

‘‘कोवलम-नेमेली आर्दभूमि (वेटलैंड) क्षेत्र एक खारा तटीय आर्द्रभूमि है, जहां खारा पानी और मीठा पानी मिलकर मछली, झींगा, केकड़ा और परिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं और यहां हमारे 16 गांव के मछुआरे पीढ़ियों से मछली पकड़ने का काम करते आ रहे हैं और अब सरकार यहां चेन्नई के पेयजल के लिए जलाशय का निर्माण कर हमारी आजीविका खत्म करने पर तुली हुई है।’’
यह बात तमिलनाडु में मछुआरों के संगठन भारत मक्कल कषगम के अघ्यक्ष पी प्रभाकरण ने डाउन टू अर्थ से कही। वह कहते हैं कि सरकार चेन्नई के लोगों की प्यास बुझाने के लिए हमारे 16 गांव के लगभग 7 हजार मछुआरा परिवारों की रोजीरोटी छीनने पर उतारू है।
गत जनवरी 2026 से ही इस क्षेत्र में बनाए जा रहे मामल्लन जलाशय परियोजना का स्थानीय मछुआरा समुदायों के साथ-साथ राज्य के पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों द्वारा भारी विरोध किया जा रहा है। ध्यान रहे कि राज्य सरकार इस खारे पानी के तटीय क्षेत्र को चेन्नई शहर के छठे मीठे पानी के पेयजल जलाशय में बदलना चाहती है।
यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी से जुड़ा हुआ है और खारे पानी को रोककर मीठा पानी जमा करने से झींगा, केकड़ा और मछलियों के प्रजनन करने की परिस्थितियां खत्म हो जाएंगी। ध्यान रहे कि इस जलाशय से प्रभावित होने वाले गांव में लगभग सात हजार मछुआरों का परिवार और विशेष रूप से इरुलर आदिवासी समुदाय की महिलाओं की आजीविका पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये आदिवासी मछली पकड़ने के लिए किसी भी प्रकार की मशीन का उपयोग नहीं करते हैं बल्कि सदियों से चली आ रही पारंपरिक प्रथा के तहत ही अधिकतर हाथ और पैरों का इस्तेमाल करते हुए मछली पकड़ने का काम करते हैं। इस प्रथा को यहां की स्थानीय भाषा में ‘‘इरल थाझुवुथल’’ कहा जाता है।
यह झींगा और मछली को हाथ से पकड़ने की सदियों पुरानी पारंपरिक प्रथा है। इस तटीय आर्द्रभूमि में मछुआरे मध्य सितंबर से मध्य अक्टूबर के बीच सबसे अधिक मछली पकड़ने का काम होता हैं और इस समयाअवधि में मछुआरों का एक-एक परिवार औसतन एक लाख से तीन तीन लाख रुपए तक की कमाई कर लेता है और इस धनराशि से उनका जीवनयापन बचे हुए साल के अन्य माहों में गुजारा चलाने के लिए काफी होता है।
ध्यान रहे कि तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से चालीस किलोमीटर दूर कोवलम-नेमेली आर्दभूमि क्षेत्र स्थित है और इसके आसपास सोलह मछुआरों के गांव स्थित हैं। यह कोई पारंपरिक बांध या कंक्रीट संरचना नहीं है।
यह वास्तव में एक मिट्टी का बांध (तटबंध दीवार) है जो मौजूदा कोवलम-नेमेली आर्दभूमि क्षेत्र की परिधि के चारों ओर लगभग 30 किमी यानी 8,500 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। मामल्लन जलाशय परियोजना का पहला चरण 4,375 एकड़ क्षेत्र में चल रहा है। शेष आर्द्रभूमि के लिए दूसरे चरण में निर्माण कार्य प्रस्तावित है।
यह आर्दभूमि मछुआरों के मछली पकड़ने का सदियों पुराना क्षेत्र रहा है। प्रभाकरन कहते हैं कि यदि इस इलाके को सरकार ने जलाशय में बदल दिया तो इस पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी तंत्र ही बदल जाएगा और हम मछुआरों की आजीविका भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
भारत मक्कल कषगम के राज्य सचिव जे राजवरम ने बताया कि खारे आर्द्रभूमि बहुत विशिष्ट वातावरण होता है। एक बार जब आप उन्हें मीठे पानी से भर देते हैं और समुद्र से उनका संबंध पूरी तरह से काट देते हैं तो आर्दभूमि की लवणता का संतुलन बिगड़ जाता है और इसमें रहने वाले जीव मर जाते हैं।
ध्यान रहे कि यह आर्द्रभूमि मध्य एशियाई से आने वाले प्रवासी पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। इस संबंध में भारत मक्कल कषगम के सचिव डी महेंद्रन कहते हैं कि इस आर्द्रभूमि में जलाशय के निर्माण से 232 जीवजंतुओं की प्रजातियों के खत्म होने का खतरा बढ़ जाएगा।
उनका कहना है कि इस जलाशय के निर्माण से अकेले हम प्रभावित नहीं हो रहे हैं बल्कि लगभग 45,000 प्रवासी पक्षी और इनमें 16,000 प्रवासी बतख भी प्रभावित होंगे। प्रभाकरन ने बताया कि इस आर्दभूमि के जल स्रोतों पर निर्भर रहे मछुआरों के लिए इस नुकसान का मतलब है आय में कमी और अपरिचित एवं अनिश्चित काम की ओर पलायन।
वह कहते हैं कि अभी वर्तमान में मामल्लन जलाशय परियोजना का काम केवल कुछ ही प्रतिशत हुआ है लेकिन इसका प्रभाव दिखने लगा है। वह बताते हैं कि मछली पकड़ने वाले मछुआरा परिवार की आय अब पहले के मुकाबले आधी रह गई है।
उन्होंने बताया कि जलाशय परियोजना के कारण आर्द्रभूमि तक मछुआरों की पहुंच धीरे-धीरे कम होते जा रही है और इसके कारण कई मछुआरे ने समुद्र की ओर अपना रुख कर लिया है, इससे इस क्षेत्र में मछली पकड़ने का पूरा हिसाब-किताब ही गड़बड़ा गया है।
वह कहते हैं कि पहले लगभग 500 मछुआरे समुद्र में मछली पकड़ते थे और 500 आर्द्रभूमि पर निर्भर थे। अब सभी 1,000 मछुआरे समुद्र में जा रहे हैं, इसका नतीजा यह हो रहा है कि अधिक नावें और अधिक मछुआरे उसी समुद्री मछली को पकड़ने के लिए होड़ कर रहे हैं जिससे प्रत्येक मछुआरे को पहले के मुकाबले कम हिस्सा मिल रहा है।