ओडिशा से श्रीलंका तक सफर करते हैं कछुए, सैटेलाइट ट्रैकिंग से हुआ खुलासा

वर्ष 2025-26 के दौरान 10 ऑलिव रिडले कछुओं इनमें छह मादा और चार नर शामिल थे पर सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए गए
सैटेलाइट ट्रांसमीटर उन जीवों के शरीर पर लगाए जाते हैं, जिनकी आवाजाही का अध्ययन करना होता है। फोटो: आशीष सेनापति
सैटेलाइट ट्रांसमीटर उन जीवों के शरीर पर लगाए जाते हैं, जिनकी आवाजाही का अध्ययन करना होता है। फोटो: आशीष सेनापति
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सारांश

ओडिशा तट पर ऑलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग से पता चला कि ये कछुए प्रजनन के बाद बंगाल की खाड़ी में श्रीलंका, आंध्र प्रदेश और सुंदरबन तक यात्रा करते हैं।

अध्ययन ने इनके प्रवासी गलियारों और प्रजनन स्थलों की पहचान की, जिससे संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता उजागर हुई।

ओडिशा तट पर ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं की सैटेलाइट टेलीमेट्री से पता चला है कि प्रजनन के बाद कछुए बंगाल की खाड़ी में बड़े पैमाने पर आवाजाही करते हैं। इस दौरान वे नियमित रूप से श्रीलंका, आंध्र प्रदेश और सुंदरबन के आसपास के समुद्री क्षेत्रों का इस्तेमाल करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि इनके संरक्षण के लिए ओडिशा के क्षेत्रीय समुद्री जल से बाहर भी विभिन्न राज्यों और देशों के बीच समन्वित प्रयासों की जरूरत है।

ये निष्कर्ष तीन साल की सहयोगी परियोजना के पहले वर्ष के दौरान सामने आए हैं। परियोजना का नाम “अंडरस्टैंडिंग द मूवमेंट्स एंड नेस्टिंग हैबिटैट डायनेमिक्स ऑफ ऑलिव रिडले टर्टल्स अलॉन्ग द ओडिशा कोस्ट” है। इसे भारतीय वन्यजीव संस्थान, ओडिशा वन विभाग, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड और अडानी फाउंडेशन मिलकर संचालित कर रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुरेश कुमार ने यह जानकारी दी।

वर्ष 2025-26 के दौरान 10 ऑलिव रिडले कछुओं इनमें छह मादा और चार नर शामिल थे पर सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए गए। ये ट्रांसमीटर केंद्रपाड़ा जिले के गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य और गंजाम जिले के रुशिकुल्या तट पर लगाए गए।

16 सितंबर 2026 तक इन कछुओं से कुल 1,748 दिनों की ट्रैकिंग प्राप्त हुई। 10 में से आठ कछुओं ने प्रजनन के बाद प्रवास किया। इन कछुओं ने 2,686 से 6,719 किलोमीटर तक की दूरी तय की और उनकी औसत गति लगभग 36 किलोमीटर प्रतिदिन रही।

अध्ययन में पूर्वी भारतीय महाद्वीपीय शेल्फ के साथ दक्षिण दिशा में जाने वाले एक नियमित प्रवासी गलियारे की पहचान हुई। इसके बाद कछुए बंगाल की खाड़ी के खुले समुद्री क्षेत्र में चले गए। कई कछुए श्रीलंका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों तक पहुंचे, जबकि दो कछुए बंगाल की खाड़ी से आगे निकल गए।

एक मादा कछुआ जीएफ04 ने 5,794 किलोमीटर की दूरी तय की और भूमध्य रेखा को पार करते हुए श्रीलंका के दक्षिण में स्थित समुद्री क्षेत्र तक पहुंची। वहीं, एक अन्य कछुआ जीएफ 03 करीब 6,719 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था। डॉ. कुमार ने बताया कि इन कछुओं की आवाजाही से उनके प्रवास के व्यापक दायरे का पता चलता है।

सैटेलाइट ट्रांसमीटर उन जीवों के शरीर पर लगाए जाते हैं, जिनकी आवाजाही का अध्ययन करना होता है। ये ट्रांसमीटर उच्च आवृत्ति के सिग्नल भेजते हैं, जिन्हें पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले मौसम संबंधी उपग्रह प्राप्त करते हैं। सबसे पहले इन सिग्नलों को डिकोड करके ट्रांसमीटर की पहचान की जाती है, क्योंकि प्रत्येक ट्रांसमीटर का एक अलग विशिष्ट कोड होता है।

इसके बाद प्राप्त अक्षांश और देशांतर के आंकड़ों को मानचित्र पर दर्ज किया जाता है। इससे कछुओं के प्रवास के रास्तों और उनकी आवाजाही के मार्गों का पता लगाया जा सकता है।

सैटेलाइट ट्रैकिंग से पहली बार दो अलग-अलग प्रजनन स्थलों के बीच कछुओं की आवाजाही का लगातार विस्तृत रिकॉर्ड भी सामने आया है। दिसंबर 2025 में गहिरमाथा में टैग की गई एक मादा कछुआ जीएफ05 दक्षिण दिशा में करीब 335 किलोमीटर की यात्रा कर रुशिकुल्या पहुंची। इस दौरान वह देवी के प्रजनन स्थल से होकर गुजरी और बाद में वापस गहिरमाथा लौट आई। डॉ. कुमार के अनुसार, इस पूरे चक्र में उसने करीब 696 किलोमीटर की दूरी तय की।

जनवरी और फरवरी 2026 के बीच गहिरमाथा के तट के पास समुद्री क्षेत्र में नाव से किए गए सर्वेक्षण में सतह पर आते हुए 909 कछुए और 67 संभोगरत जोड़े दर्ज किए गए। कछुए तट के बेहद करीब बड़ी संख्या में पाए गए। सबसे अधिक कछुए एक किलोमीटर वाले ट्रांसेक्ट में मिले। अधिकांश कछुए समुद्र तट से दो किलोमीटर के दायरे में और 6.6 से 16.3 मीटर की गहराई वाले समुद्री क्षेत्र में देखे गए।

अध्ययन में लैंडसैट सैटेलाइट इमेजरी की मदद से ऑलिव रिडले के तीन प्रमुख प्रजनन स्थलों—गहिरमाथा, देवी और रुशिकुल्या के आसपास तटरेखा में हुए बदलावों का भी अध्ययन किया गया। हालांकि, कुल मिलाकर ओडिशा की तटरेखा में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ, लेकिन इन तीनों प्रजनन स्थलों पर अलग-अलग स्थिति देखने को मिली।

गहिरमाथा में तट का विस्तार यानी अवसादन (एक्रीशन) काफी अधिक हुआ, जबकि रुशिकुल्या में बड़े पैमाने पर तटीय कटाव (इरोशन) दर्ज किया गया। यहां करीब 15.8 किलोमीटर लंबा समुद्री तट कटाव से प्रभावित हुआ और तटरेखा औसतन करीब 4.7 मीटर पीछे खिसकी। देवी में स्थानीय स्तर पर कटाव और तट के बढ़ने, दोनों की वजह से तटरेखा में काफी गतिशील बदलाव देखने को मिला।

ये निष्कर्ष संरक्षण की योजना बनाने के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराते हैं। प्रजनन के मौसम में गहिरमाथा तट से करीब दो किलोमीटर तक का समुद्री क्षेत्र कछुओं के एकत्र होने और संभोग की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में सामने आया है। इसके अलावा, तीन संभावित समुद्री पड़ाव क्षेत्रों (ऑफशोर स्टॉपओवर एरिया) की भी पहचान की गई है। ये क्षेत्र सुंदरबन के समुद्री शेल्फ ब्रेक, बंगाल की खाड़ी के मध्य हिस्से और आंध्र प्रदेश के शेल्फ ब्रेक के पास स्थित हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ओडिशा के ऑलिव रिडले कछुओं के संरक्षण के लिए अलग-अलग राज्यों और देशों के बीच सहयोग जरूरी है, क्योंकि ये कछुए ओडिशा के समुद्री क्षेत्र से काफी दूर तक यात्रा करते हैं। रिपोर्ट में समुद्री क्षेत्र की योजना बनाने, मत्स्य प्रबंधन और महत्वपूर्ण आवासों की सुरक्षा के लिए सैटेलाइट से प्राप्त आवाजाही के आंकड़ों का इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है। श्रीलंका के साथ लगातार समन्वय भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि कछुओं की आवाजाही अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करती है।

यह परियोजना 2028 तक जारी रहेगी। इससे लंबे समय का सैटेलाइट टेलीमेट्री डेटा तैयार होने, महत्वपूर्ण प्रवासी गलियारों और पड़ाव क्षेत्रों की पहचान होने, तटरेखा में बदलावों का आकलन करने और ओडिशा तट पर ऑलिव रिडले के प्रजनन स्थलों की सुरक्षा के उपाय तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

डॉ. कुमार ने कहा कि समुद्र में समुद्री धाराएं राजमार्ग की तरह होती हैं और समुद्री कछुए इन धाराओं का इस्तेमाल करते हुए समुद्र में अपनी यात्रा करते हैं। हर साल बड़े पैमाने पर अंडे देने के लिए ओडिशा तट पर आने वाले ऑलिव रिडले समुद्री कछुए मुख्य रूप से ओडिशा से श्रीलंका तक बंगाल की खाड़ी में यात्रा करते हैं। उन्होंने कहा कि ये कछुए प्रशांत महासागर की ओर कभी नहीं जाते।

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