

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों के बीच इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईएसएटी) को सीआरआईएसपीआर-सीएस9 जीन एडिटिंग तकनीक के इस्तेमाल का दीर्घकालिक लाइसेंस मिल गया है। इस समझौते के बाद आईसीआरआईएसएटी एशिया और अफ्रीका के छोटे किसानों के लिए ऐसी फसल किस्में विकसित करने में तेजी ला सकेगा, जो सूखा, गर्मी, कीट और बीमारियों जैसी चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।
यह मानवीय लाइसेंस समझौता कॉर्टेवा और द ब्रॉड इंस्टीट्यूट इंक के साथ किया गया है। इसके तहत आईसीआरआईएसएटी को अनुसंधान, फसल सुधार और किसानों तक नई जीन एडिटेड किस्मों को पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में सीआरआईएसपीआर-सीएस9 तकनीक का उपयोग करने की सुविधा मिलेगी।
आईसीआरआईएसएटी के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इस समझौते को संस्थान और छोटे किसानों के लिए एक “परिवर्तनकारी मानवीय उपलब्धि” बताया। उन्होंने कहा, “यह नई क्षमता ऐसी व्यावहारिक फसल तकनीकों के विकास को गति देगी, जो खाद्य सुरक्षा मजबूत करेंगी, साथ ही आजीविका सुधारेंगी और एशिया तथा अफ्रीका में अधिक लचीली कृषि प्रणालियां बनाने में मदद करेंगी।”
सीआरआईएसपीआर-सीएस9 तकनीक को कृषि क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण नई तकनीकों में से एक माना जा रहा है। पारंपरिक फसल प्रजनन में किसी वांछित गुण को विकसित करने में कई वर्ष लग सकते हैं, जबकि जीन एडिटिंग वैज्ञानिकों को पौधों के जीन में सटीक बदलाव करने की सुविधा देती है। इससे ऐसी किस्में विकसित की जा सकती हैं जिनमें कम पानी में उत्पादन बनाए रखने, बढ़ते तापमान को सहने, रोगों से बचाव और बेहतर पोषण जैसे गुण हों। खास बात यह है कि जीन एडिटिंग में किसी दूसरी प्रजाति का डीएनए शामिल नहीं किया जाता, बल्कि पौधे के मौजूदा जीन में ही बदलाव किए जाते हैं।
इस तकनीक का इस्तेमाल आईसीआरआईएसएटी अपनी प्रमुख फसलों में करेगा। इनमें ज्वार, मोती बाजरा और अन्य बाजरा किस्में, चना, अरहर और मूंगफली जैसी फसलें शामिल हैं। ये फसलें एशिया और अफ्रीका के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में लाखों छोटे किसानों की आजीविका का आधार हैं।
आईसीआरआईएसएटी का कहना है कि यह समझौता उसकी जीनोमिक्स, फसल प्रजनन, फीनोमिक्स, बीज प्रणालियों और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी को और मजबूत करेगा। इससे प्रयोगशालाओं में विकसित वैज्ञानिक खोजों को किसानों के खेतों तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सकेगी।
कॉर्टेवा की जैव प्रौद्योगिकी उपाध्यक्ष डॉ. वेंडी सर्निक ने कहा, “एशिया तथा अफ्रीका के छोटे किसानों तक जीन एडिटिंग तकनीक पहुंचाने में मदद करने पर गर्व है।”
उन्होंने आगे कहा, “हम मिलकर ऐसी फसलें विकसित करने के लिए काम करने की उम्मीद रखते हैं जो चरम मौसम की घटनाओं, कीटों और बीमारियों का बेहतर सामना कर सकें। इससे किसानों को अपने समुदायों का पोषण करने और अधिक लचीली वैश्विक खाद्य प्रणाली बनाने में मदद मिलेगी।”
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के दौर में खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन बनाए रखते हुए संसाधनों का संरक्षण करना है। जीन एडिटिंग जैसी तकनीकें कम जमीन और सीमित संसाधनों में अधिक उत्पादन देने वाली फसल प्रणालियों के विकास में मदद कर सकती हैं। हालांकि, इसके व्यापक इस्तेमाल के लिए जैव सुरक्षा मानकों, नियामकीय प्रक्रियाओं और छोटे किसानों तक तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।