

सीएसई के विश्लेषण से पता चला है कि अब सिर्फ मॉनसून नहीं, बल्कि मॉनसून से पहले का मौसम भी किसानों के लिए बड़ा खतरा बन गया है।
2022 से 2026 के बीच बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने खासकर मार्च-अप्रैल में रबी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया।
2026 में ही 24 राज्यों में 6.27 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल प्रभावित हुई, जिसमें सबसे ज्यादा मार गेहूं, सरसों और दालों पर पड़ी।
ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार सहित कई राज्यों में लाखों हेक्टेयर रबी फसलें तबाह हुईं।
कटाई से ठीक पहले होने वाली इन घटनाओं से गेहूं, चना, दालें और सब्जियों की पैदावार व गुणवत्ता दोनों पर गंभीर असर पड़ा है।
भारतीय खेती-बाड़ी के लिए मॉनसून को लंबे समय से सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला मौसम माना जाता रहा है। जून से सितंबर के बीच होने वाली भारी बारिश और बाढ़ की वजह से देश के बड़े इलाकों में फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लेकिन सीएसई द्वारा 2022 से लेकर अप्रैल 2026 की शुरुआत तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
इस विश्लेषण के अनुसार खेती से जुड़े जोखिमों के समय और उनके पैमाने दोनों में ही अब बदलाव देखा गया है। “भारत के मौसम आपदाओं पर आधारित इंटरैक्टिव एटलस” के अनुसार अब मॉनसून के साथ-साथ मॉनसून से पहले का मौसम भी फसलों के लिए एक नया और अधिक जोखिम वाला समय बनता जा रहा है।
मॉनसून से पहले फसलों को होने वाला नुकसान और बढ़ रहा है। मॉनसून से पहले के समय में होने वाली बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि अब फसलों को पहले से कहीं अधिक नुकसान पहुंचा रही है। जबकि एक समय ऐसा भी था जब खेती-बाड़ी के लिहाज से इस समय को काफी सुरक्षित माना जाता था।
पिछले चार सालों में से तीन साल (2022, 2024 और 2025) ऐसे रहे हैं जब मॉनसून से पहले के मौसम में खराब मौसम की घटनाओं, विशेषकर ओलावृष्टि की वजह से देश के एक बड़े इलाकों में फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई थीं।
विश्लेषण कहता है कि 2026 में भी यह सिलसिला जारी है। इस साल मॉनसून से पहले के मौसम के शुरुआती 38 दिनों (1 मार्च से 7 अप्रैल तक) में ही कम से कम 24 राज्यों में 29 दिन हुआ है। कम से कम 13 राज्यों की 6,27,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की फसलें प्रभावित हुई हैं। इनमें उत्तर प्रदेश (3,47,366.43 हेक्टेयर), महाराष्ट्र (2,04,704 हेक्टेयर) और बिहार (45,000 हेक्टेयर) जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं।
ये आंकड़े वास्तविक नुकसान से कम भी हो सकते हैं क्योंकि 11 अन्य प्रभावित राज्यों (जिनमें पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्य भी शामिल हैं) के आंकड़े अभी इसमें शामिल नहीं किए गए हैं। कुल मिलाकर केवल एक महीने से कुछ अधिक समय में ही 6,20,000 हेक्टेयर से अधिक का इलाका प्रभावित हुआ है। इस हिसाब से 2023 के बाद से मॉनसून से पहले के मौसम में फसलों को होने वाला यह दूसरा सबसे बड़ा नुकसान है।
2023 में पूरे मौसम के दौरान लगभग 6,36,000 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुईं थी। केवल मार्च 2026 में ही कम से कम 1,95,000 हेक्टेयर फसल को नुकसान पहुंचा। यह आंकड़ा पिछले पांच सालों में सबसे अधिक नुकसान को दिखाता है। इसकी तुलना में मार्च 2023 में लगभग 1,20,000 हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ था।
इसी तरह अप्रैल के केवल पहले सप्ताह में ही 7 अप्रैल 2026 तक उपलब्ध अनुमानों के अनुसार 4,26,000 हेक्टेयर से अधिक फसलें प्रभावित हुई हैं। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में अकेले इस नुकसान का 80 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा प्रभावित हुआ है।
कृषि विभाग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार गत 5 अप्रैल को लगभग 30 मिलीमीटर बारिश और ओलावृष्टि से जिले में लगभग 3,43,069 हेक्टेयर में खड़ी गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है। इन घटनाओं का समय बहुत अहम है। मार्च और अप्रैल का महीना गेहूं, सरसों और दालों जैसी रबी की फसलों की कटाई का समय होता है।
अब विश्लेषण में देखा गया है कि मौसम की मार कम समय में ही बार-बार पड़ रही है और विशेषकर ठीक कटाई से पहले आ रही है, जिससे किसानों को नुकसान की भरपाई का बहुत कम मौका मिल पाता है। सीजन की शुरुआत के उलट, इस चरण में खराब हुई फसलों को दोबारा नहीं बोया जा सकता, जिससे किसानों की पूरी आमदनी खत्म हो जाती है।
बारिश या ओलावृष्टि के छोटे-छोटे दौर भी कटाई के लिए तैयार खड़ी फसलों को तबाह कर सकते हैं। कई मामलों में इस चरण में नमी से अनाज की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है, जिससे बाजार में उसकी कीमतें गिर जाती हैं। फसलवार आंकड़े दिखाते हैं कि इसका सबसे अधिक असर कटाई के लिए तैयार रबी की फसलों पर पड़ा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में गेहूं, सरसों, चना और दालों की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है।
रबी की मुख्य फसल गेहूं को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा है। सर्दियों में अधिक गर्मी पड़ने की वजह से विशेषकर फरवरी में (जो कि अनाज के विकास के लिए बहुत अहम समय होता है) गेहूं की फसल पहले से ही दबाव में थी। अनाज के साथ-साथ मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आलू, प्याज और लहसुन जैसी फसलों को भी नुकसान पहुंचा है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया है।
विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि अब फसल को नुकसान पहुंचने के दायरे में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यही नहीं फसल को नुकसान पहुंचाने का भौगोलिक दायरा भी अब बदल रहा है। पहले इस दौरान फसल को होने वाला ऐसा नुकसान अधिकतर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों जैसे उत्तर-पश्चिमी राज्यों तक ही सीमित रहता था। लेकिन 2026 में इसका असर कहीं अधिक बड़े क्षेत्र में फैला है।
इस मामले में महाराष्ट्र एक बड़ा नुकसान झेलने वाले क्षेत्र के रूप में सामने आया है, जहां अकेले मार्च माह में ही 1,20,000 हेक्टेयर से अधिक की जमीन प्रभावित हुई है। ध्यान देने की बात है कि इस मामले में सभी क्षेत्रों (मध्य भारत, पूर्व और उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप) में नुकसान दर्ज किया गया है।
बिहार जैसे पूर्वी राज्यों और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों ने भी इस साल काफी नुकसान झेला है और इसकी रिपोर्ट दर्ज कराई है। नुकसान के इस बढ़ते दायरे से पता चलता है कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि अब देश के एक बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित कर रही है।
यह बदलाव चिंताजनक है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि मार्च और अप्रैल माह की शुरुआत किसानों के लिए अधिक जोखिम वाले माहों में तब्दील होते जा रहे हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का अनुमान है कि अप्रैल में अधिक गर्मी और बारिश के कारण मॉनसून से पहले होने वाला नुकसान पिछले पांच साल के मुकाबले सबसे अधिक हो सकता है।
जैसे-जैसे जोखिम अधिक माहों और क्षेत्रों तक फैल रहे हैं, इससे किसानों को अब साल में एक की जगह दो जोखिम वाले मौसमों (मॉनसून से पहले और मॉनसून) का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिमी विक्षोप इस बार अत्याधिक सक्रीय होने के कारण मार्च अप्रैल में बारिश और ओलावृष्टि अधिक हुई है।