पंजाब में भूजल संकट : सालाना उपलब्धता से 52 फीसदी अधिक भूजल की निकासी, नहरों में तलाशा जा रहा समाधान

रिपोर्ट के मुताबिक नहरों के पानी की पहुंच बढ़ने से कुछ इलाकों में भूजल दोहन घटा, लेकिन अब भी 153 में से 110 ब्लॉक ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में मौजूद हैं
आईआईटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि भारत में भूजल की कमी तब तक जारी रहेगी, जब तक जमीन से निकाले जाने वाले अत्यधिक पानी को सीमित नहीं किया जाता
आईआईटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि भारत में भूजल की कमी तब तक जारी रहेगी, जब तक जमीन से निकाले जाने वाले अत्यधिक पानी को सीमित नहीं किया जाताफोटो साभार : आईसटॉक
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पंजाब में भूजल संकट की तस्वीर में मामूली सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन राज्य की भूजल स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। पंजाब की एक 10 सदस्यीय समिति के जरिए तैयार की गई ताजा रिपोर्ट "डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्स असेसमेंट" के अनुसार पंजाब में अत्यधिक दोहन वाले यानी ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ भूजल ब्लॉकों की संख्या पिछले दो वर्षों में 115 से घटकर 110 हो गई है। इसके बावजूद राज्य के कुल 153 आकलन ब्लॉकों में करीब 72 फीसदी ब्लॉक अभी भी इस गंभीर श्रेणी में हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ताजा आकलन जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव कृष्ण कुमार की अध्यक्षता वाली 10 सदस्यीय समिति ने तैयार किया है।

ताजा आकलन के मुताबिक पंजाब में हर साल करीब 19.14 अरब घन मीटर (बीसीएम) भूजल का पुनर्भरण होता है। इसमें से 17.29 बीसीएम को सालाना निकासी के लिए उपलब्ध संसाधन माना गया है लेकिन 2025-26 में राज्य में 26.32 बीसीएम भूजल निकाला गया। यानी जितना भूजल सालाना निकासी के लिए उपलब्ध माना गया है, पंजाब उससे करीब 52 फीसदी ज्यादा पानी निकाल रहा है। वहीं, राज्य में भूजल दोहन का कुल स्तर 152.22 फीसदी रहा।

भूजल की इस भारी निकासी में कृषि की भूमिका सबसे बड़ी है। अकेले सिंचाई के लिए 24.95 बीसीएम  भूजल निकाला गया। इससे साफ है कि पंजाब का भूजल संकट मुख्य रूप से कृषि सिंचाई व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इस  नवीनतम आकलन में पंजाब के 153 भूजल आकलन ब्लॉकों को चार श्रेणियों में बांटा गया है। इसके मुताबिक, पंजाब के  110 ब्लॉक को ओवर-एक्सप्लॉइटेड, 6 ब्लॉक को क्रिटिकल व 17 ब्लॉक को सेमी-क्रिटिकल और  20 ब्लॉक को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया है। 

इस तरह राज्य के केवल 20 ब्लॉक ही सुरक्षित श्रेणी में हैं। वहीं 116 ब्लॉक या तो ओवर-एक्सप्लॉइटेड या क्रिटिकल श्रेणी में हैं। हालांकि, आकलन में एक सकारात्मक बदलाव भी सामने आया है। 95 आकलन ब्लॉकों में भूजल दोहन की रफ्तार पहले की तुलना में धीमी हुई है।मीडिया रिपोर्ट्स में इस ताजा आकलन रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि  भूजल संकट से निपटने के लिए पंजाब में नहर आधारित सिंचाई को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। नए आकलन में नहरों और सतही जल से होने वाले रिचार्ज को भूजल संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

नहर का पानी किसानों को उपलब्ध होने पर सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर निर्भरता कम हो सकती है। यही वजह है कि जिन इलाकों में नहरों का पानी पहले की तुलना में बेहतर पहुंचा है, वहां भूजल दोहन में कमी के संकेत मिले हैं। वहीं, पंजाब सरकार ने भी 2026 में नहर आधारित सिंचाई का विस्तार करने और टेल-एंड क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने पर जोर दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अप्रैल 2026 के अपने एक बयान में  भी कहा था कि नहर के पानी पर निर्भरता बढ़ाने का उद्देश्य ट्यूबवेल पर दबाव कम करना है।

भूजल दोहन में कमी के कारण पांच ब्लॉक ऐसे हैं जो पहले ओवर-एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में थे और अब क्रिटिकल श्रेणी में आ गए हैं। यह बदलाव बताता है कि सिंचाई के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने से भूजल पर दबाव कुछ हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, किसी ब्लॉक का ओवर-एक्सप्लॉइटेड से क्रिटिकल श्रेणी में आना यह नहीं बताता कि वहां भूजल संकट खत्म हो गया है। क्रिटिकल श्रेणी भी गंभीर स्थिति को दर्शाती है।

भूजल दोहन में कमी और ओवर-एक्सप्लॉइटेड ब्लॉकों की संख्या में गिरावट निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन 152.22 फीसदी का भूजल दोहन स्तर यह बताता है कि पंजाब अभी भी प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में बहुत ज्यादा पानी जमीन से निकाल रहा है। एक्सपर्ट मान रहे हैं कि सबसे बड़ी चुनौती कृषि सिंचाई में भूजल की निर्भरता है। 2025-26 में कुल 26.32 बीसीएम भूजल दोहन में से 24.95 बीसीएम सिंचाई में इस्तेमाल हुआ। इसलिए केवल नहर नेटवर्क का विस्तार भूजल संकट का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

पंजाब को भूजल पर दबाव घटाने के लिए नहरों की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ फसल विविधीकरण, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा, सिंचाई दक्षता में सुधार और भूजल निकासी को नियंत्रित करने की दिशा में भी काम करना होगा।

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