वैश्विक तापमान में 1 डिग्री बढ़ोतरी से भारत का धान उत्पादन 6.6% तक घटने का अनुमान

वैज्ञानिक पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बढ़ती गर्मी से चावल की पैदावार पर अनुमान से तीन गुना ज्यादा असर पड़ सकता है
फोटो: सीएसई
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वैश्विक तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से भारत के धान उत्पादन में 6.6 प्रतिशत की कमी आ सकती है। खास बात यह है कि यह अनुमान पहले किए गए आकलनों की तुलना में तीन गुना से भी अधिक है।

भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी का मुख्य भोजन चावल है, इसलिए यह गिरावट खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

यह निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है। इस अध्ययन का नेतृत्व हेल्महोल्ट्ज़ सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल रिसर्च ने किया, जबकि पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी इसमें योगदान दिया। शोधकर्ताओं ने धान उगाने वाले क्षेत्रों के 214 स्थलों पर किए गए वास्तविक फील्ड-वार्मिंग (ताप वृद्धि) प्रयोगों के आंकड़ों की तुलना सात फसल मॉडलों से की।

अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण धान की पैदावार में होने वाला नुकसान पहले की तुलना में काफी अधिक हो सकता है। इससे संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का असर भारत के खाद्य उत्पादन पर अनुमान से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।

अध्ययन में पाया गया कि तापमान बढ़ने से चावल की पैदावार में कमी का कारण तापमान का 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होना था। अध्ययन के मुताबिक, जिन जगहों से डेटा इकट्ठा किया गया, वहां 70 प्रतिशत से अधिक जगहों पर पैदावार में हुए बदलाव का कारण बढ़ता तापमान ही था।

अध्ययन के क्षेत्रवार आंकड़ों में अनुमान लगाया गया कि इस बदलाव का सबसे भारी नुकसान दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया में दिखा है। भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में धान की फ़सल का नुकसान 2.1 प्रतिशत से 6.6 प्रतिशत तक रहा।

जबकि थाईलैंड, फिलीपीन्स और म्यांमार में यह 3.7 प्रतिशत से 7.7 प्रतिशत रहा। इस अध्ययन के मुख्य लेखक यीवेई जियान ने कहा कि ऑब्जर्वेशन और मॉडल के बीच अंतर इसलिए लग रहा था क्योंकि धान की फसल के मॉडल, धान के प्रजनन के चरणों में गर्मी से होने वाले नुकसान को ठीक से नहीं दिखाते हैं।

जियान के अनुसार, ऑब्जर्वेशन से पता चलता है कि यही वह समय है जब धान की फसल गर्मी के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है, क्योंकि इसी दौरान दाने और पैनिकल्स बनते हैं।

इससे पहले मार्च में, 'नेचर फ़ूड' जर्नल में छपी एक वैश्विक स्टडी में चेतावनी दी गई थी कि कम लेटिट्यूड वाले क्षेत्रों में आधी पैदावार पर खतरा हो सकता है, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया है।

साथ ही, मौसम की स्थितियां भी फ़सल उगाने के लिए लगातार खराब होती जा रही हैं। अध्ययन में फ़सलों की विविधता पर भी खतरा बताया गया है।

अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर तापमान 2 डिग्री बढ़ा तो उसका असर कुल 52 प्रतिशत खेतीहर भूमि की उपज पर दिखेगा। और यदि तापमान 3 डिग्री होता है, तो यह आंकड़ा 56 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।

हाल ही में एक दूसरे रिसर्च में पता लगा है कि भारत की मुख्य फसलें, जैसे धान और गेहूं मुरझा रही हैं। मई में, 1966 से 2016 तक के डेटा पर आधारित अध्ययन में पाया गया कि तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से सभी फ़सलों की देश की कुल औसत पैदावार में लगभग 8 प्रतिशत की कमी आई है।

अध्ययन ने यह भी पाया कि गर्मी और बारिश, दोनों की वजह से लगातार कृषि उत्पादन पर प्रभाव पड़ा है, जिससे कुछ फ़सलों का उत्पादन देश के औसत से घटा है। इसमें श्री अन्न की उपज 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर 19 प्रतिशत, जबकि मक्का की उपज 16 प्रतिशत घटी है। वहीं, सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में उपज 39 प्रतिशत तक घटी है।

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