

नवंबर 14, 2025 को ईरान की राजधानी तेहरान में चार प्रमुख धार्मिक स्थलों पर सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी है। शुक्रवार का दिन है लेकिन हजारों लोगों का यह जमावड़ा रोज की नमाज के लिए नहीं है बल्कि यह सभी लोग आंखों में आंसू भरकर, दोनों हाथों को उठाए “सलात अल इस्तिस्का” अदा कर रहे हैं। यह एक ऐसी सामूहिक पारंपरिक नमाज है जो सूखे के समय बारिश की आस के लिए है। यह सामूहिक प्रार्थना रब से मदद की गुहार भी है और उस लंबे सूखे से माफी और राहत की याचना भी है, जिसने बीते पांच वर्षों से ईरान को जकड़ कर रखा है।
बीते लगभग पचास सालों में ईरान में ऐसा नहीं हुआ था, जैसा 2025 के शरद ऋतु यानी ठंड के मौसम में हुआ। औसत से 90 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई जो पांच दशको का सबसे शुष्क मौसम था। ईरान के उत्तर-पश्चिम में स्थित उर्मिया झील सूख गई, जिसके चलते नमक भरी आंधियों के उठने की खबरें सामने आईं। तेहरान में सामूहिक प्रार्थना के कुछ ही दिनों बाद सरकार उर्मिया झील क्षेत्र में क्लाउड सीडिंग शुरू कराती है। अधिकारी संभावित पानी की राशनिंग की बात करने लगते हैं। वहीं, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान तेहरान से बड़ी तादाद में, लगभग एक करोड़ लोगों के विस्थापन का संकेत भी देते हैं।
जनवरी, 2026 तक पहुंचते-पहुंचते इसका जवाब निराशाजनक ही दिखाई देता है। ईरान में सूखा अपने छठे वर्ष में प्रवेश कर रहा है, मगर वहां के जमीनी हालात की सही तस्वीर मिलना मुश्किल है क्योंकि देशभर में इंटरनेट पूरी तरह बंद कर दिया गया है। जो स्थिति कभी संसाधनों के लिए हड़बड़ी भर थी, वह अब सामाजिक उथल-पुथल और अशांति में बदलती दिख रही है।
बहरीन में कार्यरत सूचना प्रौद्योगिकी प्रबंधक और नियमित तौर पर ईरान आने-जाने वाले प्रबोध सारंगी डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “मुझे बताया गया है कि इस अशांति की शुरुआत इस्फहान क्षेत्र से हुई, जहां कई वर्षों से जल संकट सबसे गंभीर रहा है और पानी को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं।” वह आगे कहते हैं,“इस बार सरकार की कार्रवाई बेहद सख्त रही है। आशंका है कि लगभग 20,000 लोग मारे गए हों, लेकिन इसकी पुष्टि कर पाना फिलहाल संभव नहीं है।”
वहीं, ईरान में फैली अशांति के कारणों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। 17 जनवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने स्वीकार किया कि हजारों ईरानी अपनी जान गंवा चुके हैं। उन्होंने इसका कारण अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़े भू-राजनीतिक तनावों को बताया। हालांकि द गार्डियन समेत कई मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि यह अशांति सीधे तौर पर तेहरान, मशहद और तबरीज जैसे कई शहरों में आए “डे जीरो” संकट से उपजी। “डे जीरो” उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी शहर की नगर जल आपूर्ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है और नलों से पानी आना बंद हो जाता है। हालांकि, यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ के डायरेक्टर और ईरान के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरमेंट के पूर्व डिप्टी हेड कावेह मदानी द गार्डियन के डे जीरो से उपजी अशांति के दावे को खारिज करते हैं। मदानी डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “क्या ईरान में पानी की स्थिति खराब है और क्या लोग इससे असंतुष्ट हैं? बिल्कुल। लेकिन जब लोग विरोध प्रदर्शनों में नारे लगा रहे थे तो क्या उन्होंने पानी को लेकर ऐसा कुछ कहा? नहीं। इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं।”
दुबई में भू-राजनीतिक जोखिम प्रबंधन से जुड़ी कंसलटेंसी जियोपो कंसल्ट के डायरेक्टर आसिफ शुजा ईरान की अशांति का कारण पर्यावरण से ज्यादा राजनीतिक अधिक मानते हैं। शुजा डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “अंतरराष्ट्रीय अलगाव व उसके कारण उत्पन्न हुई आर्थिक कठिनाइयां और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लगी पाबंदियां जैसे सभी महत्वपूर्ण कारक हैं, जिनसे ईरानी जनता लंबे समय से जूझ रही है।” चाहे यह अशांति का सीधा कारण हो या ना हो लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरान गंभीर जल संकट की चपेट में है।
इस सूखे की शुरुआत साल 2020 में हुई जब बारिश नहीं हुई। वहीं, 2024 के बाद से बारिश लगभग पूरी तरह गायब रही। 2025 में ईरान में वर्षा में 42 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। ईरान की जल प्रबंधन संसाधन कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर, 2025 तक लगभग 19 बांध केवल पांच प्रतिशत क्षमता पर थे और तेहरान को जलापूर्ति करने वाले पांच बांधों में सभी की क्षमता 10 प्रतिशत से भी कम रह गई थी। इस दौरान, सूखे और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध को समझने की कोशिशें भी हुईं। वर्ष, 2023 में जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं पर उसके असर पर अध्ययन करने वाले एक वैश्विक वैज्ञानिक नेटवर्क वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (डब्ल्यूडब्ल्यूए) ने पाया कि यदि वैश्विक तापमान नहीं बढ़ता तो यह तीन साल का सूखा केवल 50 से 100 वर्षों में एक बार ही आता। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल पॉलिसी में रिसर्च एसोशिएट और डब्ल्यूडब्ल्यूए की सदस्य मरियम जकारिया डाउन टू अर्थ को बताती हैं, “2025 में स्थिति आपातकालीन बन गई। हमने इस घटना की परिभाषा अब पांच वर्ष की अवधि के हिसाब से अपडेट की है।” डब्ल्यूडब्ल्यूए का विश्लेषण ईरान के साथ-साथ सीरिया और इराक में टाइग्रिस-यूफ्रेट्स बेसिन को भी कवर करता है।
डब्ल्यूडब्ल्यूए के ताजा विश्लेषण के मुताबिक, यह पांच वर्षीय सूखा औसतन हर 10 साल में आता है और इसका प्रभाव न केवल जलवायु परिवर्तन बल्कि क्षेत्रीय तापमान बढ़ने से भी है। अध्ययन में कहा गया, “क्षेत्र में तेजी से लैंड यूज में बदलाव, अत्यधिक चराई और कृषि विस्तार ने मिट्टी की उर्वरता और पारिस्थितिक क्षमता को घटाया है, जिससे प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हुई और सूखे के प्रभाव बढ़ गए।” सरकार ने दिशा बदलने के लिए कुछ प्रयास भी किए हैं। 2020 में होप ट्रांसफर लाइन परियोजना शुरू की गई, जो खारे पानी को दक्षिणी खाड़ी क्षेत्र से उत्तरी कैस्पियन सागर तक ले जाने और पाइपलाइन के माध्यम से अन्य क्षेत्रों से जोड़ने का प्रयास है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इरानियन स्टडीज की फेलो बानाफशेह कीनूश ने जून 2021 में लिखा, “यह योजना किसानों और उद्योगपतियों के लिए समृद्धि और उन समुदायों के लिए पीने योग्य पानी की गारंटी देती है, जो रेड जोन यानी गंभीर जल संकट वाले क्षेत्रों, लगभग 10,000 गांवों और शहरों में आते हैं।” यह ईरान के लिए अभूतपूर्व प्रयास था क्योंकि ईरान हमेशा पड़ोसी देशों जैसे सऊदी अरब की तुलना में जल संपन्न रहा है।
कीनूश के मुताबिक, अक्टूबर 2020 से अप्रैल 2021 के बीच होप ट्रांसफर लाइन परियोजना के तीन चरण शुरू किए गए और चौथे चरण की योजना बनाई गई थी। हालांकि, इन परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति पर विश्वसनीय जानकारी या रिपोर्टिंग उपलब्ध नहीं है। तेहरान में जलापूर्ति के लिए पास के तालेकान बांध से पानी लाने का एक और अस्थायी प्रयास किया गया लेकिन यह केवल समस्या का एक हिस्सा ही हल कर सकता था।
ईरान में सरकार और संपन्न वर्ग द्वारा जल संसाधनों के दुरुपयोग और कुप्रबंधन पर भी काफी बातें हुई हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 में एक यूट्यूब वीडियो में तेहरान यूनिवर्सिटी में वाटर रिसोर्सेज मैनेजमेंट के प्रोफेसर बानाफशेह जहराई और शाहिद बेहेश्ती यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और समाजशास्त्री मोहम्मद फजेली ने इस संकट का सामना करने में जिम्मेदार संस्थानों के बीच समन्वय की कमी को एक बड़ा अवरोध बताया था। फजेली ने जोर देकर कहा कि “ईरानी जनता अभी तक सही जल उपयोग के पैटर्न का अनुभव नहीं कर पाई है और जब तक वह सीधे अपने उपयोग के परिणामों का अनुभव नहीं करेंगे तब तक जल उपयोग की आदतों में कोई स्थायी बदलाव नहीं आएगा।”