

दिल्ली में मानसून की बारिश भले ही हवा में मौजूद प्रदूषण को कुछ समय के लिए कम करती है, लेकिन यह राहत ज्यादा देर नहीं टिकती। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के नए आकलन के मुताबिक, जून से अगस्त 2026 के 92 दिनों के मानसून में दिल्ली को सिर्फ एक दिन ‘अच्छी’ वायु गुणवत्ता वाला मिला। इस दौरान कुल 576.9 मिलीमीटर बारिश हुई। यहां तक कि मानसून की सबसे ज्यादा बारिश वाले दिन भी हवा की गुणवत्ता केवल ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रही।
सीएसई के मुताबिक, बारिश हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम2.5 को कुछ समय के लिए नीचे बैठा देती है, लेकिन बारिश रुकने के बाद प्रदूषण तेजी से वापस लौटता है।
बारिश की छह अलग-अलग घटनाओं के अध्ययन में पाया गया कि बारिश से पहले पीएम2.5 का औसत स्तर 40.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। बारिश के दौरान यह घटकर 32.7 माइक्रोग्राम रह गया, यानी करीब 19.5 फीसदी की कमी आई। लेकिन बारिश खत्म होने के 24 घंटे बाद ही पीएम2.5 बढ़कर 36.2 माइक्रोग्राम हो गया।
48 घंटे बाद यह 45.1 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। यानी बारिश के दौरान आई कमी के मुकाबले 48 घंटे में पीएम2.5 में 37.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह बारिश से पहले के स्तर से भी 11.1 फीसदी ज्यादा था।
92 दिनों में सिर्फ एक दिन ‘अच्छी’ हवा
सीएसई के अध्ययन के अनुसार, 9 जुलाई 2026 को दिल्ली में ‘अच्छी’ वायु गुणवत्ता दर्ज हुई। उस दिन सफदरजंग और पालम मौसम केंद्रों पर दर्ज बारिश का संयुक्त औसत 67.75 मिलीमीटर था।
वहीं, 8 अगस्त को मानसून की सबसे ज्यादा एक दिन की बारिश 101.05 मिलीमीटर दर्ज हुई, लेकिन उस दिन भी वायु गुणवत्ता केवल ‘संतोषजनक’ रही। मानसून के दौरान दिल्ली में पीएम2.5 का औसत स्तर 40.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा।
इसके मुकाबले अप्रैल-मई 2026 की गर्मियों में पीएम2.5 का औसत स्तर 60.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। यानी मानसून में इसमें करीब 33.2 फीसदी की कमी आई। इसके बावजूद हवा लगातार ‘अच्छी’ श्रेणी में नहीं पहुंच सकी। मानसून में 53 दिन यानी 57.6 फीसदी दिन ‘मध्यम’ श्रेणी में रहे। 35 दिन ‘संतोषजनक’, तीन दिन ‘खराब’ और केवल एक दिन ‘अच्छी’ हवा रही।
बारिश के बाद प्रदूषण की तेज वापसी
सीएसई की अर्बन लैब की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर शरणजीत कौर के मुताबिक, दिल्ली में बारिश के दौरान प्रदूषण कम होने और बारिश रुकते ही तेजी से वापस बढ़ने का साफ पैटर्न दिखाई देता है। बारिश पीएम2.5 जैसे कणों को हवा से हटाती है, लेकिन प्रदूषण के स्रोतों से लगातार निकल रहा उत्सर्जन बंद नहीं होता। जैसे ही बारिश रुकती है और वातावरण सामान्य होता है, वाहनों, उद्योगों, कचरा जलाने और बिजली उत्पादन से निकलने वाला प्रदूषण फिर हवा में जमा होने लगता है।
कौर के मुताबिक, बारिश के बाद पीएम2.5 कम होने पर ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें दैनिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को प्रभावित करने वाले प्रमुख प्रदूषक बन जाती हैं। मानसून में भी ओजोन 20 दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की हिस्सेदारी गर्मियों के तीन फीसदी से बढ़कर मानसून में 10 फीसदी दिनों तक पहुंच गई, जबकि कार्बन मोनोऑक्साइड मानसून के सात फीसदी दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा।
सर्दियों से पहले चिंता
सीएसई की कार्यकारी निदेशक (रिसर्च एंड एडवोकेसी) अनुमिता रॉयचौधरी के मुताबिक, मानसून की बारिश से मिलने वाली राहत अस्थायी है। अगर भारी बारिश भी दिल्ली को लगातार ‘अच्छी’ हवा नहीं दे पा रही है और बारिश रुकने के 48 घंटे के भीतर प्रदूषण वापस बढ़ रहा है, तो यह बताता है कि शहर में प्रदूषण का आधार स्तर अभी भी ऊंचा है।
सीएसई का कहना है कि अब दक्षिण-पश्चिम मानसून दिल्ली से लौट चुका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, मानसून की आधिकारिक वापसी 23 सितंबर को हुई, जो सामान्य तारीख 25 सितंबर से दो दिन पहले है। इसके साथ बारिश से मिलने वाली प्राकृतिक सफाई का दौर खत्म हो रहा है। अब पोस्ट-मानसून और सर्दियों की मौसम संबंधी स्थितियां बनेंगी।
सर्दियों में हवा की ऊपरी परत की ऊंचाई कम होने, तापमान में उलटफेर और हवा के ठहराव जैसी स्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के करीब जमा हो सकते हैं। ऐसे में अगर प्रदूषण के स्रोतों से होने वाला उत्सर्जन पहले से कम नहीं किया गया तो सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
सिर्फ सर्दियों के प्रतिबंधों से नहीं चलेगा काम
सीएसई के मुताबिक, सर्दियों में अचानक लगाए जाने वाले आपातकालीन प्रतिबंध प्रदूषण को कुछ समय के लिए नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इनका असर आर्थिक गतिविधियों, रोजमर्रा की आजीविका, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कमाई और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ सकता है। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के लिए पूरे साल काम करने की जरूरत है।
सीएसई ने इसके लिए पूरे दिल्ली-एनसीआर में एक साथ काम करने की जरूरत बताई है। इसमें इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, माल ढुलाई के लिए शून्य-उत्सर्जन व्यवस्था, उद्योगों में स्वच्छ ईंधन और विद्युतीकरण, खुले में कचरा जलाने पर रोक, निर्माण कचरे का बेहतर प्रबंधन और डीजल जनरेटर पर निर्भरता कम करना शामिल है।
सीएसई के अध्ययन में अप्रैल-मई को गर्मी और जून-अगस्त को मानसून माना गया है। बारिश और पीएम2.5 के संबंध का आकलन किया गया है, लेकिन अध्ययन ने बारिश के प्रभाव को हवा की गति, हवा की दिशा, मिक्सिंग हाइट, आर्द्रता और उत्सर्जन में स्थानीय बदलाव जैसे अन्य मौसम संबंधी कारकों से अलग करके नहीं देखा है।
सीएसई का निष्कर्ष है कि दिल्ली-एनसीआर को मानसून की बारिश या सर्दियों में लगाए जाने वाले अस्थायी प्रतिबंधों पर निर्भर रहने के बजाय पूरे साल और पूरे एयरशेड में प्रदूषण के स्रोतों पर स्थायी रूप से काम करना होगा।