

इंदौर में गंदे पेयजल से 15 मौतें हो चुकी हैं, जबकि प्रशासन ने केवल चार मौतें दर्ज की हैं।
सीवेज के पानी के कारण यह स्थिति बनी है।
मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग ने रिपोर्ट मांगी है।
सीएजी की रिपोर्ट में पहले ही जल प्रबंधन की खामियाँ उजागर हो चुकी हैं, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ है।
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में गंदे पेयजल की वजह से मरने वालों की संख्या 15 पहुंच गई है। वहीं, दो सौ से ज्यादा लोगों का अब भी इंदौर के अस्पतालों में इलाज चल रहा है। भागीरथपुरा नाम के इस क्षेत्र में गंदे पेयजल की शिकायत लंबे समय से रहवासी कर रहे थे, पर प्रशासन मौतों के बाद चेता है।
मध्यप्रदेश सरकार ने इस मामले में अपनी स्टेटस रिपोर्ट शुक्रवार 2 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट में पेश की। इस स्टेटस रिपोर्ट में गंदे पेयजल के कारण चार मौत होना ही दर्ज किया गया है, जबकि तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस क्षेत्र में अब तक 15 मौतें होना रिपोर्ट किया गया है।
इस मामले में अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी। मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग ने भी इस मामले में संज्ञान लेते हुए मुख्य सचिव से दो सप्ताह के अंदर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
बताया जा रहा है कि पेयजल में सीवेज का पानी मिलने के कारण यह स्थिति बनी है। गुरुवार को स्वास्थ्य विभाग को मिली रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि बीमार होने का कारण दूषित पेयजल ही है, लेकिन इसमें कौन सा बैक्टीरिया पाया गया है, इसकी पुख्ता जानकारी दूषित पेयजल की विस्तृत कल्चर रिपोर्ट के बाद ही मिल सकेगी।
मेडिकल कॉलेज इंदौर में जांच की जा रही है। हालांकि आशंका जताई जा रही है कि यह वह बैक्टीरिया है जिससे हैजा फैलने का खतरा होता है।
इंदौर शहर के निवासी गोविंद शर्मा ने बताया कि पूरे शहर में कहीं किसी नल से सीधे पानी नहीं पीया जा सकता है। नागरिक दो दिन में एक बार मिलने वाले पानी को फिटकरी व क्लोरीन से शुद्ध कर उपयोग करते हैं। कहीं—कहीं 40 से 50 साल पुरानी सप्लाई लाइन है जो कहीं 5 तो कहीं 7 फुट और कहीं 10 फुट तक जमीन के नीचे है जिनपर भी कहीं गटर तो कहीं ड्रेनेज की लाइन डाल दी गई।
लंबे समय से चल रहा काम, नतीजा सिफर
मध्यप्रदेश में पानी के मुद्दे पर काम करने वाले रहमत बताते हैं कि 2004 में मध्यप्रदेश के चार महानगरों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने बीस करोड़ डालर का कर्ज दिया था।
इसमें शहरों में जलप्रदाय व्यवस्था की मात्रा और गुणवत्ता दोनों को ही सुधारने के लिए प्रावधान किया गया था। सफाई भी उसके अंदर एक बड़ा मुद्दा था, जिसे ठीक करना था। इस परियोजना की शर्तें थी कि सभी को पर्याप्त और साफ पानी मिले।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक मे 2019 में भोपाल और इंदौर के जल प्रबंधन पर एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में दोनों ही शहरों में गंभीर खामियाँ सामने आयी थीं। परियोजना पर हुए काम को नाकाफी माना गया है। रिपोर्ट आने के दो साल बाद भी कोई संज्ञान नहीं लिया गया है।
रहमत बताते हैं कि अभी जिस तरीके से पाइपलाइन में कंटेमिनेशन हुआ है वह दंडनीय बात है। इससे समझ में आता है कि व्यवस्था की नजर में जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, यह भी नहीं देखा जा रहा है कि टायलेट कहां बनेगा और उसके आसपास कोई पेयजल की लाइन तो नहीं जा रही है।
इंदौर में गंदा पानी कोई नया विषय नहीं है, मौतों के कारण यह हाईलाइट हो रहा है। यदि यहां पर दो पाइपलाइन में से एक भी ठीक होती तो यह दुर्घटना नहीं होती। पानी दूषित हुआ है इसका मतलब है कि दोनों ही पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हुई हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता अरुण डिके कहते हैं, "यदि हमें वास्तव में जीना है तो गांवों की तरफ रुख करना पड़ेगा। जिस तरह से अंधाधुंध शहरीकरण हो रहा है उसमें कोई राजनेता, राजनीतिक दल या प्रशासन कुछ नहीं कर सकता है, अंधाधुंध शहरीकरण इसी तरह की घटनाओं को नए—नए रूपों में सामने लाएगा।" उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की इंदौर में ही कही गई बात का जिक्र किया कि हम अपने आसपास एक ऐसा कोकून बना रहे हैं जिससे घिरकर हम एक दिन रेशम के कीड़े की तरह ही मर जाएंगे।
सीएजी की रिपोर्ट में मिली थी गंभीर खामियाँ
इंदौर और भोपाल शहर में जल प्रबंधन पर सीएजी ने 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके अनुसार भोपाल और इंदौर में जल प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
— इंदौर में रोजाना केवल चार जोन और इंदौर में केवल पांच जोन में प्रतिदिन पानी सप्लाई हो रहा है।
— दोनों नगरों के 9.41 लाख परिवारों में से केवल 5.30 लाख को ही नल कनेक्शन दिए जा सके हैं।
— लीकेज कंट्रोल करने में नगर निगमों को 22 से लेकर 108 दिन लगते हैं।
— वर्ष 2013–18 के बीच पानी के 4,481 नमूने पीने लायक नहीं पाए गए। भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख परिवारों को शुद्ध पानी नहीं प्रदाय किया गया। इस दौरान 5.45 लाख जलजनित बीमारियों के केस रिपोर्ट हुए।
— गैर राजस्व जल मात्रा 30 से 70% तक है। यानी इतना पानी कहां जा रहा है किसी को पता नहीं।
— जल दरों की अपेक्षित वसूली नहीं। दोनों शहरों में 470 करोड़ रुपये का जल कर बकाया।
— भोपाल में मात्र 9–20 एलपीडीसी और इंदौर में 36–62 एलपीडीसी प्रदाय हो रहा है।
— ओवरहेड टंकियों की नियमित सफाई नहीं की जा रही है।
— जल ऑडिट नहीं किया जा रहा है तो पानी की बर्बादी कैसे पता चलेगी?