पुस्तक समीक्षा: बेटी के नाम एक दस्तावेज
इलस्ट्रेशन: सोरित / सीएसई

पुस्तक समीक्षा: बेटी के नाम एक दस्तावेज

'किसानी की कहानी' उस पीढ़ी के लिए लिखी गई किताब है, जिसे यह नहीं पता कि जो खाना वो लोग खा रहे हैं, वो खेतों में उगता है। इसमें सोने की चिड़िया वाले भारत से लेकर वर्तमान तक के किसानों की दास्तां समेटी गई है
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आपने सुना होगा या पढ़ा होगा कि दुनिया की कई महान हस्तियों ने बेटे व बेटियों के लिए मार्मिकता भरे पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने न केवल अपने स्नेह का प्रदर्शन किया, बल्कि समाज व राष्ट्र को समझने व सीखने का संदेश दिया। हम आज एक ऐसी किताब के बारे में बात करने वाले हैं, जिसमें लेखक अपनी बेटी के 18 साल पूरे होने पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मतदाता बनने की बधाई देते हुए भेंटस्वरूप जो जानकारी देते हैं, उसे एक किताब की शक्ल में दुनिया के सामने भी रख देते हैं। यह किताब इसलिए खास हो जाती है, क्योंकि किताब का विषय बेहद अनूठा है।

पिता अपनी बेटी को उस विषय के बारे में बता रहा है, जिसके बारे में वर्तमान पीढ़ी को शायद ही पता हो, जबकि उसका जीवन से सीधा संबंध है। वह है- खाना। नई पीढ़ी यानी “जेन जी” के लिए खाना अक्सर स्विगी या जोमैटो से आता हुआ या अधिक से अधिक मां के किचन तक सीमित होकर रह गया है। इस पीढ़ी को यह बताना बेहद जरूरी है कि वे जो खा रहे हैं, वह खेतों में उगता है और किसान किन परिस्थितियों में उगाते हैं। लेखक अपने किताब में लिखते हैं कि किसान और खेती के साथ हमारी भूख जुड़ी है और भूख तो हम सबको लगती है…।

किताब का शीर्षक है “किसानी की कहानी बेटी के लिए”। नई पीढ़ी तक अपनी बात पहुंचाने के लिए लेखक ने कॉमिक्स के फॉर्मेट को चुना, क्योंकि वह खुद एक उम्दा कार्टूनिस्ट हैं। लेखक ने जटिल कृषि, खाद्य प्रणाली और नीतिगत सवालों को बेहद सहज और संवादात्मक अंदाज में रखा है। कहीं भी यह बोझिल नहीं लगती। बेटी के बहाने दरअसल लेखक ने पूरी युवा पीढ़ी से बात की है। एक ऐसी पीढ़ी से जो उपभोक्ता तो है, लेकिन उत्पादन प्रक्रिया से लगभग कट चुकी है।

किताब के शुरुआत पन्नों पर विदर्भ के किसान कवि श्रीकृष्ण कलंब की मराठी कविता लिखी गई है। जिसका हिंदी अर्थ भी दिया गया है। कविता की ये पंक्तियां…:

हम बछड़े हैं,

गूंगे भूखे बछड़े,

हम गायों की देखभाल करते हैं,

चोर दूध और मलाई लेकर चले जाते हैं,

हम खेतों में पसीना बहाते हैं,

हम मोती की खेती करते हैं,

लेकिन हमारे बच्चे भूखे रहते हैं…।

किताब में पिता अपनी बेटी को उस विषय के बारे में बता रहा है, जिसके बारे में वर्तमान पीढ़ी को शायद ही पता हो, जबकि उसका जीवन से सीधा संबंध है

… पाठक को पहले ही पन्ने पर झकझोर देते हैं। इन्हीं चंद पंक्तियों में किताब का पूरा मजमून सिमट आता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने 2006-07 से ही इस किताब की कल्पना की थी और कई अंग्रेजी-हिंदी के अखबारों की कतरन इकट्ठी करते हुए लगभग 18 साल बाद इस किताब की परिकल्पना को साकार कर पाए। किताब के पहले अध्याय में वह चित्रों के माध्यम से किसान की वर्तमान दशा की कहानी बताते हैं, जो बीमार और कर्ज से दबा है। वह फसलों के कम उत्पादन से जूझ रहा है और सूदखोर-महाजनों के चंगुल में फंसा है। लेकिन उसके बाद किसानी की कहानी शुरू से शुरू होती है। मतलब, उस दौर से जब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, लेकिन सोने की चिड़िया क्यों कहा जाता था, वह इतालवी यात्री व चिकित्सक निकोलाओ मनुची का जिक्र करते हैं। मनुची मुगल काल में भारत आए थे, जो बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के मुख्य चिकित्सक बने। उनके लेखों को भारत के इतिहास को जानने के सबसे उपयोगी स्रोतों में से एक माना जाता है। अपने संस्मरणों में वह कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं कि भारत एक समृद्ध देश है और किसी भी मामले में मिस्र से कमतर नहीं है।

रेशम, कपास, चीनी, नीले रंग, भारत में फल, बाल, अनाज, मलमल और सोने का भी भरपूर उत्पादन होता है।” उनकी इस किताब में ऐसे ही कई ऐतिहासिक तथ्य इस कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं। ये तथ्य यह बात भी स्थापित करते हैं कि भारत को कृषि प्रधान देश क्यों कहा गया।

किसानी की कहानी  बेटी के लिए

लेखक ब्रिटिश इतिहासकार रजनी पाम दत्त की किताब “इंडिया टुडे” में लिखी पंक्तियों को कोट करते हैं, “हिंदुस्तान-भारत या इंडिया, इसको पुकारने के नाम अलग-अलग हो सकते हैं, पर इन तीनों नामों में एक समानता है, ये सभी नाम एक गरीब-खेतिहर देश के साथ जुड़े हैं।” औरंगजेब के वक्त तक भारत अपने रेशम, मलमल, मसालों व दूसरे उत्पादों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध था। यूरोपीय देशों में एक-दूसरे से केवल इस बात पर युद्ध होते थे कि भारत से ज्यादा से ज्यादा सामान कौन खरीदेगा। ब्रिटेन भी उनमें एक था। इसके बाद लेखक ब्रिटिश काल की कहानी शुरुआत से बताते हैं कि कैसे उन्होंने भारतीय व्यापार व कृषि व्यवस्था को अपने काबू में किया। साथ ही साहूकारों के जुल्म की दास्तान बताने के लिए वह मुंशी प्रेमचंद की कहानी “पूस की रात” का जिक्र करते हैं।

यह तथ्य बहुत कम प्रचारित है कि कैसे साहूकारों व अंग्रेजों ने मिलकर किसानों का शोषण किया और उनकी जमीनें हथियाई। किताब में इस पर विस्तार से बताया गया है। फिर आजादी के बाद हुए भारत पाक विभाजन के बारे में लेखक बताते हैं कि अधिकांश उपजाऊ जमीन पाकिस्तान के पास चली गई। भारत सरकार की आर्थिक नीतियों में किसानों की उपेक्षा बरती गई। कम उत्पादकता, अकाल, भुखमरी का सामना कर रहे भारत में कैसे फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी पैठ बनाई, इसका भी जिक्र किताब में है।

लेखक हरित क्रांति को लेकर कई ऐसे खुलासे करते हैं, जिसके बारे में नई क्या पुरानी पीढ़ियों को भी नहीं पता होगा। इसके बाद रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग से बढ़ते कैंसर के मरीजों की बात हो या छोटी जोत वाले किसानों के खेती छोड़ने की कहानियां या अलग-अलग कारणों से किसानों की आत्महत्या की मार्मिक कहानियां, इस किताब को और ऊंचाई प्रदान करती हैं। अंत में वर्तमान सरकार के तीन कानूनों के खिलाफ चले सफल आंदोलन का जिक्र करते हुए अपनी बेटी पीहू से कहते हैं, “हमें बस एक छोटी सी बात को समझना है- अगर किसान नहीं रहे तो हम भी नहीं रहेंगे।”

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