जलाशयों की घटती सांस और भविष्य की बढ़ती प्यास

जलाशयों की घटती सांस और भविष्य की बढ़ती प्यास

पुराने जलाशयों में घटती वास्तविक भंडारण क्षमता, कमजोर जलग्रहण प्रबंधन और पानी-गहन खेती के कारण रबी, पेयजल और सिंचाई पर मंडराता खतरा, समाधान धरती की पकड़ मजबूत करने में निहित
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मानसून के विदा होने का समय है लेकिन देश के सामने पानी का सवाल अभी विदा नहीं हुआ है। उलटे, इस बार मानसून ने भारत को पानी की एक ऐसी पहेली थमा दी है, जिसका उत्तर केवल वर्षा के आंकड़ों में नहीं मिलता।

कहीं बादल खूब बरसे तो बाढ़ आई, कहीं बारिश के बीच लंबे अंतराल ने खेतों और जलाशयों को प्यासा रखा, कहीं नदी का प्रवाह कमजोर पड़ा तो कहीं जलाशय अपेक्षित रूप से नहीं भर पाए। यानी संकट केवल कितनी बारिश हुई का नहीं बल्कि बारिश कब, कितनी तीव्रता से हुई और उसमें से कितना पानी हमने सहेजा, उसका है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 19 सितंबर 2026 से दक्षिण-पश्चिम मानसून ने पश्चिमी राजस्थान से वापसी शुरू कर दी। 19 सितंबर तक देश में मौसमी वर्षा सामान्य से लगभग 15 प्रतिशत कम थी और पूर्वी-पूर्वोत्तर तथा दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत जैसे क्षेत्रों में कमी और अधिक थी। ऐसे समय में जलाशयों की स्थिति आने वाले रबी मौसम, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और जलविद्युत के लिए विशेष महत्व रखती है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या भारत की जल-सुरक्षा अब भी मानसून की कृपा पर निर्भर रह सकती है?

भारत के पास जल संग्रहण का विशाल ढ़ांचा है लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता धीरे-धीरे क्षीण हो रही है। केंद्रीय जल आयोग के 2024 के ‘भारत में जलाशयों में गाद जमाव संबंधी संकलन’ ने 548 जलाशयों के आंकड़ों का अध्ययन किया, जिनमें 439 जलाशयों के आंकड़े विश्लेषण के लिए उपयोगी पाए गए।

इनमें गाद जमने के कारण सकल भंडारण क्षमता में औसतन 19.24 प्रतिशत की कमी पाई गई। औसत वार्षिक क्षमता-हानि लगभग 0.74 प्रतिशत आंकी गई। यह आंकड़ा महज तकनीकी रिपोर्ट का विषय नहीं है बल्कि इसका सीधा अर्थ है कि जिस जलाशय को हमने दशकों पहले जिस क्षमता से बनाया था, वह आज उतना पानी रखने की स्थिति में नहीं है।

आसमान से पानी उतना ही आए लेकिन जलाशय की पेटी में गाद भरती जाए तो हर मानसून के साथ हमारी वास्तविक जल-सुरक्षा थोड़ी और सिकुड़ती जाएगी। यही भारत की जल-व्यवस्था की सबसे अनदेखी विडंबनाओं में से एक है।

हम नए बांध और नए जलाशय बनाने की बात तो करते हैं लेकिन पुराने जलाशयों में बची क्षमता कितनी है, यह प्रश्न उतनी गंभीरता से नहीं पूछा जाता। गाद किसी एक दिन में पैदा नहीं होती।

पहाड़ियों और जलग्रहण क्षेत्रों से मिट्टी का कटाव, वनों का क्षरण, अवैज्ञानिक भूमि उपयोग, निर्माण गतिविधियां और खराब जलग्रहण प्रबंधन धीरे-धीरे जलाशयों को भरते जाते हैं। इसलिए जलाशय की सफाई केवल बांध के भीतर गाद निकालने का मामला नहीं है, असल उपचार उस भू-दृश्य में है, जहां से मिट्टी बहकर जलाशय तक पहुंचती है।

मानसून के दौरान यह संकट और स्पष्ट हो जाता है। भारी बारिश के कुछ घंटों में नदियां उफन सकती हैं, शहरों में जलभराव हो सकता है और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन हो सकता है लेकिन वही पानी कुछ सप्ताह या महीनों बाद उपलब्ध नहीं रहता।

इसका कारण वर्षा की बदलती प्रकृति भी है। लंबे समय तक हल्की बारिश मिट्टी में धीरे-धीरे पानी उतारती है और भूजल पुनर्भरण में मदद करती है जबकि अत्यधिक तीव्र वर्षा का बड़ा हिस्सा सतही बहाव बनकर निकल सकता है। इसलिए वर्षा की सालाना कुल मात्रा अच्छी होने भर से जल-सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती।

मेघालय का अनुभव इस बदलती तस्वीर का प्रतीक है। चेरापूंजी और मौसिनराम को दुनिया के अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गिना जाता है, फिर भी वहां वर्षा के वितरण और बारिश वाले दिनों में बदलाव जल-प्रबंधन के लिए नई चुनौती पैदा कर रहा है। पहाड़ी ढ़लानों, पतली मिट्टी और तीव्र बहाव वाले क्षेत्रों में आसमान से गिरने वाला पानी यदि धरती में ठहर नहीं पाता तो अत्यधिक वर्षा भी दीर्घकालीन जल-सुरक्षा की गारंटी नहीं बनती।

यही वह अंतर है, जिसे भारत की जल नीति को अब समझना होगा कि वर्षा और जल-संपदा एक ही चीज नहीं हैं। 2026 के मानसून ने इस अंतर को और स्पष्ट किया है। अगस्त में कुछ सुधार के बावजूद 166 प्रमुख जलाशयों में संग्रहण पिछले वर्ष की तुलना में काफी नीचे रहा।

13 अगस्त को इन जलाशयों में 109.11 अरब घन मीटर लाइव स्टोरेज था, जो उनकी संयुक्त क्षमता का लगभग 59.4 प्रतिशत था और पिछले वर्ष के समान समय के 135.64 अरब घन मीटर से करीब 19.6 प्रतिशत कम था। यह ध्यान देने योग्य है कि ये 166 जलाशय देश की अनुमानित कुल लाइव-स्टोरेज क्षमता का लगभग 71 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करते हैं।

दक्षिण भारत की स्थिति इस चिंता को और गंभीर बनाती है। वर्षा की कमी का असर केवल आज के पेयजल पर नहीं पड़ता, इसका असर रबी की बुवाई और सिंचाई पर भी दिखाई देता है। धान, गन्ना जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों वाले क्षेत्रों में जलाशयों का कमजोर भंडार अगले कृषि चक्र को सीधे प्रभावित कर सकता है।

आंध्र प्रदेश के पुत्तलुरू में चित्रावती नदी के सूखने और गणेश विसर्जन के लिए सूखी नदी की रेत का इस्तेमाल करने की सामने आई तस्वीरें इसी बदलती जल-हकीकत का मार्मिक प्रतीक हैं। हालांकि किसी एक स्थानीय घटना को पूरे देश की स्थिति का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा लेकिन यह दृश्य उस संकट की ओर ध्यान जरूर खींचता है, जिसमें मौसमी नदियों और स्थानीय जलस्रोतों का प्रवाह वर्षा की अनिश्चितता, भूजल पर बढ़ते दबाव और कमजोर स्थानीय जल-संचयन से प्रभावित होता है।

इस संकट का दूसरा चेहरा भूजल है। जब जलाशय पर्याप्त नहीं भरते तो किसान सिंचाई के लिए भूजल की ओर जाते हैं। जब नगरों के जलाशय सूखते हैं तो ट्यूबवेलों पर निर्भरता बढ़ती है यानी सतही जल की कमी का भार भूमिगत जल पर स्थानांतरित हो जाता है।

यदि उसी समय बारिश का पानी तेजी से बहकर निकल जाए और भूजल पुनर्भरण कम हो तो कुछ वर्षों में यह व्यवस्था स्वयं अपनी सीमा से टकराने लगती है। यहां जलाशयों की उम्र भी महत्वपूर्ण है। जल-संरचना केवल कंक्रीट की दीवार नहीं है, उसकी उपयोगिता जलग्रहण क्षेत्र, गाद, डिजाइन क्षमता, रखरखाव और संचालन व्यवस्था से मिलकर बनती है। इसलिए पुराने बांधों की नियमित सुरक्षा जांच के साथ-साथ उनकी वास्तविक वर्तमान भंडारण क्षमता का पुनर्मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है।

किसी जलाशय की कागजी क्षमता और उसकी वास्तविक उपयोगी क्षमता में अंतर बढ़ता जाए तो नीति-निर्माण गलत आधार पर खड़ा रहेगा, इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जल-प्रबंधन की सोच में होना चाहिए। वर्षा जल संचयन को भवनों की औपचारिक शर्त से आगे ले जाकर स्थानीय जलग्रहण योजना से जोड़ना होगा।

शहरों के तालाब, झीलें, आर्द्रभूमियां और नालों के प्राकृतिक प्रवाह को पुनर्जीवित करना होगा। गांवों में खेत-तालाब, चेक डैम, परकोलेशन टैंक और छोटे जल-संग्रहण ढांचे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने होंगे। पहाड़ी क्षेत्रों में वनीकरण और ढ़लान संरक्षण को जल-सुरक्षा का हिस्सा मानना होगा। कृषि में भी पानी के हिसाब से फसल का चुनाव आवश्यक है। जहां पानी सीमित है, वहां अधिक जल-खपत वाली फसलों का लगातार विस्तार अंततः किसान को ही जोखिम में डालता है।

सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, मिट्टी में नमी संरक्षण और स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल-योजना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बनते जा रहे हैं। आज आवश्यकता किसी एक और बड़े बांध की घोषणा से अधिक मौजूदा जल-संपदा की उम्र बढ़ाने की है। हर जलाशय का डिजिटल क्षमता-मानचित्र बने, नियमित हाइड्रोग्राफिक सर्वे हो, गाद की निगरानी हो, जलग्रहण क्षेत्र का स्वास्थ्य दर्ज किया जाए और जलाशय की वास्तविक क्षमता के आधार पर सिंचाई तथा पेयजल की योजना तैयार हो।

जलाशयों को केवल मानसून में भरने और गर्मियों में खाली होने वाली संरचनाओं की तरह नहीं, पूरे वर्ष संचालित होने वाली जल-सुरक्षा प्रणालियों के रूप में देखना होगा क्योंकि भारत की जल-कहानी का अगला अध्याय बादलों से नहीं, धरती की पकड़ से लिखा जाएगा।

चेरापूंजी के झरनों से लेकर दक्षिण के सूखते जलाशयों और मैदानों के गिरते भूजल तक एक ही संदेश सुनाई दे रहा है कि पानी की कमी हमेशा बारिश की कमी से पैदा नहीं होती, कई बार पानी हमारे सामने होता है लेकिन उसे रोकने, जमीन में उतारने और सही समय तक बचाए रखने की क्षमता कम पड़ जाती है।

बादल बरसेंगे या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं लेकिन जो पानी बरसेगा, उसमें से कितना बह जाने देंगे और कितना भविष्य के लिए बचाएंगे, यह निर्णय हमारे हाथ में अवश्य है। इसलिए अब सवाल मानसून के भरोसे रहने का नहीं, मानसून के पानी को भरोसेमंद बनाने का है।

लेख में व्यक्त लेखक के निजी विचार हैं

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