जल स्रोतों का पुनर्जीवन: सामुदायिक सहभागिता और सतत प्रबंधन की आवश्यकता
पानी इंसानी जीवन के लिए बुनियादी जरूरत है, हमने लंबे समय से इस बहुमूल्य संसाधन का अत्यधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप पानी के पारिस्थितिकी तंत्र जंगलों की तुलना में तीन गुना तेजी से लुप्त हो रहे हैं।
भारत, जहाँ दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, के पास वैश्विक पानी के संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। यह असंतुलन पानी के कुशल प्रबंधन, संरक्षण और न्यायसंगत वितरण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
मध्य प्रदेश में प्रमुख नदियों नर्मदा , ताप्ती , माही , गोदावरी (वैनगंगा) का उद्गम के साथ में बेतवा , केन, तवा नदियों के साथ अन्य बहुत नदियां , सैंकड़ों झीलें झरने और तालाब है। इन सबके बाबजूद, मध्य प्रदेश उन राज्यों में से एक है, जो गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। राज्य मुख्य रूप से कृषि प्रधान है, जहाँ कृषि आबादी के एक बड़े हिस्से की आजीविका का मुख्य स्रोत है।
हालांकि, राज्य मे पानी की कमी, गिरते भूजल स्तर और अव्यवस्थित जल प्रबंधन प्रथाओं से जूझ रहा है। नीति आयोग द्वारा जून 2018 में प्रकाशित "समग्र जल प्रबंधन सूचकांक" नामक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत अपने इतिहास के सबसे भीषण जल संकट से गुजर रहा है और लगभग 6 करोड़ लोग अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है, जहां लगभग 70% जल दूषित है। नीति आयोग की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में इंदौर , रतलाम के सहित भारत के 21 प्रमुख शहरों में 2030 तक भूजल समाप्त हो जाने की आशंका है ।
यह देश के लिए चिंताजनक स्थिति है, जहां अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली कृषि, सिंचाई के लिए भूजल पर बहुत अधिक निर्भर है। इससे 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि भारत की 40 प्रतिशत आबादी को पीने के पानी तक पहुंच नहीं होगी, जो वास्तव में एक भयावह समस्या होगी।
मध्य प्रदेश में जल संकट में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों में से एक कृषि उद्देश्यों के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन है। किसान सिंचाई के लिए भूजल पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जिससे भूजल स्तर में कमी आ रही है और कुएं सूख रहे हैं। इसके अतिरिक्त, शहरीकरण एवं पारंपरिक जल संसाधनो की अनदेखी, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है।
जल-संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए एक पूर्णतावादी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो जल प्रबंधन के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को ध्यान में रखे। जल संरक्षण करना हमारी सदियों पुरानी परंपरा रही है । इसी बात को तथ्य और कहानी के रुप में सुंदर बयां करती है , अनुपम मिश्र जी की किताब “आज भी खरे हैं तालाब”, जरूर पढ़िएगा।
वो लिखते है: महाभारत काल के तालाबों में कुरुक्षेत्र का ब्रह्मासर, करनाल की कर्णझील और मेरठ के पास हस्तिानपुर में शुक्रताल आज भी हैं और पर्वों पर यहाँ लाखों लोग इकट्ठे होते हैं।रामायण काल के तालाबों में श्रृंगवेरपुर का तालाब प्रसिद्ध रहा है।
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के निदेशक श्री बी.बी. लाल ने पुराने साक्ष्य के आधार पर इलाहाबाद से 60 किलोमीटर दूर खुदाई कर इस तालाब को ढूँढ़ निकाला है। श्री लाल के अनुसार यह तालाब ईसा पूर्व सातवीं सदी में बना था- यानी आज से 2700 बरस पहले।
श्रृंगवेरपुर के तालाब का संक्षिप्त विवरण गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित पुस्तक 'हमारा पर्यावरण' (1988) में तथा विस्तृत विवरण नई दिल्ली के 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा देश में जल संग्रह के परंपरागत तरीकों पर अक्तूबर 1990 में आयोजित गोष्ठी में श्रीलाल द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तुत लेख में उपलब्ध है।
समाज के द्वारा जल संरक्षण के उत्कृष्ठ प्रयास और उपेक्षा से सभी परिचितहै।देश के जल संसाधनों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, जल शक्ति मंत्रालय ने पहली बार 'जल निकायों की गणना' कराई।
इस गणना के नतीजों से पूरे देश में जल निकायों की स्थिति और उनके वितरण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। गणना के अनुसार, कुल 24,24,540 जल निकायों में से तालाबों की संख्या सबसे ज़्यादा 59.5 प्रतिशत (14,42,993) है; इसके बाद टैंक 15.7 प्रतिशत (3,81,805), जलाशय 12.1 प्रतिशत (2,92,280), जल संरक्षण संरचनाएँ (जैसे परकोलेशन टैंक और चेक डैम) 9.3 प्रतिशत (2,26,217), झीलें 0.9 प्रतिशत (22,361) और अन्य 2.5 प्रतिशत (58,884) हैं। 80के दशक से सरकारी तंत्र में जल संरक्षण के ऊपर ज्यादा ध्यान दिया गया, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की तहत इस काम को और मजबूती मिली।
अमृत सरोवर एक और अच्छा मुहिम था इस कड़ी को आगे बढ़ाने में। आज के समय में भूतल जल की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है। राष्ट्रीय जल नीति, 1987, संशोधन नियम 2002 एबं 2012 में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन, संरक्षण और पानी के समान वितरण की आवश्यकता, वैज्ञानिक आधार पर भूजल संसाधनों का मूल्यांकन पर जोर दिया गया है।
मध्य प्रदेश की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। राज्य में दर्ज 82,643 जल निकायों में से, वर्तमान में केवल 37,257 ही उपयोग में हैं, जबकि 45,386 जल निकाय अप्रयुक्त पड़े हैं।
इसका मतलब है कि विभिन्न कारणों से लगभग 54.91 प्रतिशत जल निकाय बेकार पड़े हैं, जो जल संसाधन प्रबंधन में एक गंभीर कमी का संकेत है। पीने के लिए सुरक्षित पानी और स्वच्छता को एक महत्वपूर्ण सूचक के रूप में माना जाना चाहिए और इसके बाद अन्य के लिए प्राथमिकता के साथ आवंटन किया जाना चाहिए।
घरेलू जरूरतें (जानवरों की ज़रूरतों सहित), खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए कृषि एबं अन्य जीविका एबं उद्योग का समर्थन करना की जरूरतें। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड 2023 के रिपोर्ट के आधार पर आज भूतल जल का 87% सिंचाई, 11% घेरलू उपयोग और 2 प्रतिशत उद्योग में उपयोग किया जाता है।
जल संसाधन की सहभागी सुप्रशासन और मांग-आपूर्ति प्रबंधन सुनिश्चित करने के महत्वपूर्ण भूमिका है। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (सी जी डबल्यू बी ) भूतल जल के रिपोर्ट 2023 में यह कहा की मध्य प्रदेश में 317 ब्लॉक के भूतल जल असेसमेंट में से 60 ब्लॉक सेमी क्रिटिकल, 5 ब्लॉक क्रिटिकल और 26 ब्लॉक में ओवर एक्सप्लोटाइटेड है।
इस चुनौती से निपटने के लिए सामुदायिक नेतृत्व वाली देखरेख की ओर बदलाव की आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों को जल निकायों की योजना बनाने, उनके जीर्णोद्धार और प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह के सहभागी दृष्टिकोण न केवल स्थिरता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि अपनेपन और जवाबदेही की भावना को भी बढ़ावा देते हैं।
जल प्रशासन में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महिलाएँ, जो अक्सर घरेलू स्तर पर पानी की प्राथमिक उपयोगकर्ता और प्रबंधक होती हैं, उन्हें जल संसाधन योजना और प्रबंधन से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए। कृषि, जो भूजल संसाधनों का लगभग 87 प्रतिशत उपभोग करती है, इस चर्चा में एक केंद्रीय भूमिका निभाती है।
मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ कृषि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में लगभग 43-47 प्रतिशत का योगदान देती है,जो अधिक भूजल उपयोग की मांग को उत्पन्न करती है। जिन ब्लॉक को सेमी क्रिटिकल से ओवर एक्सप्लोटाइटेड गंभीर भूजल क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है, वहां अलग तरह की योजना बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
फसल के लिए जल बजट को बढ़ावा देना और कम पानी की ज़रूरत वाली फसलों की खेती सहित फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना इस बोझ को कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, ऐसी फसलों के लिए विशेष न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ- साथ किसानों की आय को सुरक्षित रखने के लिए प्रोत्साहन राशि जैसी सुविधाओं को भी शुरू किया जाना चाहिए।
जल निकाय न केवल मानव उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे वन्यजीवों और जलीय जैव विविधता को सहारा देने वाले महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में भी काम करते हैं। इसलिए, जीर्णोद्धार के प्रयासों में स्थानीय जलीय प्रजातियों और पारिस्थितिक संतुलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसके अलावा, संरक्षण रणनीतियों का विस्तार केवल जल निकायों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें नदियों और धाराओं के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों का जीर्णोद्धार भी शामिल होना चाहिए। इन स्रोत क्षेत्रों की सुरक्षा, निचले जल प्रणालियों के स्वास्थ्य और दीर्घायु को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक, भू-दृश्य-आधारित योजना के साथ मिलाना आगे बढ़ने का एक आशाजनक मार्ग प्रदान करता है। भारत की जल संरक्षण प्रथाओं की समृद्ध विरासत, जब आधुनिक दृष्टिकोणों के साथ जोड़ी जाती है, तो यह लचीली और टिकाऊ जल प्रणालियों के निर्माण में मदद कर सकती है।
चुनौती बहुत बड़ी है, लेकिन अवसर भी उतना ही बड़ा है। जल निकायों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित करना और उनका प्रबंधन करना, आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, आजीविका को सहारा दे सकता है और पारिस्थितिक संतुलन को बहाल कर सकता है।
अब कार्रवाई करने का समय आ गया है। यह रिपोर्ट हमें सतर्क और दीर्घ कालीन प्रंबधन , साथ में जल को सामुहिक संसाधन के रूप में देखने की ओर इशारा कर रही है। मध्य प्रदेश में जल संकट को दूर करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप, तकनीकी समाधान और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।

