

क्या मामल्लन जलाशय चेन्नई के पेयजल के लिए जरूरी है?
जयरामन – यह एक पेचीदा सवाल है, मैं इसे पेचीदा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हम मौजूदा पानी का समझदारी से इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं। अगर चेन्नई एक ऐसी जगह है जहां पानी की कमी है तो यहां डेटा सेंटर जैसे अधिक पानी इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को क्यों बुलाया जा रहा है? अगर आप पीने के पानी की बात कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि अगर हम चीजो को सही ढंग से मैनेज करें तो पीने के पानी के लिए काफी पानी हो सकता है। अगर पीने के पानी की कमी है तो शहर के आसपास मौजूद तालाबों के नेटवर्क से गाद (सिल्ट) निकालकर उस कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। यही नहीं पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड इंजीनियर और वॉटर इंजीनियरों के एक ग्रुप ने तो राज्य सरकार को एक प्रस्ताव दिया है, जिसमें कहा गया है कि मामल्लन जलाशय से मिलने वाली पूरी सप्लाई के मुकाबले यदि शहर के आसपास मौजूद जलाशय और सिंचाई के लिए बने तालाबों से गाद (सिल्ट) निकाल दें तो जलाशय के मुकाबले बहुत कम लागत में चेन्नई की पेयजल की समस्या को हल किया जा सकता है। तो स्पष्ट तौर पर आपके सवाल का जवाब यह है कि भले ही सच में पानी की जरूरत हो लेकिन मामल्लन जलाशय इसका कतई समाधान नहीं है।
मामल्लन जलाशय के निर्माण से मछुआरों पर और यहां की परिस्थितिकी तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
जयरामन- जलाशय के लिए जो जगह चुनी गई है, वह असल में ज्वारीय दलदली जमीन (टाइडल मार्शलैंड) है। यह एक ऐसा इलाका है जहां समुद्र का पानी दिन में दो बार हाई टाइड (ऊंचे ज्वार) के समय आता है। और यह मुहाने (एस्टुअरी) से लेकर बाढ़ के मैदानों (फ्लडप्लेन्स) तक फैला हुआ एक विस्तृत इलाका है। इस इलाके के पश्चिमी तरफ बारिश होने पर बाढ़ का पानी आता है और पूर्वी तरफ ज्वार और तूफान के समय समुद्र का पानी आता है तो यह इलाका ‘‘इकोटोन’’ (दो या दो से अधिक भिन्न पारिस्थितिक तंत्रों के बीच का क्षेत्र) कहलाता है। यह एक ऐसी जगह होती है जहां अलग-अलग तरह के हैबिटेट (पर्यावास) होते हैं। यह अलग-अलग हैबिटेट मोजेक (एक ऐसा क्षेत्र जहां अलग-अलग तरह के पर्यावास मिलकर एक विविधतापूर्ण संरचना का निर्माण करते ) है।
यह किसी एक तरह का हैबिटैट नहीं है। यहां ऐसी जगहें हैं जहां मीठा पानी अधिक है और ऐसी जगहें भी हैं जहां खारा पानी ज्यादा नमकीन होता है। फिर यहां सॉल्ट मार्श (खारा दलदल) और मैंग्रोव भी हैं। यहां गहरे पानी वाली जगहें भी मौजूद हैं तो इनमें से हर चीज अलग तरह के इकोसिस्टम और अलग तरह की बायोडायवर्सिटी को सपोर्ट करती है। यहां का पानी बहुत प्रोडक्टिव (उपजाऊ) है और जाहिर है यह प्रोडक्टिव पानी मछुआरों और पक्षियों, दोनों को अपनी ओर खींचता है। इस क्षेत्र में यहां मछुआरों के एक दर्जन से अधिक गांव बसे हुए हैं, जिनमें इरुला जैसे सबसे पिछड़े आदिवासी समुदायों के लोग भी शामिल है यह समुदाय पिछले काफी समय से हाशिए पर है। ये वे लोग हैं जिन्हें सचमुच में सरकार और समाज ने छोड़ दिया है लेकिन उनके लिए यह दलदली इलाका ही सब कुछ है।
यहां के एक गांव की मछली पकड़ने वाली महिला ने मुझे बताया कि इसी दलदली इलाके की वजह से वह अपने बच्चे को स्कूल भेज पाती है। और इसी वजह से परिवार का कोई सदस्य पहली बार स्कूल जा पा रहा है। मैं कॉलेज की बात नहीं कर रहा, मैं तो बस स्कूल की पढ़ाई की बात कर रहा हूं जो उनके लिए अब तक उनकी पहुंच से बाहर रही है। और यह सब उस दलदली इलाके और मछली, झींगे व केकड़े की बिक्री से होने वाली कमाई की वजह से ही मुमकिन हो पाया है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेज पा रहे हैं और यदि उनसे यह इलाका छिन जाता है तो उनकी आजीविका पर सीधे कुठाराघात है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि इस इलाके में रहने वालों सभी मछुआरे परिवार मछली, केकड़ा और झिंगा पकड़ने की अपनी पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक विधि का इस्तेमाल करते है, इस काम में वे मशीनों का कतई इस्तेमाल नहीं करते हैं।
इस समुदाय द्वारा मछली पकड़ने का यह तरीका पर्यावरण के लिहाज से बहुत ही सुरक्षित है। यह हाथ और पैर से किया जाने वाला काम है इसलिए अधिकतर मछुआरे लोग नावों का इस्तेमाल नहीं करते। वे पानी में चलकर जाते हैं और ऐसे जाल फेंका या बिछाया जाता है जिससे केवल मछली ही फंसे न कि दलदली के अन्य किट। यहां तक कि जो मछुआरे नाव का उपयोग करते हैं वे कभी नावों में इंजन नहीं लगाते।
राज्य सरकार का दावा है कि इस इलाके में बड़े पैमाने पर ग्राउंडवाटर रिचार्ज मुमकिन है?
जयरामन- नहीं, मुझे नहीं लगता है कि यह बात सही है। यह एक ऐसा इलाका है जहां पहले नमक भी बनाया जाता था यानी सॉल्ट पैन। इस इलाके के नीचे का पानी बहुत खारा है, ऐसे में इसके रिचार्ज होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि नॉर्मल क्राइटेरिया के हिसाब से जलाशय के लिए साइट चुनते समय यह देखा जाता है कि उससे जमीन में पानी का रिसाव न हो तो ये ऐसी जगहें हैं जहां आमतौर पर चिकनी मिट्टी होती है। चिकनी मिट्टी में पानी सोखने की दर (इनफिल्ट्रेशन रेट) बहुत कम होती है। इसका मतलब है कि इन इलाकों में रिचार्ज रेट आमतौर पर एक्विफर रिचार्ज जोन की तुलना में कम होते हैं। ऐसे में यदि रेतीली मिट्टी हो तो वह एक बेहतरीन एक्विफर रिचार्ज (जलधार पुनर्भरण क्षेत्र) जोन होता है।
आपने कहा कि वैज्ञानिक विश्वसनीयता किसी संस्थान की प्रतिष्ठा से नहीं आती बल्कि वैज्ञानिक ईमानदारी और पेशेवर समझदारी से कमाई जाती है, यह बात आपने किस संदर्भ में कही?
जयरामन- हां, मैंने ऐसा ही कहा था। मैने आईआईटी मद्रास के जल संसाधन विभाग की तकनीकी व्यवहार्यता रिपोर्ट का समर्थन नहीं किया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट में यह देखना होगा कि क्या सभी महत्वपूर्ण कारकों पर विचार किया गया है। अब समुद्र कोई शांत जगह नहीं है, यह बहुत सक्रिय रहता है। और यह तथ्य है कि यह जलाशय समुद्र के ज्वार-भाटे से प्रभावित क्षेत्र में स्थित है और समुद्र की अन्य गतिविधियों जैसे तूफानी लहरों और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से प्रभावित है। ऐसे में यदि मैं समुद्र पर विचार नहीं करता और यह तय करते समय समुद्र की गतिविधियों को ध्यान में नहीं रखता कि प्रोजेक्ट संभव है या नहीं तो उस व्यवहार्यता रिपोर्ट का कोई मूल्य नहीं है। क्योंकि सबसे शक्तिशाली कारकों में से एक उस पूरे सिस्टम में बंगाल की खाड़ी है। बंगाल की खाड़ी को नजरअंदाज कर दिया गया है, आईआईटी मद्रास ने उस पर विचार नहीं किया है और आईआईटी मद्रास की टीम में जिन दो लोगों ने वह रिपोर्ट लिखी है, उनमें से एक ओशन इंजीनियर है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उस व्यक्ति को पता नहीं था तो वह व्यक्ति टिप्पणी करने के लायक नहीं है।