोग्राम था। यानी लंबे समय में कमी आई है, लेकिन वर्तमान स्तर राष्ट्रीय मानक से करीब 63 प्रतिशत ज्यादा है।

वडोदरा में 2025-26 में पीएम10 करीब 98 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। 2017-18 में यह करीब 150 माइक्रोग्राम था। इस तरह यहां भी प्रदूषण में कमी आई है, लेकिन पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से करीब 63 प्रतिशत अधिक बना हुआ है।

चारों शहरों की तस्वीर को एक साथ देखें तो अहमदाबाद में मौजूदा पीएम10 स्तर सबसे अधिक करीब 100 माइक्रोग्राम, राजकोट और वडोदरा में करीब 98 माइक्रोग्राम तथा सूरत में करीब 86 माइक्रोग्राम है। गुजरात के इन चारों शहरों की निगरानी सीपीसीबी के पीआरएएनए पोर्टल पर इनके लिए एयर एक्शन प्लान की प्रगति और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों के आधार पर की जाती है।

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गुजरात के शहर सूरत में निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। फोटो: राजू सजवान

अहमदाबाद में वाहनों से होने वाला प्रदूषण वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल है। शहर के एक आधिकारिक अध्ययन में परिवहन को पीएम2.5 प्रदूषण के लगभग 27 प्रतिशत और पीएम10 के करीब 20 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार पाया गया था।

2024 में प्रकाशित हिमालय भाखर, रीता एन. कुमार और निर्मल जे. आई. कुमार के अहमदाबाद की वायु गुणवत्ता पर किए गए अध्ययन में औद्योगिक, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर इऑक्साइड, अमोनिया, सूक्ष्म कण पदार्थ पीएम2.5 और कण पदार्थ पीएम10 की मानसून के बाद, मानसून से पहले और मानसून में जांच की गई।

अध्ययन में पाया गया कि पीएम2.5 की मात्रा औद्योगिक क्षेत्र में 98.86 से 176.88 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, शहरी क्षेत्र में 85.72 से 138.34 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और ग्रामीण क्षेत्र में 36.49 से 67.79 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रही।

इसी तरह पीएम10 औद्योगिक क्षेत्र में 83.45 से 203.17 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, शहरी क्षेत्र में 115.44 से 183.72 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और ग्रामीण क्षेत्र में 49.61 से 87.37 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया।

अध्ययन में अहमदाबाद के शहरी क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में वाहनों से निकलने वाला धुआं और लगातार चल रहे निर्माण कार्य बताए गए हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि जीवाश्म ईंधन, खासकर ऑटोमोबाइल में इस्तेमाल होने वाला ईंधन, मानव गतिविधियों से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है।

गुजरात में वाहन प्रदूषण फैलाने वाले तीसरे सबसे बड़े स्रोत माने जाते हैं। इनसे होने वाला प्रदूषण औद्योगिक ऊर्जा खपत और सार्वजनिक बिजली उत्पादन के बाद तीसरे स्थान पर है। जून 2025 में गुजरात सरकार के जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा तैयार किए गए ऑनलाइन गुजरात क्लाइमेट एक्शन ट्रेकर के अनुसार, 2023 में सड़क परिवहन क्षेत्र गुजरात के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 13 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार था। इससे अधिक उत्सर्जन औद्योगिक ऊर्जा खपत (19 प्रतिशत) और सार्वजनिक बिजली उत्पादन (17.5 प्रतिशत) से हुआ।

अहमदाबाद और राजकोट जैसे प्रमुख जिलों में वाहनों का योगदान और भी अधिक था। इन जिलों में वाहनों से होने वाला उत्सर्जन क्रमशः 36 प्रतिशत और 52 प्रतिशत था, जबकि औद्योगिक ऊर्जा का हिस्सा क्रमशः 4.7 प्रतिशत और 11.2 प्रतिशत था। वहीं वडोदरा और सूरत में परिवहन क्षेत्र की हिस्सेदारी क्रमशः 23 प्रतिशत और 13.5 प्रतिशत थी।

परिवहन क्षेत्र के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में तेज बढ़ोतरी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2005 से 2023 के बीच इसका उत्सर्जन 6.7 मिलियन टन कार्बन डाइ ऑक्साइड समतुल्य से बढ़कर 32.2 मिलियन टन हो गया। यानी इस अवधि में इसमें लगभग पांच गुना वृद्धि हुई।

बढ़ती जा रही है सड़कों पर वाहनों की संख्या

प्रदूषण में वाहनों की बढ़ती हिस्सेदारी के लिए वाहनों की बढ़ती संख्या जिम्मेवार है। गुजरात में 2022 में करीब 15.69 लाख नए वाहन पंजीकृत हुए थे। केंद्रीय परिवहन मंत्रालय की ऑनलाइन पोर्टल् वाहन के मुताबिक 2023 में यह संख्या बढ़कर 18.22 लाख, 2024 में 18.99 लाख और 2025 में 20.90 लाख हो गई। यानी चार साल में हर साल जुड़ने वाले नए वाहनों की संख्या में करीब 33 फीसदी की वृद्धि हुई।

खास बात यह है कि गुजरात में डीजल वाहनों की बिक्री कम होने के बजाय बढ़ रही है। 2022 में 1.88 लाख नए डीजल वाहन रजिस्टर हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 2.57 लाख हो गए। करीब 37 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वाहन पोर्टल में रजिस्टर वाहनों के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में गुजरात में 1.88 लाख डीजल वाहन पंजीकृत हुए, जो 2023 में बढ़कर 2.44 लाख, 2024 में 2.51 लाख और 2025 में 2.57 लाख हो गई।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस समय राज्य में करीब 2.93 करोड़ वाहन पंजीकृत हैं। वहीं राज्य अब भी पेट्रोल और डीजल पर बेहद ज्यादा निर्भर है। पंजीकृत कुल वाहनों में 2.08 करोड़ से अधिक पेट्रोल वाहन और 43 लाख से अधिक डीजल वाहन हैं। यानी केवल इन दो पारंपरिक ईंधनों पर चलने वाले वाहनों की संख्या 2.51 करोड़ से ज्यादा है। इसके अलावा करीब 18.47 लाख पेट्रोल-सीएनजी वाहन हैं। यह निर्भरता इसलिए चिंता की बात है क्योंकि वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पेट्रोल-डीजल आधारित परिवहन सीधे वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाता है।

चार शहरों में हैं 1.20 करोड़ वाहन

गुजरात के शीर्ष पांच रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (आरटीओ) में वाहनों का पंजीकरण सबसे अधिक सूरत (जीजे-5) में है, जहां करीब 34.02 लाख वाहन पंजीकृत हैं। इसके बाद अहमदाबाद (जीजे-1) में 30.42 लाख, राजकोट (जीजे-3) में 20.72 लाख, वडोदरा (जीजे-6) में 20.61 लाख और अहमदाबाद ईस्ट (जीजे-27) में करीब 13.4 लाख वाहन पंजीकृत हैं। यानी अकेले इन पांच आरटीओ में ही करीब 1.19 करोड़ वाहन हैं, जो राज्य में वाहनों के अत्यधिक संकेंद्रण और बड़े शहरों में बढ़ते मोटराइजेशन को दर्शाता है। अहमदाबाद में दो आरटीओ हैं।

कम नहीं हो रही पेट्रोल-डीजल वाहनों की हिस्सेदारी

वाहनों से होने वाले प्रदूषण की जड़ में सबसे बड़ी भूमिका जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोल और डीजल) की है। इनके दहन से कार्बन डाइऑक्साइड के साथ नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सूक्ष्म कण जैसे प्रदूषक निकलते हैं। खासकर डीजल वाहनों का प्रदूषण अधिक चिंताजनक है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के विश्लेषण के मुताबिक, भारत में सड़क परिवहन से होने वाले पीएम2.5 उत्सर्जन में डीजल की औसत हिस्सेदारी करीब 74 प्रतिशत और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में करीब 70 प्रतिशत है।

गुजरात के वाहन पंजीकरण के आंकड़े इसी विरोधाभास को सामने रखते हैं। राज्य में पेट्रोल व डीजल से चलने वाले वाहनों की संख्या बढ़ ही रही है। आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कुल पंजीकृत वाहनों में डीजल वाहनों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है। 13 अगस्त 2026 तक राज्य में तकरीबन 43 लाख 3 हजार वाहन डीजल वाहन पंजीकृत हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य में डीजल वाहनों के नए पंजीकरण में कमी नहीं आई है। साल 2022 में 1.88 लाख नए डीजल वाहन पंजीकृत हुए, जो 2023 में तेजी से बढ़कर 2.44 लाख हुए और फिर 2024 में 2.51 लाख तथा 2025 में 2.57 लाख तक पहुंच गए। यानी 2022 से 2025 के बीच नए डीजल वाहनों में करीब 37 प्रतिशत वृद्धि हुई। 2026 के अधूरे आंकड़े को पूरे साल से तुलना करना उचित नहीं है, लेकिन अब तक 1.82 लाख नए डीजल वाहन पंजीकृत हो चुके हैं।

वहीं, पेट्रोल से चलने वाले वाहनों की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है। पेट्रोल, पेट्रोल (ई20), पेट्रोल/सीएनजी और पेट्रोल-हाइब्रिड समेत सभी पेट्रोल संस्करणों को जोड़ने पर नए पेट्रोल-आधारित वाहनों की संख्या 2022 के 12.58 लाख से बढ़कर 2025 में 16.51 लाख हो गई, यानी करीब 31 प्रतिशत की वृद्धि। इनकी कुल नए वाहनों में हिस्सेदारी भी 2025 में करीब 79 प्रतिशत थी।

कितनी कारगर रही सीएनजी?

गुजरात में सीएनजी को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन के तौर पर बढ़ावा दिए जाने के बावजूद, कुल 2.93 करोड़ पंजीकृत वाहनों में सीएनजी से जुड़े वाहनों की संख्या करीब 23.69 लाख यानी 8.1 फीसदी है। बाकी 90 फीसदी से अधिक वाहन अन्य ईंधनों पर निर्भर हैं।

साल-दर-साल देखें तो सीएनजी वाहनों का पंजीकरण लगातार बढ़ा है। 2022 में 1.32 लाख, 2023 में 1.88 लाख, 2024 में 2.23 लाख और 2025 में 2.49 लाख नए सीएनजी वाहन पंजीकृत हुए। यानी 2022 से 2025 के बीच नए सीएनजी वाहनों का पंजीकरण करीब 89 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुल नए वाहनों में उनकी हिस्सेदारी भी 8.4 प्रतिशत से बढ़कर 11.9 प्रतिशत हो गई।

2026 में अब तक करीब 1.70 लाख सीएनजी वाहन पंजीकृत हुए हैं, जो इस अवधि के कुल नए वाहनों का लगभग 12.5 प्रतिशत है।

सीएनजी की बढ़ती हिस्सेदारी से यह तो कहा जा सकता है कि लोगों ने हरित ईंधन को अपनाया है, लेकिन इसका असर गुजरात के शहरों में प्रदूषण पर कितना पड़ा है, इसका अंदाजा साल 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन से लगाया जा सकता है।

‘एनवायरमेंटल साइंस: एटमॉस्फीयर्स’ में प्रकाशित इस अध्ययन में 1998 से 2020 के बीच गुजरात के चार शहरों के पीएम2.5 प्रदूषण की तुलना की गई। अध्ययन के अनुसार अहमदाबाद में पीएम2.5 का वार्षिक औसत 1998 के 41.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से बढ़कर 2020 में 51.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया, यानी 23 प्रतिशत वृद्धि।

राजकोट में यह 31.3 से बढ़कर 43.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हुआ, यानी 40 प्रतिशत, जबकि सूरत में 26.0 से 41.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गया, जो 59 प्रतिशत की सबसे बड़ी वृद्धि है। वडोदरा में पीएम2.5 का स्तर 33.1 से बढ़कर 45.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हुआ, यानी 37 प्रतिशत वृद्धि।

गौर करने वाली बात है कि इन शहरों में सीएनजी का इस्तेमाल 1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों में बढ़ना शुरू हो चुका था, फिर भी 2020 तक चारों शहरों में पीएम2.5 का स्तर 1998 की तुलना में अधिक रहा।

कैग ने भी उठाए सवाल

वाहन पोर्टल के गुजरात में बढ़ते वाहनों की संख्या और प्रदूषण के आंकड़े स्पष्ट बयां करते हैं कि गुजरात में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के अब तक के प्रयास ठोस साबित नहीं हो पाए हैं। बल्कि लगभग पांच माह पहले मार्च 2026 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से यह स्पष्ट पता चलता है कि राज्य सरकार वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के प्रति गंभीर नहीं है।

कैग की रिपोर्ट संख्या 1, 2026 में गुजरात के परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अप्रैल 2019 से मार्च 2024 तक के आंकड़ों की जांच में पाया गया कि 31 दिसंबर 2023 तक 39,12,554 वाहनों का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसीसी) समाप्त हो चुका था, लेकिन उसका नवीनीकरण नहीं कराया गया। वहीं 2009 से 2019 के बीच पंजीकृत 69,26,536 वाहनों ने पांच वर्षों में एक बार भी पीयूसीसी नवीनीकृत नहीं कराया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इसी अवधि में 1,95,209 वाहनों को वैध पीयूसीसी के बिना फिटनेस प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए। कैग ने इसे नियमों के कमजोर अनुपालन और निगरानी की कमी माना। उसका कहना है कि केवल वैध पीयूसीसी वाले वाहनों को ही सड़कों पर चलने देना परिवहन विभाग की जिम्मेदारी है, क्योंकि यह पर्यावरण प्रदूषण कम करने के लिए जरूरी है। राज्य ने ई-डिटेक्शन व्यवस्था का हवाला दिया, लेकिन कैग ने कहा कि लेखा-परीक्षा के समय यह व्यवस्था प्रभावी रूप से काम नहीं कर रही थी।

यानी गुजरात में प्रदूषण की चुनौती केवल बढ़ते वाहनों और जीवाश्म ईंधन तक सीमित नहीं है; प्रदूषण फैलाने वाले मौजूदा वाहनों की जांच और नियमों के पालन की व्यवस्था में भी बड़ी खामी है।

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