

देश में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे कीटनाशक लगे बीजों और बीज प्रसंस्करण इकाइयों में उपयोग होने वाले खतरनाक रसायनों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों और विभागों को भेजे गए एक पत्र में कहा गया है कि भारत में ऐसे बीजों की पहचान, लेबलिंग और सुरक्षा जांच के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं। पत्र में चेतावनी दी गई है कि यह नियामक कमी किसानों, खेतिहर मजदूरों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
यह पत्र 25 जून 2026 को केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति (सीआईबीआरसी), कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा अन्य संबंधित सरकारी संस्थानों को भेजा गया है। यह पत्र सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ डॉ. नरसिम्हा रेड्डी डोंथी ने लिखा है।
पत्र में कहा गया है कि किसानों, खेतिहर मजदूरों और उपभोक्ताओं को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि किन बीजों पर कीटनाशक लगाए गए हैं, कौन से रसायन इस्तेमाल हुए हैं और उनकी मात्रा कितनी है। इसमें यह भी याद दिलाया गया है कि पहले देश में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब लोग गलती से कीटनाशक लगे बीजों को अनाज समझकर खा गए थे और उनकी मौत हो गई थी। इसके बावजूद आज भी इन बीजों पर अनिवार्य लेबल लगाने की व्यवस्था नहीं है।
डॉ. डोंथी ने अपने पत्र में कहा है कि भारत में अब तक यह जानने के लिए कोई स्वतंत्र अध्ययन नहीं हुआ है कि बीजों पर लगाए गए कीटनाशकों के अवशेष फसलों के खाने योग्य हिस्सों तक पहुंचते हैं या नहीं। इसी तरह इन रसायनों का मिट्टी, कीट-पतंगों और पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है, इस बारे में भी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने बीज प्रसंस्करण इकाइयों को भी चिंता का विषय बताया है। उनके अनुसार इन इकाइयों में सल्फ्यूरिक अम्ल समेत कई खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इनके उपयोग, सुरक्षा और अपशिष्ट निपटान को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। कई मामलों में यह तक दर्ज नहीं किया जाता कि किस इकाई में कौन से रसायन इस्तेमाल किए गए।
पत्र में तेलंगाना के जोगुलाम्बा गडवाल जिले का उदाहरण भी दिया गया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के लिए जनवरी 2020 में तैयार एक संयुक्त जांच रिपोर्ट में पाया गया था कि जांच की गई सभी 23 बीज प्रसंस्करण इकाइयों में नियमों का उल्लंघन हो रहा था। रिपोर्ट में बिना उपचार किए अम्लीय अपशिष्ट को बाहर छोड़ने, मिट्टी और भूजल प्रदूषण तथा पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी की बात सामने आई थी।
डॉ. नरसिम्हा रेड्डी डोंथी ने केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड से मांग की है कि कीटनाशक लगे सभी बीजों पर लेबल लगाना अनिवार्य किया जाए, बीज उपचार में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की सुरक्षा जांच की जाए, बीज प्रसंस्करण इकाइयों के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं और इन इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट की नियमित जांच कराई जाए।
पत्र में कहा गया है कि जब तक इन रसायनों के असर का सही आकलन नहीं हो जाता, तब तक किसानों, खेतिहर मजदूरों, मिट्टी और खाद्य प्रणाली को ऐसे जोखिमों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में बीज उपचार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उससे जुड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर नियम अब भी काफी कमजोर हैं।