सूख रही हैं उत्तर बिहार की जल धाराएं

कभी उत्तर बिहार में 200 से अधिक जल धाराएं प्रवेश करती थी, लेकिन अब ज्यादातर सूख चुकी हैं।
Photo: Pushya Mitra
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उत्तर बिहार में जल धाराएं भी सूख रही हैं। यह भी जल संकट का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। इन दिनों उत्तर बिहार की जल संपदा पर अध्ययन कर रहे बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग में सचिव रह चुके गजानन मिश्र बताते हैं कि एक वक्त मैंने गूगल मैप पर गिना था तो मुझे 206 धाराएं नेपाल से उत्तर बिहार में प्रवेश करती दिखीं। ये धाराएं और छोटी नदियां असल में गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा जैसी बड़ी नदियों की सहायक नदियां हैं और कुछ दूर तक बहने के बाद ये इन नदियों में मिल जाती हैं और फिर कई दफा इनसे फूट कर अलग भी हो जाती हैं। मगर आज की तारीख में इनमें से बहुत कम धाराएं जीवित होंगी। वह इसका दोष तटबंधों को देते हैं, जिन्होंने बड़ी नदियों के छोटी नदियों से मिलने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

इस वजह से जो छोटी धाराएं थीं, वे निष्प्राण होने लगीं। फिर लोगों ने जमीन की लालच में इनमें मिट्टी भरकर मकान बनवा लिए और कई जगह खेती होने लगी।

गजानन मिश्र कहते हैं, कुछ ऐसा ही सुलूक चौरों के साथ भी हुआ। चौर उत्तर बिहार की एक खास किस्म की जल संरचना हुआ करती थी। नदियों से लगे ये उथले झील होते थे। बाढ़ के वक्त जब नदियों में पानी अधिक होने लगता तो चौर में पानी जमा हो जाता और गर्मियों में चौर अपना पानी नदियों को वापस कर देते थे। मगर लोगों को लगा कि ये चौर फालतू हैं। 80 के दशक में सरकार ने इन चौरों को सुखाकर खेत में बदलने की योजना शुरू की, ताकि उस जमीन पर खेती कराई जा सके। पंप लगाकर चौरों को सुखाया गया, यह सोचे बगैर कि यह योजना ईको सिस्टम को नष्ट कर देगी। बाद में लोगों ने भी चौरों को नदियों से काट दिया, ताकि वे खुद-बखुद सूख जाए।

उत्तर बिहार की दो बड़ी झीलों काबर और कुशेश्वर स्थान के साथ भी वही हुआ। दोनों पक्षी विहार हैं और रिजर्व क्षेत्र हैं। इसके बावजूद खेती की जमीन के लालच में लोगों ने दोनों झीलों की जमीन को सुखाना शुरू कर दिया। नदियों से इनका कनेक्शन खत्म कर दिया। बेगूसराय जिले के मंझौल में गठित काबर टाल किसान संघर्ष समिति के संयोजक मनोज भारती कहते हैं, वर्तमान में झील का पानी अधिकतम पांच हजार एकड़ में ही फैलता है, इसलिए शेष जमीन को खरीदने-बेचने का अधिकार किसानों को दिया जाए। इस मामले को लेकर पटना हाई कोर्ट में एक भूस्वामी जय प्रकाश गुप्ता जो मुंगेर जिले के रहने वाले हैं, ने 2013 में मुकदमा कर रखा है। वैसे इस साल खेती लगभग पूरे झील में हो रही है, क्योंकि इस साल पूरी झील में एक बूंद पानी नहीं है। इसके बावजूद किसान इसलिए परेशान हैं कि 2013 में जिला प्रशासन ने काबर झील के पूरे 15 हजार एकड़ के इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर यहां जमीन की खरीद बिक्री पर रोक लगा दी है।

मंझौल स्थित काबर नेचर क्लब के संयोजक महेश कुमार भारती कहते हैं,“हमलोग पक्षी विहार और झील के समर्थक हैं। मगर दिक्कत यह है कि सरकार इस झील और पक्षी विहार का विकास नहीं कर रही, उसने इसे सिर्फ संरक्षित क्षेत्र घोषित करके छोड़ दिया है।”

इधर बिहार सरकार का वन विभाग भी किसानों से सहमत दिखता है। बेगूसराय के डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर संजय सिन्हा कहते हैं, “विभाग ने केंद्रीय वन विभाग के पास प्रस्ताव भेजा है कि काबर झील के संरक्षित 6311 हेक्टेयर(15,594 एकड़) जमीन का रकबा घटा कर 3050 हेक्टेयर ही रखा जाए, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में भौगोलिक कारणों से झील का क्षेत्र सिकुड़ रहा है।”

इस तरह झीलों, नदियों और चौरों को सुखाकर खेती करने का जुनून इस जल संपन्न इलाके को ड्राई जोन में बदल रहा है। इससे किसानों को तो लाभ हो रहा है, मगर उत्तर बिहार के लाखों मछुआरोंकी आजीविका नष्ट हो रही है। मार्च महीने में जब काबर झील सूखने की कगार पर था तो वहां मछली पकड़ रहे सहदेव सहनी ने कहा था कि मंझौल और आसपास के इलाके में रहने वाले एक हजार से अधिक मछुआरों के परिवार की रोजी रोटी पहले इसी झील से चल जाती थी, अब उनमें से ज्यादातर को खेतिहर मजदूरी या निर्माण मजदूरी के लिए अपना इलाका छोड़ कर बाहर जाना पड़ रहा है। क्योंकि नदियां तटबंध से घिर गई हैं, पोखरे भरे जा रहे हैं और झील सूख रही है।

हालांकि इस मौजूदा संकट पर उत्तर बिहार की नदियों के सबसे बड़े विशेषज्ञ माने जाने वाले दिनेश कुमार मिश्र की राय थोड़ी अलग है। वह बिहार में बाढ़ और सुखाड़ का इतिहास लिख रहे हैं। वह कहते हैं कि उत्तर बिहार को बाढ़ वाला इलाका मान लेना ही एक गलत धारणा है। यहां जितने साल बाढ़ का प्रकोप रहा है, तकरीबन उतने ही साल सूखा भी पड़ा। कई दफा तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि एक ही साल में बाढ़ भी आई और सूखा भी पड़ गया।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह कहते हैं, दरअसल यहां किसानों को खरीफ की खेती के लिए तीन नक्षत्र रोहिणी, आर्द्रा और हथिया में पानी की जरूरत पड़ती है। अगर इन नक्षत्रों में पानी नहीं पड़ा या बाढ़ नहीं आई तो स्वतः सूखे की नौबत उत्पन्न हो जाती है। अमूमन बाढ़ ऐसे समय में आती है, जब किसानों को पानी की जरूरत नहीं होती। इसका समाधान है बाढ़ के दौरान आए अतिरिक्त जल को संरक्षित करके जरूरत के वक्त के लिए रख लेना। यहां का समाज पोखरों और कुओं के जरिए यह काम पारंपरिक रूप से करता ही रहा है।

मगर आजादी के बाद जब जल संसाधन का प्रबंधन सरकार ने अपने हाथ में ले लिया तो पूरा सिस्टम गड़बड़ा गया। बड़ी और मझोली सिंचाई परियोजनाएं और स्टेट बोरिंग को सिंचाई का आधार मान लिया गया। तालाब और कुएं बेकार माने जाने लगे। समाज ने भी इन्हें बेकार मानकर भरना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से स्थितियां गड़बड़ानी ही थी।

उत्तर बिहार में उत्पन्न जल संकट को नेपाल में हो रही पर्यावरणीय घटनाओं से भी जोड़कर देख रहे हैं। नेपाल में रहकर पर्यावरण और नदियों के सवाल पर काम करने वाले चंद्र किशोर कहते हैं, “दरअसल हमारे यहां शिवालिक श्रेणी में पिछले दो दशक में पेड़ों की खूब कटाई हुई है, जिससे यहां से निकलने और होकर बहने वाली नदियों में रेत की मात्रा काफी बढ़ रही है इनकी वजह से उत्तर बिहार की नदियां उथली हो रही हैं”।

चंद्र किशोर की बातों में इसलिए दम नजर आता है, क्योंकि आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि 1990 से 2005 के बीच नेपाल में 24.5 फीसदी वन क्षेत्र कम हो गया, जो 11,81,000 हेक्टेयर के बराबर था।

वहीं, उत्तर बिहार में बाढ़ को लेकर तटबंध की जो व्यवस्था स्वीकार की गई और सिंचाई का काम भूजल के दोहन से शुरू हुआ, उससे नेपाल के इलाकों में भी भूजल स्तर काफी तेजी से गिर रहा है।

दुखद तथ्य तो यह है कि भारत और नेपाल की दोस्ती के नाम पर सुपौल जिले के वीरपुर में बना मैत्री तालाब भी दुर्दशा का शिकार है। 1987 में पश्चिमी कोसी परियोजना की 32 एकड़ जमीन पर बने इस मैत्री तालाब को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना थी। इसे विकसित करने की कई बार योजना बनी, लेकिन काम शुरू नहीं हो सका। फिलहाल इसमें कीचड़ और जलकुंभी का साम्राज्य है।

हालांकि अब जल संकट को देखते हुए कई इलाकों में लोग सजग हो रहे हैं।जमुई के केडिया गांव में लोगों ने बोरवेल को न कह कुओं की पुनर्जीवित करने का काम तेजी से शुरू कर दिया है। मगर अभी भी बड़ी आबादी इस संकट का समाधान सबमर्सिबल बोरिंग में ही तलाश रही है।

सभी विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि उत्तर बिहार के इस जल संकट का समाधान अब भूजल दोहन के उपायों से मुमकिन नहीं है, क्योंकि इस इलाके का मौसम बदल रहा है। बारिश की मात्रा में 20 से 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा रही है। भू-जल का स्तर भी औसतन 4 से 5 मीटर तक नीचे गया है।

समाधान की बात करने पर गजानन मिश्र एक खास तथ्य की ओर इशारा करते हैं। वह कहते हैं, “भले ही हैंडपंप और बोरिंग का जलस्तर गिर रहा है, मगर कुओं में अब भी इस इलाके में 15 से 20 फीट की गहराई पर पानी मिल रहा है। यह सकारात्मक स्थिति है। इसलिए अगर इस संकट का स्थायी समाधान चाहते हैं तो हमें फिर से कुओं और तालाबों की पुरानी व्यवस्था की तरफ लौटना पड़ेगा।“

दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, “जल प्रबंधन की सुव्यवस्थित योजना को लागू नहीं कर पाना ही हमारी सबसे बड़ी गलती साबित हो रही है। बारिश और बाढ़ के जरिए इस इलाके में हर साल जितना पानी आता है, उसे तालाबों और दूसरे परंपरागत जल संरक्षण स्रोतों में रोक लिया जाए तो वह न सिर्फ पीने के पानी के लिए बल्कि खेती के काम के लिए भी पर्याप्त होगा। समाधान कुओं और तालाबों में ही है, बोरिंग और बांधों में नहीं”।

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