

तमिलनाडु में अल नीनो के संभावित असर पर केंद्र सरकार की नजर, खरीफ फसलों की बुआई अभी भी जारी है।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 26.76 लाख किसान जुड़े, 12.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा।
डिजिटल फसल आकलन सर्वेक्षण अब 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू, उत्पादन अनुमान में पारदर्शिता बढ़ी।
आंध्र प्रदेश में कृषि परिवारों की औसत मासिक आय 10,480 रुपये, 93.2 प्रतिशत परिवार 2018-19 में कर्जदार थे।
देश में कैंसर की घटना दर बढ़ी, पंजाब में 2025 के दौरान अनुमानित 43,196 नए कैंसर मामले दर्ज किए गए।
तमिलनाडु में कृषि उत्पादन पर अल नीनो का प्रभाव
तमिलनाडु में कृषि उत्पादन पर अल नीनो के होने वाले प्रभाव को लेकर सदन में उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में बताया कि देश में मानसून की स्थिति और अल नीनो के कारण कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव की लगातार निगरानी की जा रही है।
इस काम में भारत मौसम विज्ञान विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय भूजल बोर्ड, महालनोबिस राष्ट्रीय फसल पूर्वानुमान केंद्र और राज्य सरकारों सहित कई संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। तमिलनाडु में खरीफ 2026-27 की फसलों की बुआई अभी जारी है। इसलिए इस समय सभी प्रमुख खरीफ फसलों के पहले अग्रिम अनुमान जारी नहीं किए गए हैं। सरकार मौसम की स्थिति और उसके कारण फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए स्थिति की निगरानी कर रही है।
देश में प्राकृतिक खेती
सदन में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आज, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 25 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी। इस मिशन का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसमें खेती में प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।
चौहान ने बताया कि अब तक इस मिशन के तहत 24,102 समूह बनाए गए हैं। इनके तहत लगभग 12.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल किया गया है। इस मिशन से 26.76 लाख किसान जुड़े हैं। किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए जरूरी जैविक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए 8,100 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी बनाए गए हैं।
इसके अलावा 40,182 कृषि सखियों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों को तैनात किया गया है। इनका काम किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी और सहायता देना है। सरकार का मानना है कि प्राकृतिक खेती से खेती की लागत कम करने, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल सामान्य फसल आकलन सर्वेक्षण
सदन में उठे एक सवाल का जवाब देते हुए आज, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में बताया कि फसलों के उत्पादन का सही और समय पर अनुमान लगाने के लिए सरकार डिजिटल सामान्य फसल आकलन सर्वेक्षण लागू कर रही है। इसे चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू किया जा रहा है।
इस योजना की शुरुआत खरीफ 2023-24 में पायलट परियोजना के रूप में की गई थी। उस समय इसे 10 राज्यों के चुनिंदा जिलों में लागू किया गया। इसके बाद रबी 2023-24 में इसका विस्तार 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक किया गया। ठाकुर ने कहा कि अब यह व्यवस्था 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की जा रही है।
डिजिटल व्यवस्था से फसल उत्पादन के अनुमान में पारदर्शिता, तेजी और गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इससे फसलों की पैदावार का आकलन पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है। इस व्यवस्था के विस्तार से देश में फसल उत्पादन का डिजिटल आकलन करने की व्यवस्था मजबूत हुई है।
आंध्र प्रदेश के कृषि परिवारों की औसत मासिक आय
सदन में सवालों का सिलसिला जारी रहा, इसी क्रम में एक और प्रश्न के उत्तर में आज, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में कहा कि कृषि परिवारों की औसत मासिक आय और उनके कर्ज की स्थिति का आकलन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किए गए कृषि परिवारों के स्थिति आकलन सर्वेक्षण के माध्यम से किया जाता है।
जनवरी 2019 से दिसंबर 2019 के बीच किए गए नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, आंध्र प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय 10,480 रुपये थी। कृषि परिवारों पर कर्ज का बोझ भी काफी अधिक पाया गया। साल 2012-13 में आंध्र प्रदेश के 92.9 प्रतिशत कृषि परिवार कर्जदार थे। वर्ष 2018-19 में यह आंकड़ा बढ़कर 93.2 प्रतिशत हो गया। ठाकुर ने कहा कि वर्ष 2019 के बाद 2024-25 और 2025-26 के लिए कृषि परिवारों की औसत मासिक आय और कर्जदार परिवारों से संबंधित नए आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं।
देश में कैंसर के मामले
देश में कैंसर के मामलों को लेकर सदन में उठाए गए सवाल जवाब देते हुए आज, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने राज्यसभा में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के आंकड़ों का हवाला दिया। जिसमें कहा गया है कि वैश्विक बीमारी के बोझ से संबंधित 2023 के कैंसर अध्ययन में बताया गया है कि 1990 से 2023 के बीच दुनिया में उम्र के अनुसार समायोजित कैंसर की घटना दर में 7.1 प्रतिशत की कमी आई।
इसके विपरीत, भारत जिस कम और मध्यम आय वाले देशों के समूह में शामिल है, वहां इसी अवधि में कैंसर की घटना दर में 28.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
जाधव ने कहा कि भारत के लिए उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कैंसर की घटना दर 1990 में लगभग 84.8 प्रति एक लाख आबादी थी, जो 2023 में बढ़कर 107.2 प्रति एक लाख आबादी हो गई। यह लगभग 26.4 प्रतिशत की वृद्धि है। वर्ष 2023 में भारत में करीब 15 लाख नए कैंसर मामलों का अनुमान लगाया गया।
पंजाब में कैंसर के मामले
इसी क्रम में संसद में पूछे गए एक और प्रश्न के उत्तर में आज, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने राज्यसभा में बताया कि पंजाब में भी कैंसर के मामलों की संख्या पर सरकार और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद नजर रख रहे हैं।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के अनुसार, पंजाब में साल 2023 में अनुमानित कैंसर मामलों की संख्या 41,337 थी। साल 2024 में यह संख्या बढ़कर 42,288 और साल 2025 में 43,196 हो गई।
लू के कारण नींद पर असर
सदन में उठे एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए आज, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा कि लू या हीटवेव का असर केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यक्रम चला रही है। इसे राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
जाधव ने बताया कि इस कार्यक्रम में तापमान और अन्य पर्यावरणीय कारणों से नींद के तरीके में होने वाले बदलाव को भी ध्यान में रखा गया है। बुजुर्गों, बच्चों, बाहर काम करने वाले लोगों और ऐसे लोगों पर इसका प्रभाव अधिक हो सकता है, जिनके पास गर्मी से बचने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।
सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य अधिकारियों को गर्मी से होने वाली बीमारियों की रोकथाम और उपचार के लिए समय-समय पर सलाह जारी करती है। जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर स्वास्थ्य अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण सामग्री भी तैयार की गई है।