

देश के 166 जलाशयों में 11 जून 2026 तक मात्र 51.92 अरब घन मीटर यानी कुल क्षमता का करीब 28% पानी शेष है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से कम है।
दक्षिण भारत और पूर्वी क्षेत्र के कई जलाशयों में भंडारण बेहद कमजोर है, जबकि कुछ नदी बेसिनों में स्थिति सामान्य से बेहतर है।
कई जलविद्युत परियोजनाओं पर भी कम जल स्तर का असर पड़ सकता है।
जलाशयों में जल स्तर सामान्य से नीचे है, जिससे सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन पर संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
देश के जलाशयों में जल का भंडारण लगातार कम होता जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा देश के जिन 166 जलाशयों की निगरानी की जाती है, उनमें कुल भंडारण क्षमता का मात्र 28 फीसदी ही पानी बचा है। ऐसे में सारा दारोमदार मानसून पर आकर टिक गया है।
शुक्रवार 11 जून 2026 की शाम को जल आयोग की ओर से जारी बुलेटिन में बताया गया कि देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल 183.56 अरब घन मीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता है, लेकिन 11 जून तक इनमें केवल 51.92 अरब घन मीटर पानी मौजूद था। यानी जलाशयों की कुल क्षमता का महज 28.28 प्रतिशत हिस्सा ही भरा है, जबकि लगभग 72 प्रतिशत भंडारण क्षमता अभी खाली पड़ी है।
हालांकि यह भंडारण सामान्य स्थिति से 15.8 प्रतिशत अधिक है, लेकिन यह मात्रा पिछले वर्ष की समान अवधि में उपलब्ध 56.53 अरब घन मीटर पानी से 8.17 प्रतिशत कम है। वहीं, एक ओर जहां उत्तर और पश्चिम भारत के जलाशयों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में जल भंडारण दबाव में है।
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पूर्वी भारत के असम, बिहार, झारखंड, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल को शामिल करने वाले पूर्वी क्षेत्र में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी वाले 27 जलाशयों की कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 21.76 अरब घन मीटर (बीसीएम) है।
11 जून 2026 तक इनमें केवल 4.74 बीसीएम पानी उपलब्ध था, जो कुल क्षमता का महज 21.77 प्रतिशत है। यह न केवल पिछले वर्ष की समान अवधि के 24.57 प्रतिशत भंडारण से कम है, बल्कि इस अवधि के सामान्य स्तर (24.22 प्रतिशत) से भी नीचे है। हालांकि इस क्षेत्र की खेती मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है, फिर भी जलाशयों में कम पानी सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और वर्षा में किसी भी लंबे अंतराल की स्थिति में जोखिम बढ़ा सकता है।
उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान शामिल हैं। इस क्षेत्र में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में 11 जलाशय हैं, जिनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 19.84 अरब घन मीटर है। 11 जून 2026 तक इन जलाशयों में 6.67 BCM पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 33.64 प्रतिशत है।
पिछले वर्ष इसी अवधि में यह स्तर 28.67 प्रतिशत था, जबकि सामान्य भंडारण 28.79 प्रतिशत रहा है। यानी उत्तरी क्षेत्र के जलाशयों में इस वर्ष न केवल पिछले साल की तुलना में अधिक पानी है, बल्कि भंडारण सामान्य स्तर से भी बेहतर स्थिति में है। इससे संकेत मिलता है कि मानसून की शुरुआत से पहले उत्तर भारत के प्रमुख जलाशयों में जल उपलब्धता अपेक्षाकृत संतोषजनक बनी हुई है।
पश्चिमी क्षेत्र में गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं। इस क्षेत्र में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में 53 जलाशय हैं, जिनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 38.09 अरब घन मीटर है। 11 जून 2026 तक इन जलाशयों में 11.86 BCM पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 31.13 प्रतिशत है।
पिछले वर्ष इसी अवधि में यह स्तर 30.07 प्रतिशत था, जबकि सामान्य भंडारण 22.80 प्रतिशत रहा है। यानी पश्चिमी क्षेत्र के जलाशयों में इस वर्ष पानी का भंडारण पिछले साल की तुलना में थोड़ा बेहतर है और सामान्य स्तर से काफी ऊपर बना हुआ है। हालांकि महाराष्ट्र के कुछ प्रमुख जलाशयों में स्थानीय स्तर पर दबाव की स्थिति बनी हुई है।
मध्य क्षेत्र में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। इस क्षेत्र में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में 28 जलाशय हैं, जिनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 48.59 अरब घन मीटर है। 11 जून 2026 तक इन जलाशयों में 17.05 बीसीएम पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 35.09 प्रतिशत है।
दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना शामिल हैं। इस क्षेत्र में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में 47 जलाशय हैं, जिनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 55.29 अरब घन मीटर है। 11 जून 2026 तक इन जलाशयों में केवल 11.60 बीसीएम पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 20.98 प्रतिशत है।
यह देश के प्रमुख क्षेत्रों में सबसे कमजोर भंडारण स्तरों में से एक है। पिछले वर्ष इसी अवधि में इन जलाशयों में 34.93 प्रतिशत भंडारण था, जबकि सामान्य स्तर 21.24 प्रतिशत रहा है। यानी दक्षिण भारत के जलाशयों में जल भंडारण न केवल पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है, बल्कि सामान्य स्तर से भी थोड़ा नीचे है।
कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के कई प्रमुख जलाशयों में जल स्तर पहले से दबाव में है।
166 जलाशयों में से 66 जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में अधिक पानी है, जबकि 93 जलाशयों में सामान्य स्तर से अधिक भंडारण दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, 12 जलाशयों में भंडारण पिछले वर्ष के स्तर के 20 प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है और 7 जलाशयों में सामान्य स्तर के 20 प्रतिशत या उससे कम पानी बचा है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 37 जलाशयों में भंडारण पिछले वर्ष के मुकाबले आधे या उससे कम है, जबकि 25 जलाशयों में सामान्य भंडारण का 50 प्रतिशत या उससे कम पानी मौजूद है। यानी बड़ी संख्या में जलाशय बेहतर स्थिति में होने के बावजूद कई महत्वपूर्ण जलाशय अब भी जल संकट के दबाव में हैं।
खाली हुए जलाशय
झारखंड का चंदन बांध, महाराष्ट्र का भीमा-उजनी, उत्तर प्रदेश का मऊदाहा और उत्तराखंड का नानक सागर जलाशय लगभग खाली हो चुके हैं और इनमें सामान्य स्तर की तुलना में शून्य भंडारण दर्ज किया गया है। जबकि कर्नाटक के भद्रा (3.17%), कबिनी (17.08%), तमिलनाडु के वैगई (10.88%) तथा कर्नाटक के ही कृष्णराज सागर (33.47%) और तुंगभद्रा (36.53%) जैसे प्रमुख जलाशयों में भी पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे है।
नदी घाटियों की स्थिति
केंद्रीय जल आयोग के बुलेटिन में दर्शाई गई बेसिनवार स्थिति बताती है कि देश के अधिकांश प्रमुख नदी बेसिनों में जल भंडारण सामान्य से बेहतर बना हुआ है। गंगा, सिंधु, नर्मदा, ताप्ती, माही, साबरमती, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र, पेन्नार, महानदी तथा कच्छ-सौराष्ट्र और लूणी क्षेत्र की पश्चिमवाहिनी नदियों के बेसिन में जलाशयों का भंडारण सामान्य स्तर से अधिक है।
वहीं कृष्णा, कावेरी, ब्राह्मणी-बैतरणी, सुवर्णरेखा तथा तादरी से कन्याकुमारी और ताप्ती से तादरी के बीच की पश्चिमवाहिनी नदियों के बेसिनों में जल भंडारण सामान्य के करीब है।
चिंता की बात यह है कि महानदी और पेन्नार के बीच की पूर्ववाहिनी नदियों तथा बराक और अन्य नदी बेसिनों में जल भंडारण सामान्य से कम दर्ज किया गया है।
जलविद्युत परियोजनाओं पर असर
20 जलविद्युत परियोजनाओं वाले जलाशयों में से 9 जलाशयों में पानी सामान्य स्तर से कम या उसके बराबर है। इसका असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।