इंदौर त्रासदी का सबक: पीने के पानी से पहले सीवेज के बारे में सोचा जाए
जब भारत के सबसे स्वच्छ रैंक वाले शहर इंदौर में गंदे पेयजल के कारण लोगों की मौत होती है, तो सदमा और निंदा स्वाभाविक है। लेकिन यह मामला केवल इंदौर का नहीं है, और न ही केवल पानी की आपूर्ति का। यह मामला सीवेज का है, उस मल-मूत्र का, जिसे हम हर दिन फ्लश करके भूल जाते हैं।
समस्या यह है कि हम बिंदुओं को आपस में जोड़कर नहीं देखते। हर शहरी प्रशासन और एक के बाद एक आने वाली सरकारें पानी की आपूर्ति पर तो ध्यान देती हैं, लेकिन इस सच्चाई को नजरअंदाज कर देती हैं कि जितना पानी सप्लाई किया जाता है, उसका लगभग 80 प्रतिशत अपशिष्ट जल (वेस्टवाटर) बनकर लौट आता है।
हमारी मौजूदा व्यवस्था में इस लौटने वाले पानी यानी सीवेज को पकड़ना या उसका उपचार करना इतना महंगा है कि उसे अक्सर तब तक अनदेखा किया जाता है, जब तक वह फिर से हमारे पीने के पानी में मिलकर या हमारी झीलों और नदियों को प्रदूषित करके सामने नहीं आ जाता।
इसलिए जब तक हम अपशिष्ट जल के प्रति गंभीर और जुनूनी नहीं होंगे, स्वच्छ पानी की सुरक्षा एक दूर का सपना ही बनी रहेगी। इंदौर से मिलने वाला सबक यही है।
शहरी क्षेत्रों के लिए भारत के कार्यक्रम इस आवश्यकता को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन पानी और सीवेज की व्यवस्था के डिजाइन में बदलाव लाने के लिए अभी भी पर्याप्त काम नहीं हो रहा है। अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) के तहत पानी की आपूर्ति, सीवेज और ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को पैसा दिया जाता है।
केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार पिछले एक दशक में लगभग 3,500 परियोजनाओं पर 1,93,104 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन इसमें प्राथमिकता स्पष्ट रूप से पानी की आपूर्ति को दी गई है, जिस पर कुल खर्च का 62 प्रतिशत खर्चा गया, जबकि सीवरेज पर केवल 34 प्रतिशत खर्च हुआ।
भूजल रिचार्ज में मदद करने वाले और पानी की उपलब्धता बढ़ाने वाले जलाशयों के पुनर्जीवन पर खर्च बेहद नगण्य रहा है। इस मद में कुल खर्च का महज 3 प्रतिशत ही लगाया गया।
इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। सीवरेज पर अधिक पैसा खर्च करने की बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर को इस तरह से दोबारा डिजाइन करना चाहिए कि वह किफायती बन सके। तभी शहरों के पास इतने संसाधन होंगे कि वे अपशिष्ट जल की हर बूंद को रोक सकें। उसका उपचार कर सकें और दोबारा उपयोग में ला सकें।
आज का जल-आपूर्ति मॉडल पाइपों और पंपों पर निर्भर है, जो दूरदराज से पानी शहरों तक लाते हैं, क्योंकि स्थानीय स्रोत या तो सूख चुके हैं या प्रदूषित हो गए हैं। उदाहरण के लिए इंदौर कभी स्थानीय जलाशयों और झीलों पर निर्भर था। अब वह गर्व से 70 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी से पीने का पानी लाता है।
जबकि हम यह जानते हैं कि पानी की पाइपलाइन जितनी लंबी होती है, उसे बनाना उतना ही महंगा पड़ता है। उनमें रिसाव भी अधिक होता है और पंपिंग के लिए ज्यादा बिजली की खपत होती है। यह सब मिलकर पानी की आपूर्ति की लागत को बढ़ाता है। इतनी ज्यादा कि एक समय पर बुनियादी जल सेवाओं की पूंजीगत और संचालन लागत अमीरों के लिए भी वहन करना मुश्किल हो जाता है और सबको सब्सिडी देने के लिए कभी पर्याप्त पैसा नहीं बचता।
नतीजतन, नर्मदा से जुड़े होने के बावजूद इंदौर में भी घरों को पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर रहना पड़ता है। जब सीवेज को ठीक से रोका और प्रबंधित नहीं किया जाता तो यह स्थिति एक ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को जन्म देती है, जो कभी भी सामने आ सकता है।
आज सीवरेज योजनाएं लगातार और अधिक पाइपों व पंपों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं और वे कभी पूरी ही नहीं हो पातीं। हर मामले में घरों को जोड़ना पड़ता है। नालियों को फिर से डिजाइन करना होता है और सड़कों को बार-बार खोदना पड़ता है।
इसके बाद अपशिष्ट जल को भूमिगत पाइपों के जरिये पंप करके शोधन संयंत्रों तक ले जाया जाता है। वहा उपचार के बाद इसे नालों, नदियों या झीलों में छोड़ दिया जाता है, लेकिन ये पहले से ही गंदे होते हैं, क्योंकि इनमें उन लोगों का बिना उपचारित सीवेज मिला होता है, जो अब तक सीवरेज व्यवस्था से जुड़े नहीं हैं।
इस तरह किया गया सारा प्रयास काफी हद तक “व्यर्थ” हो जाता है, परंतु इसकी लागत कल्पना से परे होती है। अक्सर ये परियोजनाएं देरी और लागत में भारी बढ़ोतरी का शिकार हो जाती हैं। जब तक शहर के एक हिस्से में सीवरेज नेटवर्क पूरा होता है, तब तक शहर का कोई दूसरा हिस्सा फैल चुका होता है और उसे जोड़ने की जरूरत पड़ जाती है।
यही वजह है कि भारत का बड़ा हिस्सा आज भी सीवरेज नेटवर्क से वंचित है और अधिकांश घर ऐसे शौचालयों पर निर्भर हैं, जो ऑन-साइट प्रणालियों या किसी न किसी तरह के सेप्टिक टैंक या टैंक से जुड़े होते हैं। इंदौर में भी ऐसी ही ऑन-साइट शौचालय प्रणालियों से होने वाले रिसाव ने पीने के पानी को दूषित कर दिया।
दरअसल ऑन-साइट प्रणालियां अपने-आप में समस्या नहीं हैं। असल में, यही भविष्य का समाधान हो सकती हैं, लेकिन ये तभी काम करेंगी, जब यह सुनिश्चित किया जाए कि शौचालयों के टैंक नियमित रूप से खाली (डिस्लज) किए जाएं। निकले हुए मल-मूत्र को उपचार (ट्रीटमेंट) के लिए ले जाया जाए और उपचार के बाद मिलने वाला स्वच्छ पानी (अपशिष्ट जल नहीं) व ठोस पदार्थ का उपयोग खाद या ईंधन के रूप में किया जाए।
यदि ऐसा नहीं किया गया, तो जल आपूर्ति हमेशा प्रदूषण के खतरे में रहेगी। इसलिए पानी की आपूर्ति से पहले सीवेज प्रबंधन को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
हमें सीवेज प्रबंधन को किफायती बनाने पर विशेष ध्यान देना है। अमृत के दिशा-निर्देशों को इस तरह नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है कि उनमें घरों से निकलने वाले मल-मूत्र का शत प्रतिशत संग्रह व सीवेज प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
इसे किफायती बनाने के लिए शहरों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे मौजूदा ऑन-साइट सेप्टेज टैंकों के नेटवर्क का उपयोग करें। यह सुनिश्चित किया जाए कि भूमिगत पाइपों के बजाय टैंकरों के जरिये सेप्टेज को उपचार संयंत्रों तक पहुंचाया जाए। यह तरीका तेज है, सस्ता है और अधिक समावेशी भी है।
दूसरा काम यह करना चाहिए कि पुनः उपयोग (रीयूज) को बढ़ावा देने को अनिवार्य किया जाए। शहरों को इस आधार पर भुगतान किया जाए कि वे उपचारित पानी को दोबारा उपयोग में भेजते हैं और कीचड़ (स्लज) का उपयोग जैव-संवर्धन या ईंधन के रूप में करते हैं।
इस तरह परियोजनाओं का डिजाइन केवल सीवेज रोकने या अलग-थलग शोधन संयंत्र बनाने के लिए नहीं, बल्कि अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग के उद्देश्य से किया जाएगा। शहरों को पैसा इस आधार पर मिलना चाहिए कि वे कितना गंदा पानी और कीचड़ साफ करके दोबारा इस्तेमाल करते हैं।
तीसरा, जल परियोजनाओं को स्थानीय जल स्रोतों से जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें तालाबों, झीलों और अन्य जलाशयों का पुनर्जीवन भी शामिल हो। इससे दूरदराज से पानी लाने की लागत कम होगी, भूजल अधिक टिकाऊ बनेगा और पानी की आपूर्ति भी सस्ती होगी।
लेकिन यह तभी संभव है, जब सीवेज प्रबंधन के बारे में पहले सोचा जाए। जब तक जलाशय प्रदूषित होते रहेंगे, तब तक शहर साफ पानी की तलाश में और भी दूर के स्रोतों की ओर जाते रहेंगे। इसी तरह साफ पानी से जानलेवा पानी बनने का यह दुष्चक्र चलता रहेगा।
इंदौर की त्रासदी से यही सीख मिलती है।


