रबी फसलों की 81.69 प्रतिशत कटाई पूरी, खरीफ फसलों के लिए अच्छे संकेत

ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में मिट्टी में नमी 10 साल के औसत से कम
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फाइल फोटो: अग्निमीर बासु
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देश की कृषि व्यवस्था इस साल मानसून के आने से पहले ही असामान्य रूप से मजबूत स्थिति में खड़ी है। जलाशयों में औसत से कहीं अधिक पानी है। 90 प्रतिशत से ज्यादा भूजल केंद्र सामान्य स्तर पर हैं और कुछ राज्यों को छोड़कर मिट्टी में जड़ों तक पर्याप्त नमी बनी हुई है। यह सभी संकेत देते हैं कि खरीफ सीजन की शुरुआत मजबूत आधार पर हो सकती है। लेकिन इसी तस्वीर के बीच बढ़ता तापमान और लू की चेतावनी एक अहम जोखिम के रूप में उभर रही है, जो इस संतुलन को बिगाड़ सकती है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के क्रॉप वेदर वाच ग्रुप की 20 अप्रैल को जारी साप्ताहिक रिपोर्ट में सबसे मजबूत संकेत जलाशयों से मिलते हैं। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, 16 अप्रैल 2026 को देश के 166 प्रमुख जलाशयों में 78.481 अरब घन मीटर (बीसीएम) पानी दर्ज किया गया, जो इनकी कुल 183.565 बीसीएम क्षमता का 42.75 प्रतिशत है। यह स्तर पिछले साल के मुकाबले 16.25 प्रतिशत और पिछले दस साल के औसत से 27.20 प्रतिशत अधिक है।

स्थिति की मजबूती इस बात से भी साफ होती है कि 166 में से 150 जलाशयों में पानी सामान्य स्तर के 80 प्रतिशत से ऊपर है, जबकि केवल 6 जलाशय ही 50 प्रतिशत से नीचे हैं। यानी मानसून से पहले ही देश के अधिकांश बड़े बांध “भरे” हुए हैं।

भूजल के आंकड़े भी इसी सकारात्मक रुझान को आगे बढ़ाते हैं। जनवरी 2026 के डेटा के अनुसार, देश के 90.30 प्रतिशत निगरानी केंद्र सामान्य स्थिति में हैं। इनमें से 75.8 प्रतिशत स्टेशनों पर जलस्तर जमीन से 10 मीटर के भीतर है, जिससे सिंचाई के लिए पानी निकालना आसान बना हुआ है। इतना ही नहीं, करीब 70 प्रतिशत केंद्रों में भूजल स्तर 2016–2025 के दशकीय औसत से बेहतर दर्ज किया गया है।

हालांकि. पश्चिमी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में जलस्तर 20 मीटर से नीचे जा चुका है, जो नकारात्मक जल संतुलन का संकेत देता है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के कुछ हिस्सों में भी स्थानीय गिरावट दर्ज की गई है।

मिट्टी की नमी के स्तर इस समय खेती के लिए अनुकूल स्थिति को और मजबूत करते हैं। 10 से 16 अप्रैल 2026 के बीच उपग्रह आधारित आंकड़े दिखाते हैं कि राजस्थान से लेकर पूर्वोत्तर तक, देश के अधिकांश कृषि क्षेत्रों में जड़ क्षेत्र की नमी पिछले दस साल के औसत के बराबर या उससे बेहतर है। इसका सीधा मतलब है कि फसलों की जड़ों तक पर्याप्त पानी उपलब्ध है। हालांकि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के कुछ हिस्सों में यह स्तर औसत से नीचे रहा, जहां सिंचाई पर अतिरिक्त निर्भरता बढ़ सकती है।

वर्षा का पैटर्न थोड़ी जटिल तस्वीर पेश करता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, 9 से 15 अप्रैल के बीच साप्ताहिक वर्षा दीर्घकालीन औसत (एलपीए) से 46 प्रतिशत कम रही। लेकिन यदि 1 मार्च से 15 अप्रैल तक का संचयी आंकड़ा देखें, तो यह एलपीए से 14 प्रतिशत अधिक है।

क्षेत्रीय स्तर पर पूर्वोत्तर भारत में 19 प्रतिशत और मध्य भारत में 25 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत में 5 प्रतिशत और दक्षिण प्रायद्वीप में 16 प्रतिशत की कमी रही।

23 अप्रैल से सक्रिय नया पश्चिमी विक्षोभ हिमालयी क्षेत्रों में हल्की से मध्यम वर्षा और बर्फबारी ला सकता है।

इसके बावजूद, तापमान और लू सबसे बड़ा जोखिम बनकर सामने आ रहे हैं। 19 से 23 अप्रैल के बीच पश्चिम मध्य प्रदेश, विदर्भ, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और ओडिशा में लू की चेतावनी जारी की गई थी। हालांकि 24 से 30 अप्रैल के बीच इसकी तीव्रता कुछ कम रहने की संभावना है। यह वही समय है जब गेहूं की फसल का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अभी भी खेतों में खड़ा है। जो किसी भी तापीय झटके के प्रति संवेदनशील है।

फसलों की प्रगति फिलहाल संतुलित है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अनुसार, 17 अप्रैल 2026 तक रबी फसलों की 81.69 प्रतिशत कटाई पूरी हो चुकी है। तिलहन की 98.41 प्रतिशत और सरसों की 100 प्रतिशत कटाई हो चुकी है। दलहन 97 प्रतिशत पर हैं। जिसमें चना 98, उड़द 98 और मूंग 82 प्रतिशत कटा है। गेहूं की कटाई 75 प्रतिशत तक पहुंची है, लेकिन पंजाब (30%), हरियाणा (65%) और उत्तर प्रदेश (70%) में अभी भी बड़ा हिस्सा खेतों में है।

दूसरी ओर, ग्रीष्मकालीन बुवाई ने गति पकड़ी है। 17 अप्रैल तक 69.06 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी है, जो पिछले साल के 66.14 लाख हेक्टेयर से 2.92 लाख हेक्टेयर अधिक है। दलहन (15.47 लाख हे.) और तिलहन (9.14 लाख हे.) दोनों में रकबा बढ़ा है, जबकि ग्रीष्मकालीन धान 30.64 लाख हेक्टेयर पर है, जो पिछले साल के 32.31 लाख हेक्टेयर से थोड़ा कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इनपुट सप्लाई भी ठीक बनी हुई है। 17 अप्रैल 2026 तक यूरिया का स्टॉक 64.43 लाख मीट्रिक टन, डीएपी 21.82 लाख मीट्रिक टन और कुल उर्वरक उपलब्धता 170.45 लाख मीट्रिक टन है, जबकि पूरे खरीफ सीजन की अनुमानित जरूरत 390.56 लाख मीट्रिक टन है। यानी सीजन की शुरुआत में ही पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर भारतीय खाद्य निगम के पास 1 अप्रैल को 604.02 लाख मीट्रिक टन अनाज (चावल 386.10 और गेहूं 217.92) का भंडार था, जो बफर नॉर्म 210.40 लाख मीट्रिक टन का लगभग तीन गुना है।

कीट और रोगों का दबाव भी फिलहाल आर्थिक नुकसान की सीमा से नीचे है, जिससे फसलों पर अतिरिक्त खतरा नहीं दिख रहा।

अगर आने वाले हफ्तों में तापमान और लू का असर बढ़ता है, तो यही मजबूत शुरुआत जोखिम में बदल सकती है। खरीफ की सफलता अब सिर्फ मानसून पर नहीं, बल्कि इस प्री-मानसून विंडो को सुरक्षित निकालने पर निर्भर करेगी।

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