अवशिष्ट या ‘वेस्ट’: व्यवस्थागत दोष का उत्पाद
अगर हम कहें कि अवशिष्ट या ‘वेस्ट’ की अवधारणा एक आधुनिक और नवीन अवधारणा है तो इसे अतिरंजना नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि आज भी “अविकसित” और “पिछड़े” माने जाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीय सभ्यता की तुलना में अवशिष्टों की अनुपलब्धता दिखाई देती है I वहां इनके निपटान के लिए किसी पृथक तंत्र की आवश्यकता नहीं, अपितु उनके उपभोग के तरीकों में ही इसका निपटान अन्तर्निहित होता है I
अवशिष्ट मूलतः उन चीजों को कह सकते हैं जो किसी वस्तु के प्राथमिक उपभोग के बाद अवांछित और अनुपयोगी हो जाती है I जाने माने लेखक और पर्यावरणविद पॉल हॉकिन अपनी किताब ‘ब्लेस्ड-अनरेस्ट’ में लिखते हैं- ‘अवशिष्ट का होना एक नई प्रघटना है I मैंने अपने बचपन का कुछ हिस्सा अपनी स्वीडिश दादी और स्कॉटिश दादा के एक फार्म पर बिताया, जहां शायद ही कोई चीज उपभोग के बाद फेंकी जाती थी I
खलिहान इस्तेमाल किए हुए वॉशर, बोल्ट, तार और छोटी-मोटी चीज़ों से भरा रहता था I रसोई में लगभग हर दूसरी प्लेट टूटी-फूटी होती थी, लेकिन खाने की मेज़ से कोई भी प्लेट तब तक नहीं हटाई जाती थी जब तक उसमें खाना बचा रहता I ग्रेवी और रस को घर की बनी ब्रेड से साफ कर लिया जाता था, सब्जियों के छिलके मुर्गियों को दे दिए जाते थे I
नाश्ते में खाए गए अंडों के छिलके कॉफ़ी के बचे हुए पाउडर में मिला दिए जाते थे, कॉफी का बचा हुआ पाउडर खाद बनाने वाली जगह पर डाल दिया जाता था, उस खाद को बगीचे की मिट्टी में मिला दिया जाता था, और बगीचे से मिले टमाटर और मक्का को कांच के जारों में बंद करके, जैम और जेली के साथ ठंडी जगह पर सहेजकर रख दिया जाता था…” I
स्पष्ट तौर पर उनके संस्मरण से जाहिर है कि पारंपरिक समाजों में उपभोग की एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें कोई भी चीज बेकार नहीं जाती थी, बल्कि वे सभी किसी न किसी रूप में उपयोग में आ जाती थी I लेकिन बदलती हुई अर्थव्यवस्था ने अवशिष्टों की एक अलग दुनिया को जन्म दियाI आज स्थिति ऐसी है कि हमारे चारों तरफ अवशिष्टों का पहाड़ खड़ा है I
नगर निगम की गाड़ियां भी इन अवशिष्टों का निपटारा करते-करते थक चुकी हैं I वे सुबह साफ करके जाते हैं और शाम तक सड़कें और गलियां फिर से अवशिष्टों के ढेर में तब्दील हो जाती है I यह एक अंतहीन प्रक्रिया है, जो हमारे जीवन में भीतर तक धंस गई है I
हम खाना खाते हैं तो प्लास्टिक के पैकेट डस्टबीन में डालते हैं, हम पानी पीते हैं तो उसके बोतल को कुचलकर करके उसे भी फेंकते हैं, कपडे खरीदकर लाते हैं तो उसके कवर या पोलीथिन को बाहर फेंकते हैं I किचन से हर दिन हम बड़ी मात्रा में कचडों को बाहर निकालते हैं I
वाशरूम से भी साबुन के प्लास्टिक पैकेट, पुराने ब्रश और टूथपेस्ट के डब्बे आदि हमें दैनिक तौर पर बाहर निकालना पड़ता है I हम अपने दैनिक जीवन की सभी गतिविधियों को देखें तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि हमारे महज दैनिक उपभोग की प्रक्रिया में अवशिष्ट का उत्पादन अनिवार्य तौर पर और बड़ी मात्रा में होता है I प्रत्येक उपभोग अपने पीछे एक अवशेष छोड़ जाती है I
पारंपरिक समाजों में अपेक्षाकृत अवशिष्टों का उत्पादन नगण्य था I उनकी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक चीज किसी न किसी रूप में उपभोग का हिस्सा बन जाती थी I आधुनिक होते समाज की अर्थव्यवस्था इस तरह से विकसित हुई कि अर्थतंत्र के परंपरागत ‘रीसाइक्लिंग-प्रोसेस’ और इसकी समझ और उपयोग का ‘मेकनिज्म’ गायब होता जा रहा है I
और इसके परिणाम भयावह सिद्ध हो रहें हैं I जैसे, भारत के कई विकसित राज्यों में पराली (पुआर, पुआल) का प्रदूषण एक बड़ा विमर्श हैI धान और गेंहू की कटाई के बाद उसके कुछ हिस्से खेतों में ही रह जाते हैं, जिसे किसान जला देते हैं और यह बड़े स्तर पर वायु प्रदूषण का कारण बनता जा रहा है I
परंपरागत कृषि में यह समस्या नहीं थी, यह कृषि के आधुनिक और अत्यधिक तकनीक केन्द्रित होने के कारण हुई I परंपरागत कृषि में कृषि और पशुपालन पूरक थे I पराली का प्रयोग मवेशियों के चारें के लिए किया जाता था I
इसके अतिरिक्त यह अन्य घरेलु कार्यों में भी प्रयुक्त होता था- जैसे बर्तन मांजने के लिए, जबकि आज प्लास्टिक के ब्रश प्रयोग होते हैं; ठन्डे के मौसम में बिछावन के नीचे बिछाने के लिए जो ठंडी से बचाती थी; घर बनाने के लिए और अनेक अन्य कार्यों में I
इस तरह पराली कभी अवशिष्ट के तौर पर नहीं देखा गया, बल्कि यह उस समाज की एक अहम् वस्तु थी जिसके बिना उनकी अर्थव्यवस्था नहीं चलाई जा सकती थी I इसी तरह पहले केले के या अन्य पत्तों पर खाया जाता था, खाने के बाद वे पत्ते घर के मवेशियों को खिला दिया जाता था I
लेकिन आज जो फाइबर या प्लास्टिक के पत्ते होते हैं वह खाने के बाद एक अवशिष्ट बन जाता है, उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती I एक अन्य उदाहरण लेते हैं बिहार के मिथिला के सुजनी-कला का इसमें पुराने कपड़ों को जोड़कर बिछावन बनाया जाता था जो शरीर के लिए आरामदायक भी होता था और पुराने कपड़ों का सार्थक प्रयोग भी हो जाता था, लेकिन अब उसका स्थान स्लीप-वेल जैसी बड़ी कम्पनियों के तोशक ने ले लिया है I
इसी तरह बर्तन धोने के लिए चूल्हे की बुझी राख का प्रयोग होता था, जिसका कोई नुकसान नहीं था, लेकिन अब जिन डि’टर्जेंट’ का हम प्रयोग कर रहें हैं वह ‘कैंसरस’ है I इस तरह के अनगिनत उदाहरण आप देख सकते हैं जो आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलन में है I
इन अवशिष्टों से कम से कम दो गंभीर नुकसान है: पहला कि यह संसाधनों की बर्बादी है, क्योंकि अवशिष्ट भी किसी न किसी प्राकृतिक पदार्थ से ही बने होते हैं, और इनके बनने में भी श्रम और संसाधन का एक बड़ा हिस्सा लगा होता है I और दूसरा नुकसान है प्रदूषण के पैदा होने का; इनके घर में या घर के बाहर रखे जाने पर यह कई तरह से वातावरण को दूषित करता रहता है, और जिसका नुकसान सम्पूर्ण पारिस्थिकी को उठाना पड़ता है I
समस्या यह है कि हमारे वर्तमान वैश्विक आर्थिक तंत्र की संरचना ही इस तरह की है जो अनिवार्य रूप से इन अवशिष्टों को उत्पादित करती है I तेजी से नगरीकरण और औद्योगीकरण ने भारत में इसके उत्पादन को भी तेजी से बढाया है I
सामान्य आंकड़ों को भी देखें तो भारत में ही प्रतिदिन करीब 170000 टन अवशिष्टों का उत्पादन चार प्रतिशत की वार्षिक दर के साथ हो रहा है I इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए ही अवशिष्टों के ‘रीसाइक्लिंग’ के लिए देश-दुनिया में अनगिनत संस्थाएं कार्य कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद पूरी तरह से अवशिष्टों पर नियंत्रण नहीं किया जा सका है I
उत्पादन और वितरण जबतक लाभ, लालच, और संचय आदि के लिए होता रहेगा यह समस्या जारी रहेगी I यह समस्या व्यक्तिगत नहीं, व्यवस्थागत हैI

