सफेद होता हिमालयः जलवायु परिवर्तन से बचाव की कीमत और सेब के पहाड़ों पर फैलती प्लास्टिक की चादर

हिमाचल के सेब बागानों में ओलावृष्टि से बचाव के लिए लगी सफेद एंटी-हेल नेट ने पूरे परिदृश्य का रंग और माइक्रोक्लाइमेट बदल दिया है, लेकिन इन्हीं जालियों से भविष्य में जैव विविधता, मिट्टी, जल स्रोतों और किसानों की आजीविका पर नए संकट मंडरा रहे हैं
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के नारकंडा क्षेत्र में सेब के बागानों में ओले से बचाने के लिए बागवानों द्वारा लगाई फैली एंटी हेल नेट । फोटो: रोहित पराशर
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के नारकंडा क्षेत्र में सेब के बागानों में ओले से बचाने के लिए बागवानों द्वारा लगाई फैली एंटी हेल नेट । फोटो: रोहित पराशरspiu shimla
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हिमाचल की राजधानी शिमला से 10 किलोमीटर ऊपर की ओर बढ़ते हुए अचानक ऐसा लगता है मानो जून के महीने में हिमालय पर ताजा बर्फबारी हुई हो। दूर-दूर तक पहाड़ सफेद दिखाई देते हैं। पहली नजर में लगता है कि ऊंची चोटियों से बर्फ नीचे तक उतर आई है। लेकिन थोड़ी ही देर में भ्रम टूट जाता है। यह बर्फ नहीं, बल्कि हजारों बीघा सेब बागानों पर फैली सफेद एंटी-हेल नेट हैं, जिन्होंने हिमाचल प्रदेश के सेब बहुल इलाकों का रंग बदल दिया है।

ठियोग, कोटखाई, जुब्बल, रोहड़ू, कुमारसैन, बागी, रतनाड़ी और नारकंडा से गुजरते हुए यह दृश्य अब सामान्य हो चुका है। एक दशक पहले तक इन पहाड़ों की पहचान हरे-भरे सेब बागानों, देवदार के जंगलों और प्राकृतिक हिमालयी परिदृश्य से होती थी, लेकिन आज गर्मियों में कई पहाड़ पूरी तरह सफेद दिखाई देते हैं।

यह बदलाव केवल रंग का नहीं है। यह हिमालयी कृषि, पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन के बीच बदलते संबंधों की कहानी है। हिमाचल प्रदेश की लगभग 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था और उससे जुड़ी 10 लाख से अधिक लोगों की आजीविका अब ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां फसल बचाने के लिए किसानों को अपने पूरे परिदृश्य को बदलना पड़ रहा है।

नारकंडा के सरकाल्टी गांव के 41 वर्षीय बागवान विकेश कंवर की तीन पीढ़ियां सेब बागवानी से जुड़ी रही हैं। 15 बीघा में फैले उनके बाग में सफेद एंटी-हेल नेट दूर से ही दिखाई देती हैं।

विकेश कहते हैं, “अब जाली के बिना सेब बागवानी लगभग असंभव हो गई है। मौसम का कोई भरोसा नहीं रहा। कभी भी ओलावृष्टि हो जाती है। अगर ओले पड़ जाएं तो 60 से 70 प्रतिशत तक फसल खराब हो सकती है।” वे बताते हैं कि उन्होंने करीब तीन लाख रुपये खर्च कर जालियां खरीदी हैं। फायदा यह है कि फसल बच जाती है, लेकिन नुकसान भी कम नहीं हैं। जालियां खरीदना, चढ़ाना और उतारना महंगा है। मजदूर मिलना मुश्किल हो गया है। कई बार पौधों को भी नुकसान पहुंचता है।

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के नारकंडा क्षेत्र में सेब के बागानों में ओले से बचाने के लिए बागवानों द्वारा लगाई फैली एंटी हेल नेट । फोटो: रोहित पराशर
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के नारकंडा क्षेत्र में सेब के बागानों में ओले से बचाने के लिए बागवानों द्वारा लगाई फैली एंटी हेल नेट । फोटो: रोहित पराशरspiu shimla

शिमला में सेब इलाकों में मार्च में फ्लावरिंग से पहले जालियां चढ़ाई जाती हैं और अगस्त-सितंबर में फसल समाप्त होने के बाद उतारी जाती हैं। इसके बाद उन्हें अगले सीजन तक सुरक्षित रखना पड़ता है। कभी जो बागवान मौसम पर निर्भर रहते थे, अब वे प्लास्टिक संरचनाओं पर निर्भर हो चुके हैं। प्लास्टिक की इन संरचनाओं को एंटी-हेल नेट कहते हैं, यह एक बड़े आकार की सफेद रंग की जाली होती है, जिन्हें बागवान अपनी सेब और अन्य फलों के पेड़ों के उपर लगाते हैं ताकि ओलावृष्टी के दौरान फलों को नुकसान से बचाया जा सके।

सेब बागवानों की ओर से जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के जालियों को लगाने को लेकर निकाले गए सॉल्यूशन से उन्हें फौरी तौर पर तो राहत मिल रही है लेकिन निकट भविष्य में यह राहत न सिर्फ उनके लिए बल्कि उपभोक्ताओं और पर्यावरण के लिए आफत का रूप ले सकती है।

शिमला के ठियोग इलाके के बागवान रोहित शर्मा बताते हैं कि पिछले 15 वर्षों में मौसम पूरी तरह बदल गया है। “पहले ओलावृष्टि कुछ विशेष इलाकों तक सीमित रहती थी। अब कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों से लेकर मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों तक हर जगह ओले पड़ रहे हैं। बागवान मजबूरी में हेल नेट लगा रहे हैं।”

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हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के नारकंडा क्षेत्र में सेब के बागानों में ओले से बचाने के लिए बागवानों द्वारा लगाई फैली एंटी हेल नेट । फोटो: रोहित पराशर

किसानों की यह चिंता केवल उनके आंखों देखे अनुभव की नहीं है। शोधार्थी भी हिमालयन रिजन में पड़ने वाले इस क्षेत्र में पड़ रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को मान चुके हैं। प्लस वन में प्रकाशित एक शोध में भारत, कनाडा और जापान के वैज्ञानिकों ने पाया है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम में आ रहे बदलावों की वजह से सेब बागवानी तेज़ी से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रही है।

हिमाचल प्रदेश में जहां 1980 के दशक में सेब बागवानी 1200 से 1500 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होती थी, वह वर्ष 2000 तक 1500 से 2000 मीटर और 2014 तक लगभग 3500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंच गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों के मौसम में बदलाव की वजह से वे बागवानी के लिए अधिक अनुकूल हो गए हैं, जबकि कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण चिलिंग आवर्स पूरे नहीं हो पा रहे हैं।

ओलावृष्टि किसानों के लिए केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि आर्थिक आपदा है। कुछ मिनटों की ओलावृष्टि पूरे साल की मेहनत को समाप्त कर सकती है। यही कारण है कि एंटी-हेल नेट तेजी से लोकप्रिय हुईं। लेकिन ये जालियां केवल ओलों को नहीं रोकतीं। वे बागों के भीतर एक अलग सूक्ष्म जलवायु भी तैयार करती हैं।

नेट के नीचे बदलता मौसम

डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि नेट के नीचे तापमान लगभग 11 प्रतिशत कम, प्रकाश की मात्रा 32 प्रतिशत कम और मिट्टी की नमी लगभग 8 प्रतिशत अधिक थी। वहीं उत्पादन में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अध्ययन में यह भी पाया गया कि नेट के नीचे हवा की गति कम होती है, आर्द्रता बढ़ती है और मिट्टी अधिक समय तक नम रहती है।

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नौणी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के शोधकर्ता अंकुश चौहान कहते हैं, “जब हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में जालियां लगती हैं तो वे प्रकाश, तापमान, नमी और हवा की गति को प्रभावित करती हैं। यह पूरा माइक्रोक्लाइमेट बदल देती हैं। इसके दीर्घकालिक प्रभावों को अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।”  अंकुश शोधकर्ता के साथ साथ बागवान भी हैं और वे मानते हैं कि मौसम में आ रहे बदलावों का असर उनके इलाके में स्पष्ट दिखना शुरू हुआ है और जालियां लगाना इसका सतत समाधान नहीं है इसलिए विषय पर गहन अध्ययन और एक वृहद योजना तैयार कर बागवानी को बचाने के लिए सामूहिक प्रयासों में तेजी लानी चाहिए तभी बागवानी केा भविष्य के लिए बचाया जा सकता है।

नारकंडा के बागवान प्रशांत बताते हैं कि एंटी-हेल नेट का दूसरा पक्ष भी है। “नेट के नीचे नमी अधिक रहती है। कई बार फंगल और बैक्टीरियल रोग बढ़ जाते हैं। उनसे बचने के लिए अतिरिक्त दवाइयों का प्रयोग करना पड़ता है।” दिलचस्प बात यह है कि अध्ययन में भी किसानों ने कीटों और रोगों के बढ़ते प्रकोप को जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख संकेतक माना था। निचले क्षेत्रों में किसानों ने कीट आक्रमण और मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एप्पल स्कैब को प्रमुख समस्या बताया। यानी बदलती जलवायु और बदलते माइक्रोक्लाइमेट दोनों मिलकर रोगों की नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।

जैव विविधता पर सवाल

नौणी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और कीट वैज्ञानिक डॉ. राजेश्वर सिंह चंदेल कहते हैं, “हालांकि किसान परागण के लिए मधुमक्खियों के बक्से रखते हैं, लेकिन जालियां फिर भी कीट-पतंगों और अन्य परागणकर्ताओं की आवाजाही को प्रभावित करती हैं। वे एक प्रकार का भौतिक अवरोध बन जाती हैं।” सेब उत्पादन केवल शहद की मधुमक्खियों पर निर्भर नहीं करता। जंगली मधुमक्खियां, तितलियां, होवरफ्लाई और अनेक स्थानीय कीट भी परागण प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। इसके अलावा पहाड़ों में लगे इन बागों में कई तरह के पक्षी, तितलियां और कई तरह के पतंगों की आहार की निर्भरता रहती है, यदि पूरे परिदृश्य में हजारों हेक्टेयर क्षेत्र जालियों से ढक जाए, तो इन प्रजातियों की आवाजाही और व्यवहार पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. पवन राणा का मानना है कि इतने बड़े क्षेत्र में कृत्रिम संरचनाओं का फैलाव पारिस्थितिकी पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता। “भले ही ये जालियां साल में कुछ महीनों के लिए लगाई जाती हों, लेकिन इतने बड़े स्तर पर इनके प्रभावों का अध्ययन अभी तक पर्याप्त रूप से नहीं हुआ है। जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी पर इनके असर को समझना जरूरी है।”

सफेद होते पहाड़

पर्यावरण संरक्षक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अतुल कौशिक इस पूरे बदलाव को एक बड़े नजरिए से देखते हैं। उनके मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर किस तरह बढ़ रहा है, इसका अंदाज़ा इन जालियों को देखकर ही लगाया जा सकता है। “आज शिमला से ऊपर के अधिकांश सेब बहुल पहाड़ गर्मियों में सफेद दिखाई देते हैं। पहले इन पहाड़ों की पहचान हरे-भरे बागों और जंगलों से होती थी। अब जलवायु परिवर्तन ने किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए पूरे परिदृश्य को प्लास्टिक आधारित संरचनाओं से ढंकने पर मजबूर कर दिया है।”

कौशिक कहते हैं कि यह केवल कृषि तकनीक नहीं, बल्कि हिमालयी लैंडस्केप का दृश्य और पारिस्थितिक परिवर्तन है।

सस्टेनेबल फूड सिस्टम विशेषज्ञ और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स (IFOAM) के पूर्व अकादमी मैनेजर आशीष गुप्ता बताते हैं कि पिछले एक दशक में हिमाचल की सेब बागवानी में भारी बदलाव आया है। पारंपरिक बागों की जगह अब तेज़ी से हाई-डेंसिटी सेब बागवानी मॉडल अपनाया जा रहा है। “हाई-डेंसिटी बागवानी के लिए पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों को समतल किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर कटिंग और लेवलिंग हो रही है। इससे सिर्फ भूमि उपयोग नहीं बदल रहा, बल्कि पहाड़ों की प्राकृतिक हाइड्रोलॉजी भी प्रभावित हो रही है।”

गुप्ता के अनुसार पारंपरिक सेब बागानों में प्राकृतिक ढलानों, घास, झाड़ियों और स्थानीय वनस्पतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, जो वर्षा जल को सोखने और मिट्टी को स्थिर रखने में मदद करती थीं। लेकिन नए मॉडल में भूमि को अधिक व्यवस्थित और समतल बनाने के लिए किए जा रहे हस्तक्षेप पहाड़ों की प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को प्रभावित कर रहे हैं। “जब पहाड़ की प्राकृतिक संरचना बदलती है तो उसकी पानी को रोकने और धीरे-धीरे छोड़ने की क्षमता भी प्रभावित होती है। कई क्षेत्रों में इससे मिट्टी की पकड़ कमजोर पड़ती है और भूस्खलन का जोखिम बढ़ सकता है।”

उनका मानना है कि एंटी-हेल नेट इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण किसान फसल बचाने के लिए जालियों का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में इनका विस्तार भविष्य में नई पर्यावरणीय चुनौतियां भी पैदा कर सकता है। “जालियां फसल बचाने के लिए जरूरी हो सकती हैं, लेकिन इतने बड़े स्तर पर इनके उपयोग का जैव विविधता पर प्रभाव पड़ सकता है। हमें यह समझना होगा कि परागणकर्ता, पक्षी और अन्य जीव-जंतु इस बदलते परिदृश्य में कैसे प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा भी उत्पन्न होगा, जिसके वैज्ञानिक और संस्थागत प्रबंधन की अभी से योजना बनानी होगी।”

प्लास्टिक का अगला संकट

इस पूरी कहानी का सबसे अनदेखा पहलू वह प्लास्टिक है जो आज हिमालय की ढलानों पर बिछ रहा है। इनकी औसत आयु 7 से 10 वर्ष मानी जाती है, जिसके बाद इन्हें बदलना पड़ता है। हिमाचल के हजारों हेक्टेयर सेब बागानों में फैली इन जालियों का कुल भार कितना है, इसका कोई आधिकारिक आकलन उपलब्ध नहीं है, लेकिन यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो अगले दशक में हजारों टन कृषि प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हो सकता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पुरानी जालियों का क्या होगा। क्या उन्हें पुनर्चक्रित किया जाएगा, क्या वे खुले में छोड़ दी जाएंगी, क्या उन्हें जलाया जाएगा, या वे अंततः लैंडफिल तक पहुंचेंगी? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। सरकार के स्तर पर इनके निपटान के लिए कोई ठोस व्यवस्था या सुविधा भी सामने नहीं आई है।

दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में उपयोग होने वाले प्लास्टिक को लेकर चिंता बढ़ रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने दिखाया है कि प्लास्टिक सामग्री सूर्य की पराबैंगनी किरणों, बारिश, बर्फ और तापमान के प्रभाव से धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक कणों में बदल सकती है, जो मिट्टी, जल स्रोतों और खाद्य श्रृंखला तक पहुंचते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में एंटी-हेल नेट के तेज़ी से बढ़ते उपयोग के साथ यह आशंका भी उभर रही है कि भविष्य में सेब बागानों की मिट्टी और आसपास के जल स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण बढ़ सकता है।

हालांकि इस विषय पर हिमालयी परिस्थितियों में अभी पर्याप्त अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे भविष्य के महत्वपूर्ण शोध क्षेत्रों में से एक मानते हैं।

हिमालय के लिए बेहतर विकल्प?

हिमाचल प्रदेश फल, सब्जी एवं फूल उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरिष चौहान का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में प्लास्टिक जालियों का प्रयोग बहुत अधिक बढ़ा है। उनके अनुसार यह सेब को ओलों से बचाने का केवल एक अस्थायी समाधान है, लेकिन यदि भविष्य में इस प्लास्टिक के सही निपटान की तैयारी नहीं की गई, तो यह एक बड़ी आपदा के रूप में सामने आ सकता है। वे कहते हैं कि हिमाचल की बागवानी अर्थव्यवस्था को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए एंटी-हेल गन, क्लाउड सीडिंग जैसे अन्य विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए और समय की मांग के साथ तकनीकों में बदलाव करना चाहिए।

हरीश चौहान उस सवाल को और मजबूत करते हैं जो पूरे हिमालयी परिदृश्य के सामने खड़ा है कि क्या हम जलवायु परिवर्तन से लड़ने के नाम पर एक नई पर्यावरणीय चुनौती को जन्म दे रहे हैं?

समाधान, लेकिन स्थायी नहीं

एंटी-हेल नेट ने किसानों को राहत दी है। उन्होंने फसल बचाई है, उत्पादन बढ़ाया है और बदलते मौसम की मार को कुछ हद तक कम किया है। लेकिन साथ ही उन्होंने नए सवाल भी खड़े किए हैं। क्या हम जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए एक नया कृत्रिम हिमालय बना रहे हैं? क्या परागणकर्ताओं, कीटों और स्थानीय जैव विविधता की दुनिया बदल रही है? क्या आने वाले वर्षों में प्लास्टिक कचरा और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण एक नई चुनौती बनेंगे?

शिमला से रोहड़ू और किन्नौर तक फैली सफेद जालियां केवल कृषि तकनीक नहीं हैं। वे हिमालय में बदलते मौसम की सबसे दृश्य और सबसे शक्तिशाली अभिव्यक्तियों में से एक हैं। वे बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की कोई दूरस्थ चेतावनी नहीं है, बल्कि आज किसानों के फैसलों, पहाड़ों के रंग और हिमालय की पारिस्थितिकी को बदल रहा है। एक समय था जब इन पहाड़ों का रंग मौसम तय करता था, आज उनका रंग जलवायु परिवर्तन और उससे निपटने के लिए चुने गए समाधानों से तय हो रहा है।

इन सफेद पहाड़ों को देखकर एक सवाल बार-बार उभरता है। क्या हम जलवायु परिवर्तन से लड़ते-लड़ते हिमालय को बदल रहे हैं, या हिमालय को बचाने की कोशिश में एक नया पर्यावरणीय संकट पैदा कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब शायद आने वाले वर्षों में मिलेगा। फिलहाल इतना साफ दिख रहा है कि हिमालय का रंग बदल रहा है और उसके साथ बदल रही है उसकी पूरी कहानी।

रोहित पराशर एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब के मेंटी हैं। यह कार्यक्रम जर्मनी के इंटरलिंक एकेडमी द्वारा समर्थित है।

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