सेब से अनिश्चितता तक: जलवायु परिवर्तन और हिमालय में बदलती आजीविकाएं

बदलते मौसम के साथ सेब के बजाए अन्य फलों की ओर बढ रहा किसान बागवानों का रूझान
हिमाचल के शिमला में लगे सेब के पेड़। फोटो: रोहित पराशर
हिमाचल के शिमला में लगे सेब के पेड़। फोटो: रोहित पराशर
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सारांश
  • हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण सेब की खेती अनिश्चित हो गई है

  • हिमाचल प्रदेश के बागवान अब कीवी जैसे अन्य फलों की ओर रुख कर रहे हैं

  • बदलते मौसम ने सेब उत्पादन को जोखिम भरा बना दिया है, जिससे बागवानों की आजीविका प्रभावित हो रही है

  • सरकार भी अन्य फलों को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं शुरू कर रही है

फरवरी के पहले सप्ताह में पहाड़ सूने हैं। न बर्फ की सफेदी है, न ठिठुरन भरी ठंड और न ही वह सर्दियों की खामोशी, जो कभी इस मौसम की पहचान हुआ करती थी। पहाड़ी ढलानों पर धूप तेज है और हवा में वह ठंडक गायब है, जो सदियों से हिमालयी जीवन का आधार रही।

बदलता मौसम अब केवल प्रकृति का संकट नहीं रहा, बल्कि हिमालयी लोगों की उस आजीविका को भी हिला रहा है, जो पीढ़ियों से स्थिर सर्दियों, भरोसेमंद बर्फबारी और सेब की खेती पर टिकी रही है।

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के चौपाल क्षेत्र में सेब बागवान कृपाल धौल्टा अपने बगीचे की ओर देखते हुए कहते हैं, "सेब की खेती अब पूरी तरह अनिश्चित हो चुकी है। मौसम अगर साथ दे तो पैदावार हो जाती है, नहीं तो लागत तक निकालना मुश्किल हो जाता है।"

वे बताते हैं कि पहले नवंबर-दिसंबर से बर्फ गिरनी शुरू हो जाती थी और जनवरी-फरवरी तक लगातार बर्फबारी होती रहती थी। उस समय सेब के पौधों को जरूरी ठंड अपने आप मिल जाती थी। लेकिन इस साल 22 जनवरी तक न बारिश हुई और न ही बर्फ का एक भी फाहा गिरा।

यही बदला हुआ मौसम उन्हें उस फैसले तक ले आया, जो कभी इस इलाके में असंभव माना जाता था। उन्होंने अपने दो बीघा सेब के बाग काट दिए और वहां कीवी का बागीचा लगा दिया।

वे कहते हैं “यह फैसला केवल फसल बदलने का नहीं था, बल्कि परिवार की आजीविका को बचाने की मजबूरी थी। अब सेब केवल खेती नहीं, बल्कि जोखिम बन चुका है।”

कृपाल धौल्टा की कहानी अकेले एक किसान की नहीं है। यह हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते मौसम और उसके प्रभाव से जूझती सेब बागवानी की सामूहिक तस्वीर है।

सेब बागवान मनदीप । फोटो: रोहित पराशर
सेब बागवान मनदीप । फोटो: रोहित पराशर

हिमाचल प्रदेश से लेकर जम्मू–कश्मीर तक लाखों बागवान आज इसी असमंजस से गुजर रहे हैं कि सेब पर भरोसा बनाए रखा जाए या अब नए विकल्प तलाशना ही एकमात्र रास्ता बचा है। यह संकट केवल कुछ गांवों या जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में देश की एक बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है।

बदलते मौसम का यह असर अब केवल प्राकृतिक बदलाव नहीं रहा, बल्कि हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर के लाखों लोगों की सबसे भरोसेमंद आजीविका यानी सेब बागवानी पर सीधा पड़ने लगा है।

घटती बर्फबारी, कम होते चिलिंग आवर (शीतकाल), असामान्य बारिश और बढ़ते तापमान ने सेब उत्पादन को पहले से कहीं अधिक अनिश्चित बना दिया है।

यही वजह है कि प्रदेश के बागवान अब केवल सेब पर निर्भर रहने के बजाय अन्य फलों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और हिमाचल की बागवानी व्यवस्था धीरे-धीरे सेब-केंद्रित मॉडल से बाहर निकलती दिखाई दे रही है।

फोटो: रोहित पराशर
फोटो: रोहित पराशर

सोलन जिले के युवा बागवान मनदीप वर्मा ने अपने खेतों में एक हजार से अधिक कीवी के पौधे लगाए हैं और वे इससे हर वर्ष 50 लाख रुपये से अधिक की आय अर्जित कर रहे हैं।

मनदीप बताते हैं कि यदि ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सेब आज भी एक महत्वपूर्ण फसल है, तो मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों के लिए कीवी एक बेहद मजबूत विकल्प बनकर उभरा है।

वे 20 बीघा भूमि पर कीवी की दो किस्में एलिसन और हेवर्ड के साथ सेब की खेती भी कर रहे हैं।

उनका कहना है कि कीवी उत्पादन में लागत अपेक्षाकृत कम है। इसमें न तो बीमारियों का बड़ा खतरा रहता है और न ही जंगली जानवरों से नुकसान की समस्या गंभीर होती है। बाजार के लिहाज से भी कीवी अपेक्षाकृत स्थिर फसल मानी जाती है।

आम तौर पर इसके दाम 150 से 350 रुपये प्रति किलो के बीच बने रहते हैं, जबकि सेब को इन दरों पर बेचना आज अधिकांश बागवानों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

इस बदलाव की पुष्टि सरकारी आंकड़े भी करते हैं। बागवानी विभाग हिमाचल प्रदेश की वेबसाइट पर उपलब्ध डाटा के अनुसार राज्य में सेब बागवानी के अंतर्गत आने वाला कुल क्षेत्रफल अब लगभग स्थिर हो गया है, जबकि अन्य फलों के रकबे में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

परसीमन (जापानी फल) के क्षेत्रफल में बीते 5 वर्षों में लगभग दो गुना वृद्धि हुई है, वहीं कीवी फल के क्षेत्र में 60 प्रतिशत से अधिक का इजाफा दर्ज किया गया है। यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि हिमाचल में बागवानी की दिशा अब बदल रही है।

सरकारी स्तर पर भी यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2015–16 में बागवानी विभाग हिमाचल प्रदेश द्वारा बागवानों को 13,27,900 सेब के पौधे वितरित किए गए थे, लेकिन वर्ष 2021–22 में यह संख्या घटकर लगभग आधी  7,45,813 पौधों तक सिमट गई। इसके विपरीत, इसी अवधि में परसीमन जैसे वैकल्पिक फलों के पौधों का वितरण 4,515 से बढ़कर 18,128 तक पहुंच गया।

मौसम की बढ़ती अनिश्चितता को देखते हुए राज्य सरकार भी अब सेब के साथ-साथ अन्य फलों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। कीवी, सिट्रस फ्रूट, ड्रैगन फ्रूट और ब्लूबेरी जैसे फलों को भविष्य की जलवायु के अनुकूल मानते हुए इनके उत्पादन पर विशेष बल दिया जा रहा है।

इसी क्रम में वर्ष 2017 में हिमाचल सरकार ने मुख्यमंत्री कीवी प्रोत्साहन योजना की शुरुआत की, जिसके तहत बागवानों को कीवी बाग लगाने के लिए पौध सामग्री और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में फल विविधीकरण को संस्थागत रूप देने के लिए राज्य सरकार ने एशियन डेवलपमेंट बैंक की सहायता से वर्ष 2022 में एचपी शिवा परियोजना (हिमाचल प्रदेश सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर, इरिगेशन एंड वेल्यू एडिशन प्रोजेक्ट) की शुरुआत की।

इस परियोजना का उद्देश्य सेब-केंद्रित बागवानी से आगे बढ़कर अन्य फलों को बढ़ावा देना है, ताकि बदलते जलवायु हालात में बागवानों की आय को स्थिर किया जा सके।

एचपी शिवा परियोजना के तहत प्रदेश के सात जिलों में अनार, लीची, प्लम, अमरूद, परसीमन और मौसमी जैसे फलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। परियोजना के अंतर्गत अब तक 7.5 लाख से अधिक फलों के पौधे रोपे जा चुके हैं।

राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के अनुसार वर्ष 2023–24 में भारत में कुल सेब उत्पादन लगभग 26.25 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया। इसमें से करीब 20.64 लाख मीट्रिक टन उत्पादन जम्मू–कश्मीर से आया, जबकि हिमाचल प्रदेश का योगदान लगभग 5.06 लाख मीट्रिक टन रहा। इस तरह देश के कुल सेब उत्पादन का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा केवल इन दो हिमालयी राज्यों से आता है।

औसतन एक मीट्रिक टन सेब की बाजार कीमत लगभग एक लाख रुपये मानी जाती है। इस आधार पर जम्मू–कश्मीर में सेब उत्पादन का अनुमानित बाजार मूल्य करीब 20,640 करोड़ रुपए बैठता है, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह लगभग 5,060 करोड़ रुपये है।

दोनों राज्यों को मिलाकर सेब आधारित अर्थव्यवस्था का आकार करीब 25,700 करोड़ रुपए तक पहुंचता है।

रोजगार के लिहाज से भी सेब का महत्व असाधारण है। जम्मू–कश्मीर में इससे लगभग 30 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है, जबकि हिमाचल प्रदेश में 10 लाख से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए सेब पर निर्भर हैं।

यही वजह है कि जब सेब संकट में पड़ता है, तो उसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हिमालयी समाज की पूरी ग्रामीण आजीविका व्यवस्था को अस्थिर कर देता है।

जलवायु परिवर्तन और सेब उत्पादन के बीच गहरे संबंध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययनों ने स्पष्ट किया है। वर्ष 2020 में जर्नल ऑफ फार्माकोग्नोसी एंड फाइटोकेमिस्ट्री में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 1880 से 2018 के बीच वैश्विक औसत तापमान लगभग 0.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। 

1975 के बाद तापमान वृद्धि की गति और तेज हुई और यह 0.15 से 0.20 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही। इस बढ़ते तापमान का सबसे सीधा असर ठंड पर निर्भर फसलों पर पड़ा है। सर्दियों के छोटे होने, बर्फबारी की अवधि घटने और चिलिंग आवर कम होने से सेब के पौधों की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो रही है।

सेब की खेती के लिए चिलिंग आवर सबसे अहम शर्त मानी जाती है। चिलिंग आवर उन घंटों को कहा जाता है जब तापमान सात डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है। अधिकांश पारंपरिक सेब किस्मों को 1000 से 1200 घंटे तक की ठंड अनिवार्य रूप से चाहिए होती है।

यही ठंड पौधों की सुप्तावस्था पूरी करती है और फूल तथा फल बनने की प्रक्रिया को सक्रिय करती है। यदि यह प्रक्रिया अधूरी रह जाए तो फूल कम आते हैं, फल असमान बनते हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आती है। आज हिमालय के अधिकांश सेब उत्पादक क्षेत्रों में यही स्थिति देखने को मिल रही है।

मौसम में आ रहे बदलावों से सेब बागवानी पर पड़ रहे असर की पुष्टि ज़मीनी स्तर पर बागवान खुद करते नजर आ रहे हैं। शिमला जिले के लगभग पांच हजार फीट ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहने वाले सेब बागवान सुरेंद्र मेहता बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से सेब बागवानी से जुड़ा हुआ है।

उन्हें याद है कि पहले तीन फुट तक बर्फ गिरती थी और महीनों तक खेत ढके रहते थे। उस समय सेब के पौधों के लिए जरूरी ठंड अपने आप पूरी हो जाती थी, लेकिन अब जनवरी का तीसरा सप्ताह बीत जाने के बावजूद बर्फ का नामोनिशान नहीं रहता।

वे कहते हैं कि इससे केवल सेब उत्पादन ही नहीं, बल्कि भविष्य में जल संकट भी गहराएगा, क्योंकि बर्फ ही पहाड़ों के जल स्रोतों की असली पूंजी रही है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मौसम केंद्र शिमला के आंकड़े भी किसानों की इस चिंता की पुष्टि करते हैं। पिछले 15 वर्षों में केवल छह बार ही सामान्य या उससे अधिक सर्दियों की बारिश दर्ज की गई है, जबकि लगातार दस वर्षों में बारिश में कमी देखी गई।

वर्ष 2010 में सर्दियों की बारिश सामान्य से 46 प्रतिशत कम रही, 2011 में 28 प्रतिशत कम, 2016 में 70 प्रतिशत कम और 2018 में 71 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई। 2021 में यह कमी 70 प्रतिशत रही, जबकि 2023 और 2024 में क्रमशः 38 और 42 प्रतिशत कम बारिश हुई। वर्ष 2025 में सर्दियों की बारिश 26 प्रतिशत कम रही और जनवरी 2026 तक यह कमी 11 प्रतिशत दर्ज की जा चुकी है।

मौसम केंद्र शिमला के दीर्घकालिक आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि 2010 के बाद जनवरी महीने में 11 बार सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई, जो सर्दियों की स्थिरता और बर्फबारी पर सीधा असर डाल रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों की बारिश और बर्फबारी में यह कमी केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक स्थायी जलवायु प्रवृत्ति का संकेत है, जिसका असर सेब की खेती से लेकर हिमालयी जल संसाधनों तक पर पड़ रहा है।

बदलते मौसम ने बागवानों को ऐसे उपाय अपनाने पर मजबूर कर दिया है, जिनकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक नहीं की जाती थी। जुब्बल क्षेत्र के बागवान प्रशांत सेहटा बताते हैं कि कई किसान रात के समय पानी के फव्वारे चलाकर पेड़ों पर स्प्रे करते हैं ताकि तापमान कुछ हद तक नीचे रहे।

कहीं हाइड्रोजेल का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि ये सभी उपाय अस्थायी जुगाड़ हैं। इन्हें लंबे समय तक नहीं अपनाया जा सकता।

वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी इन आशंकाओं को पुष्ट किया है। वर्ष 2020 में प्लस वन जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में 1975 से 2014 तक हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक जिलों के मौसम और उत्पादन आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन के अनुसार 1980 के दशक में जहां 1200 से 1500 घंटे तक चिलिंग आवर उपलब्ध होते थे, वहीं 2000 के बाद यह घटकर 900 से 1000 घंटे तक सिमट गए। कई क्षेत्रों में यह संख्या 800 घंटे से भी नीचे चली गई।

इसी अवधि में औसत तापमान लगभग 0.5 से 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। तापमान में यह बढ़ोतरी देखने में भले मामूली लगे, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर सर्दियों की अवधि पर पड़ा है। ठंडे दिन कम हुए हैं, बर्फबारी की घटनाएं घटी हैं और सेब के पौधों की प्राकृतिक सुप्तावस्था (डॉर्मेंसी) पूरी नहीं हो पा रही।

शोधकर्ताओं का मानना है कि सेब बागवानी धीरे-धीरे निचले क्षेत्रों से खिसककर अधिक ऊंचाई वाले इलाकों की ओर बढ़ने लगी। जहां पहले 1000 से 1200 मीटर की ऊंचाई पर सेब उगाया जाता था, वहीं अब यह 1800 से 2500 मीटर और कुछ स्थानों पर 3500 मीटर तक पहुंच चुका है। निचले क्षेत्रों में उत्पादन घट रहा है, जबकि ऊंचे इलाकों में सेब के नए बाग विकसित हो रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन का असर जम्मू–कश्मीर की सेब बागवानी में भी साफ दिखाई देने लगा है। पुलवामा जिले के सेब उत्पादक फारूख अहमद मीर बताते हैं कि पारंपरिक किस्मों का उत्पादन हर साल गिरता जा रहा था। कभी पीक सीजन में तापमान बढ़ जाता, तो कभी असामान्य बारिश और ओलावृष्टि भारी नुकसान पहुंचा देती।

इसके चलते उन्होंने अपने पुराने बाग काट दिए और हाई-डेंसिटी प्रणाली में गाला एप्पल लगाया, जो अगस्त में ही तैयार हो जाता है और मौसम के जोखिम को कुछ हद तक कम कर देता है। कश्मीर घाटी में हो रहा यह बदलाव बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे हिमालय में आजीविका की दिशा बदल रहा है।

कश्मीर घाटी में हो रहे इस बदलाव की पुष्टि नर्सरी स्तर पर भी दिखाई देती है। त्रिचाल गांव में सेब की नर्सरी संचालित करने वाले अनिस अहमद कहते हैं कि पिछले एक दशक में बागवानी का पूरा स्वरूप बदल चुका है।

वे बताते हैं “अब बागवान पारंपरिक किस्में खरीदने के बजाय हाई-डेंसिटी एप्पल फार्मिंग की ओर बढ़ रहे हैं। अनिस अहमद कहते हैं कि अब स्टोन फ्रूट जैसे चेरी, प्लम और एप्रिकॉट की मांग भी लगातार बढ़ रही है, जो यह दर्शाता है कि कश्मीर की बागवानी अब खुद को नए मौसम के अनुसार ढालने की कोशिश कर रही है।

कुल्लू जिले की नर्सरी संचालक अनिता नेगी कहती हैं मैं नर्सरी का करती हूं और मेरे यहां से हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उतराखंड हर स्थान के बागवान पौधे लेकर जाते हैं, वह कहती हैं कि हर साल मैं करीब 50 लाख रुपये के फलों के पौधे बेचती हूं।

अब भी इसमें सेब के पौधों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, लेकिन बदलाव यह है कि लोग पारंपरिक किस्मों के बजाय लो-हाइट और लो-चिलिंग वेरायटी वाले सेब के पौधे मांग रहे हैं,”

वे कहती हैं कि यह बदलाव मजबूरी के साथ-साथ समय की मांग भी है। पहाड़ों में आय के साधन बहुत सीमित हैं। ऐसे में बागवान केवल मौसम के भरोसे साल भर की कमाई नहीं छोड़ सकता। इसलिए अब लोग अलग-अलग फलों और फसलों को अपनाकर जोखिम बांट रहे हैं, अनिता नेगी की यह बात बताती है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी बागवानी अब एकल फसल से बहु-फसल प्रणाली की ओर बढ़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सेब पर एकल निर्भरता अब जोखिम भरी हो चुकी है। डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय सोलन हिमाचल प्रदेश के सामाजिक विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सुभाष शर्मा कहते हैं कि मौसमी बदलावों ने हिमालयी बागवानों को सेब से आगे सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।

वह बताते हैं, “जलवायु परिवर्तन के कारण सेब उत्पादन जिस तरह अस्थिर हो रहा है, उसे देखते हुए अब बागवान केवल सेब पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह सेब के साथ-साथ अन्य फलों की खेती को अपनाने लगा है, ताकि आय का जोखिम कम किया जा सके।”

डॉ. शर्मा कहते हैं कि यह बदलाव केवल फल या फसलों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहाडों में बागवानी की पद्धति में भी बदलाव कर रहे हैं। अब बागवान पारंपरिक सेब बागवानी से आधुनिक हाई डेंसिटी और आधुनिक बागवानी तकनीकों को अपना रहे हैं।

अब बागवान परसीमन, कीवी, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी और ड्रैगन फ्रूट जैसे एग्जॉटिक फलों की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं। यह बदलाव केवल फसल चयन नहीं, बल्कि पूरी बागवानी व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। इसका उद्देश्य एक ही है - मौसम की अनिश्चितता के बीच नियमित और स्थिर आय सुनिश्चित करना।

डॉ. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय सोलन हिमाचल प्रदेश के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर अब सेब की खेती पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है और बागवानी को पुराने तौर-तरीकों से नहीं चलाया जा सकता।

वह कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखते हुए अब बागवान मौसम के अनुकूल तकनीकों को अपनाने लगे हैं। सही क्षेत्र के अनुसार सही किस्म का चयन और उपयुक्त फलों की पहचान अब बागवानी की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है,”

प्रो. चंदेल के अनुसार हिमालयी क्षेत्र के बागवान समय की मांग के अनुरूप खुद को बदल रहे हैं। चंदेल बताते हैं, “आज बागवान केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पर्यावरण हितैषी तकनीकों को अपनाकर भविष्य की बागवानी को सुरक्षित करने की दिशा में भी योगदान दे रहे हैं। हाई-डेंसिटी प्लांटेशन, माइक्रो इरिगेशन, क्लाइमेट-स्मार्ट तकनीक और फसल विविधीकरण जैसे उपाय इसी बदलाव का हिस्सा हैं।”

उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में हिमालयी बागवानी का भविष्य केवल सेब पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि वह जलवायु-संवेदनशील खेती से जलवायु-सहिष्णु खेती की ओर बढ़ेगा।

आज हिमालय में सेब बागवानी केवल उत्पादन का प्रश्न नहीं रह गई है। यह जलवायु परिवर्तन के प्रति पहाड़ की संवेदनशीलता का सबसे स्पष्ट संकेत बन चुकी है। यह कहानी सिर्फ नुकसान और संकट की नहीं है। यह अनुकूलन और बदलाव की भी कहानी है—जहां बागवान नई किस्में, नई फसलें और नई तकनीकें अपनाकर अपने भविष्य को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि सेब बचेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या नीतिगत ढांचा, वैज्ञानिक संस्थान और बाज़ार व्यवस्था इस बदलाव की रफ्तार के साथ कदम मिला पाएंगे। क्योंकि हिमालय में आज जो हो रहा है, वह कल देश के दूसरे इलाकों की खेती का भविष्य भी तय कर सकता है। अगर समय रहते इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो सेब की गिरती पैदावार केवल एक फसल का नुकसान नहीं होगी—वह जलवायु परिवर्तन के सामने हमारी तैयारी की सबसे महंगी कीमत बन जाएगी।

रोहित पराशर एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब के मेंटी हैं। यह कार्यक्रम जर्मनी के इंटरलिंक एकेडमी द्वारा समर्थित है।

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