विश्व जल दिवस विशेष: उम्मीद की किरण बना है ओडिशा का यह मॉडल

जहां तमाम शहर सुरक्षित जल आपूर्ति के लिए संघर्ष कर रहे, वहां ओडिशा सफलता की कहानी पेश कर रहा
प्रतीकात्मक तस्वीर
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कुछ राज्यों में पुराने पाइपलाइन नेटवर्क और रुक-रुक कर पानी सप्लाई होने के कारण बार-बार फैलने वाले रोगों से जूझ रहे हैं। वहीं, ओडिशा एक शहरी जल कार्यक्रम चला रहा है जो भारतीय घरों में लंबे समय से बनी धारणा को चुनौती देता है कि नल का पानी बिना फिल्टर के पीने योग्य नहीं है।ओडिशा के 11 शहरों में लगातार 24 घंटे स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति के लिए 2017 में “ड्रिंक फ्रॉम टैप” मिशन शुरू किया गया है। इनमें पुरी, गोपालपुर, निमापाड़ा, ब्रह्मपुर, चंपुआ, राजगांगपुर, बीरमित्रपुर, रायरंगपुर, सुंदरगढ़, हिंजिलिकाटू और आनंदपुर शामिल हैं। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, अब तक 6 लाख कनेक्शन किए गए हैं, जिसके जरिए 32 लाख लोग लगातार नल का पानी हासिल कर रहे हैं।

इस कार्यक्रम के तहत जलसाथी बनाए गए हैं, जो पानी के मीटर पढ़ने, जल शुल्क वसूलने, क्षेत्र-स्तरीय गुणवत्ता परीक्षण करने और नए घरेलू कनेक्शन स्थापित करने का काम करते हैं। पुरी की जलसाथी सुनीता मिश्रा कहती हैं, “पहले, जिन परिवारों के पास वाटर प्यूरीफायर नहीं था, उन्हें पानी उबालना पड़ता था या फिल्टर किया हुआ पानी खरीदना पड़ता था। अब अधिकांश घर सीधे नल से मिलने वाला पानी पीते हैं।” वहीं, सार्वजनिक स्थानों में भी लोग बोतलबंद पानी खरीदने के बजाए नल से पानी पीते हैं। इस आपूर्ति का बुनियादी सिद्धांत बहुत ही सरल है। पाइपलाइन में लगातार दबाव बनाए रखना, जिससे संदूषण को रोका जा सके। ओडिशा वाटर कॉरपोरेशन (डब्ल्यूएटीसीओ) के पूर्व मुख्य कार्यकारी प्रदीप कुमार स्वैन कहते हैं, “मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि पाइपलाइन में कोई बाहरी प्रदूषक प्रवेश न करे। 24 घंटे पानी की आपूर्ति इसे संभव बनाती है।” स्वैन अब 24-घंटे जल आपूर्ति के लिए बने राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सदस्य भी हैं।

भारत के अधिकांश शहर जहां पानी की सप्लाई अल्पकालिक है, वहां पानी में गंदगी की समस्याएं भी ज्यादा हैं। पाइपलाइन बंद होने के दौरान दबाव खत्म हो जाता है और जिससे एक वैक्यूम प्रभाव पैदा होता है। इस दौरान दरारों, जोड़ों या अवैध कनेक्शनों के माध्यम से गंदा पानी पाइप में पहुंच सकता है। जबकि लगातार सप्लाई में रिसाव के बावजूद पाइपलाइन में दबाव बना रहता है, जिससे संदूषण नहीं होता।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि केवल लगातार दबाव बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। यदि जमीन के नीचे यूटिलिटी लेआउट दोषपूर्ण हो तो भी समस्या पैदा हो सकती है। भारत में पीने के पानी के संदूषण का सबसे आम कारण सीवर और जल आपूर्ति पाइपलाइन का पास-पास होना या कभी-कभी सीधा ओवरलैप होना है। सेंट्रल पब्लिक हेल्थ एंड एनवॉयरमेंटल इंजीनियरिंग ऑर्गेनाइजेशन (सीपीएचईईओ) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, सीवर और जल लाइनों के बीच कम से कम 3 मीटर क्षैतिज और 1-1.5 मीटर ऊर्ध्वाधर दूरी रखी जानी चाहिए।

ओडिशा के “ड्रिंक फ्रॉम टैप” मिशन का मुख्य सिद्धांत यह है कि पाइपलाइनों में लगातार दबाव बनाए रखने से पानी दूषित होने से बचता है

स्वैन कहते हैं, “यदि यह दूरी नहीं रखी जाती, तो संदूषण का जोखिम हमेशा बना रहता है।” इस चुनौती का सामना करने के लिए, ओडिशा ने किसी भी शहर में 24-घंटे सप्लाई शुरू करने से पहले विस्तृत एसेट मैपिंग अनिवार्य कर दिया है। मैपिंग के बाद, जरूरत के अनुसार पानी की पाइपलाइन को सही जगह पर शिफ्ट कर दिया गया। डब्ल्यूएटीसीओ के जल प्रबंधन सलाहकार चिन्मय त्रिपाठी कहते हैं, “अधिकतर संदूषण मामलों में यह पाया गया है कि पानी की पाइपलाइन या घरेलू कनेक्शन नाले के नीचे से गुजर रहा था।” त्रिपाठी बताते हैं कि सीवर लाइनें ग्रेविटी आधारित होती हैं और अपनी उत्पत्ति बिंदु से दूर जाने पर धीरे-धीरे गहरी होती हैं, जबकि जल आपूर्ति पाइपलाइन आम तौर पर लगभग एक मीटर की स्थिर गहराई पर चलती है। इसका मतलब है कि प्रारंभिक कुछ हिस्सों में, जहां दोनों सिस्टम पास-पास हैं वहां संदूषण का जोखिम सबसे अधिक है। ओडिशा मॉडल घरेलू स्तर पर पानी में होने वाले सामान्य संदूषण जोखिमों को भी खत्म करने पर ध्यान देता है, खासकर भूमिगत टैंक और छत पर रखे पानी के टैंक में यह समस्याएं होती हैं।

स्वैन के अनुसार, यह टैंक अक्सर गंदगी फैलाने का कारण बनते हैं, इसलिए घरों और अपार्टमेंट्स को इन्हें हटाने की सलाह दी जाती है। पुरी में 85 प्रतिशत घरों ने अपनी मर्जी से स्टोरेज टैंक हटा दिए हैं। ओडिशा ने जल गुणवत्ता निगरानी की संरचना भी दोबारा बनाई और हाउसिंग और शहरी विकास विभाग के तहत एक स्वतंत्र वॉटर क्वालिटी एश्योरेंस सेल बनाया है। जल गुणवत्ता की जांच कई स्तरों में होती है। मसलन, शहर, क्षेत्रीय और राज्य प्रयोगशालाओं में यह जांच की जा रही है। इस जांच में भुवनेश्वर स्थित आईआईटी बतौर तीसरी पार्टी सत्यापन के लिए शामिल है।पानी की जांच में कुल 69 तरह की जांच होती हैं। इनमें से करीब 50 जांचे नियमित तौर पर की जाती हैं, जो शहर में मौजूद खास खतरों, जैसे भारी धातुओं के प्रदूषण को भी ध्यान में रखती हैं। अमृत 2.0 मिशन के तहत, केंद्र राज्यों को ओडिशा मॉडल अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। अधिकारी और जल विशेषज्ञ कहते हैं कि लंबी अवधि में 24-घंटे दबावयुक्त आपूर्ति ही एकमात्र संरचनात्मक समाधान है, जो ना सिर्फ संदूषण से बचाती है बल्कि इंदौर जैसी त्रासदियों को भी रोकती है।

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