

कंपनियां अक्सर पानी के रीसाइक्लिंग और दोबारा इस्तेमाल को सबसे टिकाऊ समाधान के रूप में प्रस्तुत करती हैं, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है। दोबारा प्राप्त या उपचारित पानी, यदि सही ढंग से प्रबंधित न किया जाए तो कूलिंग उपकरण में जंग, परत जमने और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि का कारण बन सकता है।
बंगलुरु के वेल लैब्स, अर्बन वाटर प्रोग्राम के प्रबंधक और जल विज्ञानी शशांक पालुर डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “रीसाइक्लिंग मदद करती है, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में पानी की गुणवत्ता मानकों को बेहतर करना होगा ताकि सही रासायनिक मापदंड पूरे हों।”
नोएडा और बंग्लुरु में डाटा केंद्र संचालित करने वाली योट्टा डाटा सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड इससे सहमत है। कंपनी का कहना है कि अधिकांश नगरपालिका रीसाइकल पानी संयंत्र निर्माण या सिंचाई के लिए बनाए गए हैं, न कि उच्च शुद्धता वाले औद्योगिक कूलिंग के लिए, जिसके लिए अत्यधिक फिल्ट्रेशन और रासायनिक स्थिरता जरूरी होती है।
जहां समान गुणवत्ता वाला उपचारित पानी उपलब्ध होता है, वहां उसका उपयोग किया जाता है। जहां यह संभव नहीं है, वहां एयर कूल्ड या हाइब्रिड कूलिंग अपनाई जाती है ताकि वाष्पीकरण आधारित प्रणालियों पर निर्भरता कम की जा सके। कंपनी के अनुसार समस्या उद्योग की अनिच्छा नहीं, बल्कि सप्लाई चेन की तैयारी है।
एयरटेल की सहायक कंपनी नक्षत्र का कहना है कि उसने 2025 में उपयोग किए गए 216,357 किलोलीटर पानी में से 15,329 किलोलीटर पानी को उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम के जरिये रीसाइकल किया और अपने हाइपरस्केल डाटा केंद्रों में 100 प्रतिशत रीसाइक्लिंग का लक्ष्य रखा है ताकि “वाटर न्यूट्रल” बना जा सके। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह रीसाइकल पानी कूलिंग के लिए उपयोग हुआ या नहीं। अदाणी कनेक्ट उपचारित पानी और वर्षा जल संचयन के उपयोग का उल्लेख करता है, लेकिन विस्तृत जानकारी नहीं देता।
हाल के वर्षों में कंपनियों ने “वाटर ऑफसेटिंग” की अवधारणा को भी बढ़ावा दिया है, जिसका अर्थ है एक स्थान पर पानी के उपयोग की भरपाई किसी अन्य स्थान पर जल पुनर्भरण या बहाली से करना। माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन इसके प्रमुख समर्थक हैं और क्रमशः 2030 और 2027 तक वाटर पॉजिटिव बनने का वादा करते हैं।
उदाहरण के तौर पर अमेजन ने बंग्लुरु के पास यमरे झील और हैदराबाद के पास साई रेड्डी झील की बहाली परियोजनाओं में निवेश किया है। इन परियोजनाओं में गाद हटाना, बांधों का पुनर्निर्माण और जल संरचनाओं की मरम्मत शामिल है। इनसे हर साल 570 मिलियन लीटर से अधिक पानी की पुनःपूर्ति होने की उम्मीद है।
हालांकि, ऑफसेटिंग से जुड़ी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस की सस्टेनेबल फाइनेंस सलाहकार लबन्या प्रकाश जेना कहती हैं कि ऐसे प्रयास उन स्थानीय क्षेत्रों में हो रहे जल ह्रास को नहीं सुलझाते जहां डाटा सेंटर स्थित हैं। वह कहती हैं, “अगर बंग्लुरु के व्हाइटफील्ड में कोई डाटा सेंटर पानी का नुकसान करता है तो उसकी भरपाई कहीं और झील बहाल करके कभी नहीं की जा सकती। यह अप्रभावी है।