

क्रूज जहाज समुद्र के किनारे पर्यटन और खूबसूरती का प्रतीक नजर आते हैं, लेकिन उनका धुआं बंदरगाहों के आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता की वजह बन सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन के नेतृत्व में हुए अध्ययन में पाया गया कि जहाजों से निकलने वाले अल्ट्राफाइन प्रदूषक कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर सूजन बढ़ा सकते हैं और वायरस से बचाव की क्षमता कमजोर कर सकते हैं।
साउथेम्प्टन बंदरगाह की हवा में वैनेडियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे धातु तत्व पाए गए, जिनका स्तर क्रूज टर्मिनल के आसपास अधिक था।
प्रयोगशाला में इन प्रदूषकों के संपर्क में आने पर फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन बढ़ाने वाले जीन सक्रिय हुए, जबकि वायरस से लड़ने वाले जीन कमजोर पड़े।
खास तौर पर वैनेडियम के संपर्क में सर्दी-जुकाम और कोविड-19 से जुड़े वायरस की प्रतिकृति बढ़ने के संकेत मिले। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि जहाजों के उत्सर्जन को कम करने के साथ इन बेहद महीन कणों की नियमित निगरानी जरूरी है।
समुद्र के किनारे खड़ा एक विशाल क्रूज जहाज बाहर से जितना खूबसूरत दिखाई देता है, उसके धुएं का असर आसपास रहने वाले लोगों के लिए उतना ही चिंताजनक हो सकता है।
एक नई स्टडी में सामने आया है कि क्रूज जहाजों से निकलने वाले प्रदूषण के बेहद महीन कण फेफड़ों में सूजन को बढ़ा सकते हैं और शरीर की वायरस का सामना करने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं। इससे सर्दी-जुकाम और कोविड-19 जैसे वायरल संक्रमणों का खतरा बढ़ने की आशंका है।
इसे समझने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के साउथेम्प्टन बंदरगाह की हवा का अध्ययन किया।
अध्ययन के दौरान इस क्षेत्र की हवा में प्रदूषण के बेहद महीन कण यानी अल्ट्राफाइन पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) पाए गए। ये कण इंसानी बाल की चौड़ाई के एक हजारवें हिस्से से भी महीन होते हैं। साथ ही इन कणों में जहाजों के ईंधन के जलने से पैदा होने वाले वैनेडियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे धातु तत्व भी पाए गए।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये बेहद महीन कण फेफड़ों में सामान्य बड़े प्रदूषक कणों की तुलना में कहीं अधिक गहराई तक पहुंच सकते हैं। यहां तक कि इनके रक्त में प्रवेश करने की भी आशंका है।
चिंता की बात यह है स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभावों के बावजूद इस आकार के प्रदूषक कणों की नियमित निगरानी और नियमन अभी बेहद सीमित है।
क्या है यह अदृश्य खतरा?
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पहली बार किसी व्यस्त बंदरगाह में मौजूद सूक्ष्म कणों की संरचना और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की विस्तृत जांच की है।
इसके लिए साउथेम्प्टन बंदरगाह के आसपास पांच जगहों से हवा के नमूने लिए गए। इनमें भारी वाहनों की आवाजाही वाला डॉक गेट, कंटेनर जहाजों की आवाजाही वाला टर्मिनल और व्यस्त क्रूज टर्मिनल शामिल थे। तुलना के लिए बंदरगाह से करीब पांच किलोमीटर दूर एक अन्य जगह से भी हवा के नमूने लिए गए। ये सभी नमूने गर्मियों और सर्दियों, दोनों मौसमों में लिए गए।
रिसर्च में क्रूज टर्मिनल पर गर्मियों के व्यस्त मौसम में वैनेडियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे तत्वों की मात्रा सर्दियों की तुलना में अधिक मिली। बंदरगाह के अधिकांश हिस्सों में भी इन तत्वों का स्तर बंदरगाह से करीब पांच किलोमीटर दूर लिए नमूनों की तुलना में ज्यादा था।
क्रूज जहाजों के पास हवा में बढ़े जहरीले कण
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जब हवा क्रूज जहाजों की दिशा से चल रही थी और बंदरगाह में अधिक क्रूज मौजूद थे, तब इन प्रदूषक तत्वों का स्तर भी बढ़ गया।
यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन और अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर नैट ईस्टन के मुताबिक, क्रूज टर्मिनल पर प्रदूषण की अधिक मात्रा की एक वजह यह हो सकती है कि बंदरगाह में खड़े क्रूज जहाजों के इंजन यात्रियों के लिए गर्मी, गर्म पानी, रोशनी और खाना पकाने जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए चलते रहते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में फेफड़ों की अंदरूनी परत बनाने वाली कोशिकाओं पर इन अल्ट्राफाइन कणों के असर का भी अध्ययन किया है।
फेफड़ों की कोशिकाओं पर क्या हुआ असर?
इससे पता चला कि गर्मियों में क्रूज टर्मिनल से लिए गए प्रदूषण के नमूनों के संपर्क में आने पर कोशिकाओं में सूजन से जुड़े जीन अधिक सक्रिय हो गए। इसके उलट, वायरस से लड़ने वाली कोशिकाओं की क्षमता से जुड़े जीन की सक्रियता कम हो गई।
यानी प्रदूषण के संपर्क में आने के बाद फेफड़ों की कोशिकाएं एक तरफ सूजन की स्थिति पैदा हो रही थीं, वहीं दूसरी तरफ वायरस से बचाव की उनकी क्षमता कमजोर पड़ रही थी। आगे के परीक्षणों में शोधकर्ताओं ने पाया कि इसमें वैनेडियम की अहम भूमिका हो सकती है।
इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए शोधकर्ताओं ने स्वस्थ लोगों के फेफड़ों से ली गई ब्रोंकियल (श्वसन नली) की कोशिकाओं को इंसानों में पाए जाने वाले राइनोवायरस से संक्रमित किया।
बता दें कि यही वायरस सर्दी-जुकाम का कारण बनता है और अस्थमा के अटैक के बाद अस्पताल में भर्ती होने के प्रमुख कारणों में से एक है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने कोविड-19 कोरोना वायरस संक्रमण के एक मॉडल की भी मदद ली है।
जब इन कोशिकाओं को वैनेडियम के संपर्क में रखा गया, तो दोनों वायरस की प्रतिकृतियों यानी उनकी संख्या में बढ़ोतरी देखी गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि वैनेडियम फेफड़ों की कोशिकाओं की वायरस को बढ़ने से रोकने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। इसका संक्रमण की गंभीरता और उसके प्रसार पर असर पड़ सकता है।
जहाजों के धुएं में क्यों बढ़ जाता है वैनेडियम?
अब सवाल यह है कि इन जहाजों के धुंए में वैनेडियम का स्तर क्यों बढ़ जाता है?
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन में रेस्पिरेटरी बायोलॉजी एंड टॉक्सिकोलॉजी के प्रोफेसर मैथ्यू लॉक्सहैम के मुताबिक, जब कच्चे तेल को रिफाइन किया जाता है, तो उसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद वैनेडियम भारी ईंधन में अधिक मात्रा में जमा हो जाता है, क्योंकि पेट्रोल और केरोसिन को अलग कर दिया जाता है।
कई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले इस भारी ईंधन को जलाने पर वैनेडियम का कुछ हिस्सा वाष्प में बदल जाता है और धुएं के साथ बाहर निकलकर हवा में मिल जाता है।
शोधकर्ता डॉक्टर नैट ईस्टन ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया है कि क्रूज जहाजों से जुड़े कणों में वैनेडियम और निकेल की मात्रा कंटेनर जहाजों से जुड़े कणों की तुलना में काफी अधिक थी।
बंदरगाहों के आसपास रहने वालों की सांस पर बढ़ा खतरा
अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अकेले साउथेम्प्टन में 2025 के दौरान 25 लाख से अधिक क्रूज यात्री पहुंचे थे। यह ब्रिटेन का प्रमुख वाहन और गहरे समुद्री व्यापार वाला बंदरगाह भी है। यानी यहां जहाजों की आवाजाही और उनसे जुड़े प्रदूषण का सामना एक बड़ी आबादी करती है।
एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया भर में इंसानों द्वारा किए जा रहे ग्रीनहाउस गैसों के करीब 3 फीसदी हिस्से के लिए शिपिंग जिम्मेवार है। इसके बारे में अनुमान है कि 2050 तक उसमें 50 फीसदी का इजाफा हो सकता है।
हालांकि इसके बावजूद अभी भी इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा। यही नहीं शिपिंग के कारण पैदा होने वाले अन्य प्रदूषक जैसे नाइट्रोजन और सल्फर ऑक्साइड भी स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। ये प्रदूषक हवा की गुणवत्ता को इतना कम कर देते हैं, जिससे असमय मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि बंदरगाहों के आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जहाजों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना जरूरी है। इसके लिए बंदरगाह पर जहाजों को अपने इंजन बंद करके, बिजली के साफ-सुथरे स्रोतों, कम प्रदूषण पैदा करने वाले वैकल्पिक ईंधन और उत्सर्जन नियंत्रण की बेहतर तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत है।
साथ ही, अल्ट्राफाइन पार्टिकुलेट मैटर और उनमें मौजूद धातु तत्वों की नियमित निगरानी भी जरूरी है। फिलहाल ऐसे बेहद महीन कणों और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की पर्याप्त निगरानी नहीं होती।
हमें समझना होगा कि जहाजों से निकलता धुआं सिर्फ बंदरगाह के ऊपर उठता बादल नहीं है। इसमें मौजूद प्रदूषण के बेहद महीन कण सांसों के साथ फेफड़ों तक पहुंचकर शरीर की वायरस से लड़ने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसे में समुद्र के किनारे रहने वाले लोगों के लिए साफ हवा केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि स्वस्थ सांस और संक्रमण से बचाव का सवाल भी है।