Photo: X@EconAtState
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क्या समृद्धि की नई साझेदारी से वंचित हो जाएगा भारत?

पैक्स सिलिका में भारत की अनुपस्थिति: क्या यह तकनीकी दौड़ में पीछे छूटने का संकेत है?
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कुछ समय पहले तक कहा जाता था कि जिस देश के पास डाटा होगा, दुनिया पर वही राज करेगा लेकिन अब ऐसा पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि अब जो परिदृश्य सामने है उसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) तकनीक, क्रिटिकल मिनिरल्स और सेमीकंडक्टर्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इनके बिना दुनिया का काम चलने वाला नहीं है। इस क्षेत्र में अग्रणी देश की मुट्ठी में दुनिया कैद होगी। फिलवक्त चीन इसमें बढ़त बनाए हुए है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए भविष्य की तकनीक और प्रौद्योगिकी सम्बंधी जरूरतों के लिए एआइ तथा क्रिटिकल मिनिरल्स की महत्ता के संदर्भ में पिछले महीने वाशिंगटन, डीसी (अमेरिका) में पहला पैक्स सिलिका (Pax Silica) शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ जिसके लिए भारत को आमंत्रित नहीं किया गया। यह कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भारत के लिए एक बड़ा झटका है।

वाशिंगटन, डीसी में 12 दिसंबर, 2025 को आयोजित यह 'पैक्स सिलिका' वास्तव में अमेरिकी नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के लिए आवश्यक सिलिकॉन आधारित सप्लाइ चेन को सुरक्षित, मजबूत और भरोसेमंद बनाना है- विशेषकर सेमीकंडक्टर्स, क्रिटिकल मिनिरल्स, उन्नत विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स के लिए। 

पैक्स सिलिका का लैटिन भाषा में अर्थ है- पैक्स = शांति या दुःखों से मुक्ति और सिलिका= सिलिकॉन की कच्ची सामग्री सिलिकॉन डाइ-ऑक्साइड। इसी वजह से इसका नाम 'एआइ युग के लिए स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध तकनीकी सप्लाइ-चेन' का संकेत देता है।

निकट भविष्य में सिलिकॉन की होने वाली महत्वपूर्ण भूमिका के दृष्टिगत पैक्स सिलिका का लक्ष्य है—सिलिकॉन और उससे जुड़े तकनीकी संसाधनों की वैश्विक सप्लाइ चेन को सुरक्षित, आर्थिक रूप से मजबूत और नवाचार-आधारित बनाना क्योंकि सिलिकॉन ही सेमीकंडक्टर चिप्स का मुख्य घटक है और ये चिप्स आज की आधुनिक एआइ, कंप्यूटिंग और तकनीकी बुनियादी ढाँचे के दिल हैं। 

अमेरिका में हुई पैक्स सिलिका बैठक और नतीजा—

इस बैठक में शामिल अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, यूएई और ऑस्ट्रेलिया ने 'पैक्स सिलिका घोषणा पत्र' पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उन्होंने वैश्विक तकनीकी आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा, संवेदनशील तकनीकों की साझा सुरक्षा, अवरोधकारी निर्भरताओं को कम करना और एआइ तथा सेमीकंडक्टर तकनीकों में साझेदारी बढ़ाने में सहयोग की प्रतिबद्धता जताई।

यह पहल एक तरह से एक भरोसेमंद तकनीकी ब्लॉक बन रही है, जो चीन जैसे अत्यधिक तकनीकी प्रतिस्पर्द्धी सेमीकंडक्टर और एआइ सप्लाइ-चेन पर दबदबे को चुनौती देना चाहती है।

भारत को क्यों नहीं बुलाया गया?

आमतौर पर विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार भारत को इस पहल की पहली सूची में शामिल नहीं करने के पीछे ये मुख्य वजहें बताई जा रही हैं-

1. तकनीकी और उत्पादन क्षमता—पैक्स सिलिका में शामिल देश वे हैं जिनके पास अत्याधुनिक चिप उत्पादन क्षमता है, एआइ तकनीक में अग्रणी कंपनियाँ हैं, समृद्ध आर्थिकी, सामग्री और संसाधन सप्लाइ जैसी क्षमताएं हैं। भारत अभी इन क्षेत्रों में पूरी तरह से प्रतिस्पर्द्धी स्थिति में नहीं माना जाता।

2. पैक्स सिलिका के गठन में अमेरिका के अपने रणनीतिक और आर्थिक हित शामिल हैं, जिसका लक्ष्य भरोसेमंद तथा पूरक तकनीकी सप्लाइ नेटवर्क तैयार करना और चीन पर तकनीकी निर्भरताओं को कम करना है। इन कारणों से समूह में ऐसे देशों को प्राथमिकता मिली जिनकी तकनीक, अर्थव्यवस्था और निवेश क्षमताएँ इस रणनीति के लिए जरूरी मानी गईं। 

3. राजनीतिक और राजनयिक पक्ष—भारत और अमेरिका के बीच कुछ मौजूदा राजनयिक मुद्दों तथा व्यापार-वार्ता के अलग-अलग एजेंडों को अमेरिका ने स्पष्ट किया कि पैक्स सिलिका का निर्णय 'राजनीतिक झगड़े' के कारण नहीं है, लेकिन वैश्विक तकनीकी गठजोड़ के एक-एक गुण व क्षमता पर आधारित है। 

4. भारत की संभावना—अमेरिका ने कहा है कि भारत भविष्य में इस समूह से जुड़ सकता है। इसके लिए बातचीत जारी रहेगी तो वह साझेदार हो सकता है।

यह कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि 16 ट्रिलियन डॉलर में हिस्सेदार बनने की दावत थी। 

इस नवगठित पहल में शामिल अमेरिका के पास एनवीडिया, ओपन एआइ और माइक्रोसॉफ्ट जैसी लीडरशिप है। जापान चिप बनाने वाले विशिष्ट कैमिकल्स में अग्रणी है। दक्षिण कोरिया में सैमसंग और एसके हाइनिक्स हैं, सिंगापुर व यूएई में फाइनेंस, लॉजिस्टिक्स और डाटा सेंटर के बड़े-बड़े हब्स मौजूद हैं।

नीदरलैंड्स दुनिया की सबसे महंगी और ऐसी एडवांस मशीनें बनाता है जिनके बिना चिप्स बनी ही नहीं सकतीं। ऑस्ट्रेलिया में लीथियम, कोबाल्ट और निकल के भंडार हैं। यूनाइटेड किंगडम और इज़राइल अमेरिका के रणनीतिक साझेदार। तो इनके बीच एक बड़े बाजार तथा सस्ते श्रमिकों के देश भारत की कोई गिनती नहीं और वह भी तब जबकि मोदी के कारण डोनाल्ड ट्रम्प भारत को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते।

इस तरह पैक्स सिलिका संगठन से जुड़ जाने से भारत को अत्याधुनिक तकनीक में साझेदारी, अंतरराष्ट्रीय निवेश, एआइ तथा सेमीकंडक्टर निर्माण में स्थानीय क्षमता के विकास और नये रोजगार सृजन जैसे अवसर मिल सकते थे।  

अफसोस कि भारत इस अत्यंत महत्वपूर्ण वैश्विक तकनीकी साझेदारी का हिस्सा नहीं होने के कारण उस ग्लोबल नेटवर्क का भाग नहीं है जो एआइ और तकनीकी आपूर्ति-शृंखला के अगले चरण को आकार देने जा रहा है।

काश, भारत के वर्तमान भाग्य विधाताओं ने खुद को महान दिखाने तथा सिर्फ और सिर्फ सत्ता पर कब्जा बनाए रखने की तिकड़मबाजी पर केंद्रित रहने की बजाय देश को मजबूत बनाने पर जरा-सा भी ध्यान दिया होता तो चीन के समानांतर बनने जा रही इस दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी में भारत भी न केवल शामिल होता, बल्कि इसकी समृद्धि के नये द्वार भी खुलते।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं

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