कावेह मदानी

“खाली हो गया है पानी का चालू खाता”

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ के डायरेक्टर और ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी रिपोर्ट के लेखक कावेह मदानी का कहना है कि अगर जल संकट को कम करने की उम्मीद है तो दुनिया को पानी की न्यू नॉर्मल स्थिति को स्वीकार करना होगा
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“वाटर बैंकरप्सी” जल संकट या जल तनाव से कैसे अलग है?

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जैसे ही कोई “वाटर बैंकरप्सी” शब्द सुनता है, वह समझता है कि हम उपलब्ध पानी और पानी की मांग या उपयोग के बीच असंतुलन की बात कर रहे हैं। “जल संकट” एक ऐसी स्थिति है जो कि प्राकृतिक कमी, अत्यधिक उपयोग या बुनियादी ढांचें की कमी से हो सकता है। संकट एक असामान्य स्थिति है, एक तरह का झटका है। हालांकि, संकट में यह उम्मीद होती है कि इसे कम किया जा सकता है और सुधारा जा सकता है। लेकिन इस रिपोर्ट में हम बात कर रहे हैं उस असफलता की स्थिति की जो संकट के बाद पैदा होती है। यह खतरनाक स्थिति इसलिए आई क्योंकि हमने बहुत लंबे समय तक उपलब्ध पानी से अधिक पानी का इस्तेमाल किया और हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाया है।

हमारा चालू खाता यानी नदियां, झीलें और अन्य सतही जलाशय दरअसल खाली हो चुका है। और जलवायु परिवर्तन हमारी आय को कम कर रहा है क्योंकि वर्षा घट रही है। हमारा संपत्ति खाता, यानी भूजल भी सूख चुका है। फिर भी किसानों, शहरों, डाटा सेंटर्स और पावर प्लांट्स के लिए जल की मांग बनी रहती है। शुरुआत में हम कर्ज लेते हैं या यूं कहें कि प्रकृति का दोहन करते हैं लेकिन यह लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होता। सिस्टम धीरे-धीरे ढहने लगता है। नदियां सिकुड़ती या प्रदूषित होती हैं। झीलें और वेटलैंड सूख जाते हैं। भूजल घटता है और फिर भूमि का धंसना, सिंकहोल, रेगिस्तान बनना, धूल और रेत के तूफान, वनों में आग, जैव विविधता की हानि और ग्लेशियर पिघलने से लेकर बाढ़ जैसी घटनाएं जन्म लेती हैं। इस नई वास्तविकता के साथ निपटते हुए हमें शब्दावलियों पर भी पुनर्विचार करना होगा। रिपोर्ट कहती है कि वाटर बैंकरप्सी को समझकर हम नुकसान को कम कर सकते हैं। भविष्य के नुकसान को रोक सकते हैं और नई वास्तविकता और सीमाओं को स्वीकार कर सकते हैं, जिसके आधार पर हमें कामकाज के तरीकों को भी फिर से परिभाषित करना होगा।

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क्या वाटर बैंकरप्सी के लिए वैश्विक तापमान और जल प्रबंधन दोनों जिम्मेदार हैं?

A

जल प्रणाली काफी जटिल और नॉन लीनियर होती है। यानी इसमें कारण और परिणाम का संबंध सीधा और समान अनुपात में नहीं होता है, इसलिए यह तय करना मुश्किल होता है कि किस कारण का कितना असर है। जलवायु परिवर्तन ने कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता को कम किया है। वर्षा के पैटर्न, उसकी मात्रा और आवृत्ति को बदल दिया है। ना सिर्फ ग्लेशियर पिघले बल्कि जलचक्र को भी प्रभावित किया है। ज्यादातर बड़े बांध, जलाशय और अंतरराष्ट्रीय जल समझौते पुराने ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर बनाए गए हैं, जो अब जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग परिवर्तन और अन्य कारणों से प्रासंगिक नहीं रहे। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने यह तय नहीं किया कि भारत, सऊदी अरब या अमेरिका में कृषि कितनी होगी या हमारे शहर कहां बनेंगे। नदियों और आर्द्रभूमि का सिकुड़ना फीडबैक इफेक्ट पैदा करता है, जैसे शहरों में हीट आइलैंड का असर देखा जा सकता है। अक्सर लोग इन आपस में जुड़े कारकों को भूल जाते हैं और केवल एक को दोषी ठहरा देते हैं।

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हम ऐतिहासिक जलसंकट की स्थितियों से क्या सीख ले सकते हैं?

A

वाटर बैंकरप्सी दो कारणों से होता है। पहला, है इनसॉल्वेंसी यानी पानी की मांग उपलब्धता से अधिक है। दूसरा अपरिवर्तनीयता यानी लंबे समय तक असंतुलन के कारण स्थायी नुकसान का होना, जिसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। कुछ जगहों पर इनसॉल्वेंसी को अभी भी सुधारा जा सकता है, जबकि कई जगहों पर यह अब अपरिवर्तनीय हो चुकी है। इसके जीते-जागते सबूत मौजूद हैं। कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और अफ्रीका में बड़ी झीलों का सूखना हो या फिर चेन्नई, केप टाउन, तेहरान, साओ पाउलो और मेक्सिको सिटी में “डे जीरो” जैसी घटनाएं हों। हम कई नदी-घाटियों में भू-धंसाव और सिंकहोल बनने की घटनाएं देख रहे हैं, जैसे हाल ही में तुर्किये में देखने को मिला। साथ ही कई स्थानों पर मरुस्थलीकरण और रेत भरी आंधियां तीव्र हुई हैं,जो इसकी प्रत्यक्ष गवाही दे रहीं हैं। इन जल समस्याओं को हल करने के लिए हमें सबसे पहले भूगोल और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की विविधता समझनी होगी। मसलन, पानी की कमी को लेकर तनाव और गंभीरता की परिभाषा हर जगह अलग हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में जल व्यवस्था कभी सामान्य नहीं हो पाएगी। भू-धंसाव जैसे मामलों में कुछ प्रणालियों को फिर से बहाल करना भौतिक रूप से मुश्किल हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन गंभीर समस्याओं के बारे में हमने अभी तक सोचा नहीं है और हमें एक नया एजेंडा तैयार करने की जरूरत है।

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