

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में अफ्रीकन जायंट स्नेल का प्रकोप दिख रहा है। इंदौर में पौधों की नर्सरियों में इसका असर देखने को मिला है। मुश्किल यह है कि किसान या नर्सरी मालिक इन खतरनाक स्नेल को नियंत्रित करने और इनसे जुड़े खतरों के बारे में कोई खास जानकारी नहीं रखते, जिससे इनके फैलने को आशंका और भी बढ़ सकती है।
इंदौर में इससे करीब एक दशक पहले एक नर्सरी में अफ्रीकन स्नेल की खबर सामने आई थी, लेकिन उसके बाद से यहां इस आक्रमक प्रजाति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन बरसात के चालू सीजन में इसे कई पौधों में देखा गया है।
अफ्रीकन स्नेल मूलतः अफ्रीका में पाई जाने वाली घोंघों की यह प्रजाति भारत में भी सालों पहले आमद कर चुकी है और देश के कुछ हिस्सों में इसने फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाया है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल जैसे कुछ हिस्सों में इनकी संख्या इतनी तेजी से बढ़ी कि नियंत्रण करने तक यह काफी बर्बादी कर चुके थे।
मध्यप्रदेश के इंदौर में महाराष्ट्र के पुणे और कर्नाटक के बैंगलोर से बड़ी संख्या में पौधे नर्सरियों द्वारा खरीदे जाते हैं और यही पौधे इस खतरनाक प्रजाति के इस शहर में आने का जरिया बने हैं। इनका आकार और शेल की डिजाइन इन्हें जितना आकर्षक बनाती है नर्सरी वाले इन्हें उतने ही हल्के में लेते हैं।
तेजी से संख्या बढ़ने पर नर्सरी मालिक कीटनाशक छिड़क कर इन्हें मार देते हैं और ज्यादातर नंगे हाथों से उठाकर इन्हें पास ही खाली जगहों पर फेंक आते हैं। क्योंकि न उन्हें इनके बारे में जानकारी है, न ही इनकी खबर अब तक किसी संबंधित विभाग तक पहुंची है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अब तक यह खेतों तक नहीं पहुंचे हैं।
केरल, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में मुश्किल बने
इसी साल जुलाई में अफ्रीकन जायंट स्नेल द्वारा केरल के इडुक्की जिले में इलायची की फसलों के बीच बड़ी संख्या में होने और फसलों को नुकसान पहुंचाने की खबरें सामने आई थीं। जिसके बाद केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी द्वारा इस बात की पुष्टि भी की गई।
इसी प्रकार पिछले साल के अंत में पुणे के एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) के प्रांगण तथा इसके आस पास के इलाकों में यह स्नेल बहुत अधिक मात्रा में देखे गए थे जो कि चिंता का विषय बन गया था। आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्सों में भी अफ्रीकन जायंट स्नेल की बढ़ती संख्या ने खेतों के लिए मुश्किलें खड़ी की थीं। सभी जगह इन्हें कंट्रोल करने में मशक्कत का सामना करना पड़ा।
पौधों के साथ महाराष्ट्र और दक्षिण से आना
इंदौर की एक नर्सरी में माली बबलू सूर्यवंशी ने बताया कि हमारे यहां पुणे और बंगलौर से आने वाले पौधों के साथ यह स्नेल आते हैं। तेज बारिश के साथ इनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। तब हमको कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ता है।
पिछले ही साल सैकड़ों की तादाद में पैदा हो गए थे। हमने कीटनाशक छिड़का और बटोर बटोर कर नर्सरी के पीछे फेंक दिए। बबलू बताते हैं कि उन घोंघों को उन्होंने हाथों में पन्नी (प्लास्टिक की थैली) लपेटकर उठाया था इसके पीछे कारण सही जानकारी नहीं, बल्कि स्नेल के शरीर से निकलने वाला चिपचिपा पदार्थ था।
एक अन्य नर्सरी में मौजूद माली का काम करने वाले हीरा की मानें तो वह पिछले कई सालों से इन घोंघों को देख रहे हैं। वह बताते हैं कि जैसे ही बारिश की झड़ी शुरू होती है, पौधों की मिट्टी में दुबके स्नेल बाहर निकल आते हैं और कीचड़ के साथ आगे बढ़ने लगते हैं। अगस्त में वह अंडे देते हैं और 15-20 दिनों में अंडों से बच्चे निकल आते हैं जो मदर प्लांट से पोषण पाते रहते हैं। फिर गर्मियां आते ही वापस मिट्टी के भीतर चले जाते हैं। ये ज्यादातर क्रोटन, स्नेक प्लांट, पाम और अन्य इनडोर प्लांट के साथ आते हैं।
अक्सर नर्सरियों में इनकी संख्या बढ़ने पर कुछ कीटनाशकों का प्रयोग करके इन्हें मार दिया जाता है और आस पास ही फेंक दिया जाता है। एक नर्सरी में एक कीटनाशक स्नेलकिल का पैकेट भी दिखा, जिसका उपयोग इन्हें मारने के लिए किया जाता है।
एंटोमोलॉजिस्ट और होलकर विज्ञान महाविद्यालय में प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक डॉ. विपुलकीर्ति शर्मा बताते हैं कि सालों पहले इंदौर और उसके आस पास के क्षेत्रों में स्लग यानी बिना कवच वाले घोंघे बड़ी तादात में हुआ करते थे। बारिश में यह घर के आसपास और अंदर तक इतने ज्यादा हो जाया करते थे कि हमें बाल्टियों में भरकर इन्हें फेंकना पड़ता था। लेकिन स्लग इतने खतरनाक नहीं जितने यह अफ्रीकन जायंट स्नेल हैं।
स्नेल के शरीर पर कवच होता है जो एक्सट्रीम वेदर से लेकर अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्हें सुरक्षा देता है, स्लग के साथ ऐसा नहीं होता। अफ्रीकन जायंट स्नेल का कवच और भी मोटा और कड़क होता है। खेती से लेकर इंसानों तक के लिए यह बहुत मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। हमने बारिश के मौसम में इंदौर में आरआरकैट (वैज्ञानिक संस्थान) और चिड़ियाघर के आस पास भी इन्हें देखा है।
वह आशंका जताते हैं कि भारत में अफ्रीका से सामान लाने वाले बड़े पानी के जहाजों के जरिए इनका आना हो सकता है। इनसे जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दो-तीन साल तक यह डॉर्मेंट कंडीशन में रह सकते हैं। जिस जगह से इनका शरीर शंख से बाहर निकलता है, उसको यह सील कर लेते हैं।
ऐसे में बाहरी वातावरण जैसे भीषण गर्मी से भी यह बच सकते हैं। फिर फेवरेबल कंडीशन में यह फिर से रिवाइव हो सकते हैं। ये मोलस्क्स (सॉफ्ट शरीर और बिना रीढ़) वाली नक्टरनल यानी रात में निकलने वाली स्पीशीज़ हैं जिनको पानी की जरूरत होती है। 22 से 30 डिग्री तक का नमी वाला तापमान इनके ग्रोथ करने के लिहाज से सबसे अच्छा होता है।
इनकी उम्र भी 8-10 साल हो सकती है और सालभर में कई बार यह रिप्रोडक्शन कर सकते हैं। यदि हेल्दी हैं तो एक बार में 200 तक अंडे दे सकते हैं। इनके अंडे गुलाबी रंग के होते हैं और वह भी सुंदर दिखते हैं। ज्यादा अंडे दे सकने के कारण इनका सर्वाइवल रेट काफी अच्छा होता है।
डॉ. शर्मा एक और रोचक बात बताते हैं कि यह हर्माफ्रोडाइट या उभयलिंगी प्रजाति भी है, मतलब एक ही एनिमल में दोनों सेक्स ऑर्गंस होते हैं। ऐसे में यह भी हो सकता है कि जो स्नेल अफ्रीका से भारत के हिस्सों में आए वह फर्टिलाइजेशन के बाद आए और यहां उन्होंने अंडे देकर अपना परिवार बढ़ा लिया या फिर यह भी हो सकता है यहां आकर फर्टिलाइजेशन हुआ हो।
दोनों ही स्थिति में बिना पार्टनर के भी यह अपना परिवार बढ़ा सकते हैं। यह ज्यादातर वेजिटेरियन होते हैं या मरे और सड़े छोटे एनिमल भी खाते हैं और अफ्रीका से मिलता जुलता क्लाइमेट मिलते ही यह हमारे देश में नया घर बना लेते हैं। बड़ा आकार होने से यह नुकसान भी अधिक पहुंचाते हैं। अफ्रीका में यह बड़ी परेशानी है तो जाहिर है इनका अनियंत्रित होना हमारे लिए भी परेशानी होगी ही।
हालांकि उन्हें एक बात यह भी लगती है कि हमारे यहां (इंदौर में) पर्यावरण और मिट्टी को कीटनाशकों ने काफी प्रदूषित कर दिया है। शायद इसलिए ही अब तक इनकी संख्या में वैसी वृद्धि नहीं हो पाई है।
जुओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक (डी) एवं इंडियन कोरल स्टडीज, कोलकाता के एक्सपर्ट डॉ. तमल मोंडल बताते हैं कि अफ्रीकन जायंट स्नेल खतरनाक प्राणियों में से एक है। भारत में यह एक इनवेसिव प्रजाति है। जिसके द्वारा कुछ जगहों पर कृषि क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने की बात सामने आई है।
दलदली और कीचड़ से भरे क्षेत्रों में इसने खास जगह बनाई है। इसके सिर का तिकोना, कोन जैसा और मजबूत हिस्सा मिट्टी के भीतर आसानी से अंदर तक घुसकर घर बनाने में मदद करता है। अधिकांश मोलस्क्स का शरीर इतना मजबूत नहीं होता। और छोटे स्नेल तुलनात्मक रूप से नुकसानदायक नहीं होते, बल्कि कई बार यह नुकसान पहुंचाने वाले लार्वा या अंडों की सफाई कर डालते हैं और इकोसिस्टम को संतुलित बनाए रखते हैं। लेकिन ज्यादा फैलने पर अफ्रीकन जायंट स्नेल को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है।
सेवानिवृत्त प्राध्यापक और लाइफ साइंटिस्ट डॉ. तेज प्रकाश पूर्णानंद व्यास इन बड़े घोंघों को खतरनाक बताते हुए सबसे पहली बात यह कहते हैं कि इन्हें कभी भी खाली हाथों से हैंडल न करें। ये खतरनाक तथा संक्रामक हो सकता है। इनका बायोलॉजिकल नाम लिसाकटीना फूलिका है और इनकी अन्य कुछ प्रजातियां भी पाई जाती हैं। सब्जियों के अलावा अर्नामेंटल प्लांट और कई फसलों के लिए तो यह मुश्किल पैदा करते ही हैं, चूंकि यह अपने साथ मैनिंजाइटिस जैसे कई घातक वायरस भी लाते हैं इसलिए इंसानों के लिए भी मुसीबत का कारण बन सकते हैं।
इंदौर जिले उपसंचालक (कृषि) सी.एल. केवड़ा के अनुसार, अभी तक उनके विभाग के पास इन घोंघों से संबंधित कोई शिकायत किसी गांव या इलाके से नहीं आई है। यदि कोई शिकायत या मामला संज्ञान में आएगा तो इसके लिए तुरंत एक्शन लेते हुए कंट्रोल संबंधी कदम उठाए जाएंगे।
इंदौर के आसपास के कुछ गांवों में किसानों से पूछने पर पता चला कि वहां खेतों में अब तक स्लग और छोटे स्नेल तो हैं लेकिन अभी तक अफ्रीकन जायंट स्नेल की आमद नहीं है। लेकिन लगभग सभी नर्सरियों में इनकी उपस्थिति है। और कई जगहों पर खेत नर्सरी के बहुत पास हैं। उसपर एक और तथ्य यह भी है कि कई बार किसान भी कुछ पौधे नर्सरी से लेकर आते हैं। ऐसे में यदि इनकी संख्या बढ़ी तो खेतों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका हो सकती है।