भारत के 67 प्रतिशत घरों में ही हाथ धोने की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध

ग्लोबल हैंडवॉशिंग डे है आज: ‘भारत में हाथों की सफाई की तस्वीर: केवल 35.82 फीसदी लोग खाना खाने से पहले साबुन से धोते हैं हाथ, ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और बुनियादी सुविधाओं की अब भी दरकार।
भारत में केवल 35.82 प्रतिशत लोग खाना खाने से पहले साबुन से हाथ धोते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में आंकड़ा महज 25.31 प्रतिशत है।
भारत में केवल 35.82 प्रतिशत लोग खाना खाने से पहले साबुन से हाथ धोते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में आंकड़ा महज 25.31 प्रतिशत है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • दुनिया के हर चार में से एक स्कूल में साबुन और पानी से हाथ धोने की बुनियादी सुविधा आज भी नहीं है।

  • भारत में केवल 35.82 प्रतिशत लोग खाना खाने से पहले साबुन से हाथ धोते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में आंकड़ा महज 25.31 प्रतिशत है।

  • शौचालय इस्तेमाल करने के बाद देश में 74.15 प्रतिशत लोग साबुन या डिटर्जेंट से हाथ धोते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति कमजोर है।

  • भारत के लगभग 67.8 प्रतिशत घरों में हाथों की सफाई के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन सुधार की जरूरत है।

  • देश के शहरी इलाकों में 56.05 प्रतिशत लोग भोजन से पहले हाथ धोते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा काफी कम है।

हाथ धोना एक छोटी-सी आदत है, लेकिन इसका फायदा बहुत बड़ा है। साबुन और साफ पानी से हाथ धोकर हम कई बीमारियों से बच सकते हैं। खासकर बच्चों के लिए यह आदत किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है। मगर दुनिया में आज भी लाखों बच्चों को हाथ धोने के लिए साफ पानी, साबुन और जरूरी सुविधाएं आसानी से नहीं मिल पातीं। ऐसे में हाथों की सफाई का संदेश घर-घर पहुंचाना बेहद जरूरी है।

हर साल 15 अक्टूबर को वैश्विक हाथ धुलाई दिवस (ग्लोबल हैंडवॉशिंग डे) मनाया जाता है। इसकी शुरुआत साल 2008 में ग्लोबल हैंडवॉशिंग पार्टनरशिप ने की थी। इसका मकसद लोगों को साबुन से हाथ धोने की अहमियत समझाना और इस आदत को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना है। साल 2026 की थीम है ‘बी अ हैंडवॉशिंग हीरो’, यानी हाथों की सफाई का नायक बनें। संदेश साफ है - खुद हाथ धोएं, दूसरों को प्रेरित करें और अपने घर, स्कूल तथा समुदाय को स्वच्छ बनाएं।

छोटी आदत, बड़े फायदे

बच्चे अक्सर खेलते समय मिट्टी, खिलौनों और अलग-अलग सतहों को छूते हैं। इसके बाद बिना हाथ धोए खाना खाने या आंख, नाक और मुंह को छूने से कीटाणु शरीर में पहुंच सकते हैं। साबुन से अच्छी तरह हाथ धोने पर इन कीटाणुओं को हटाने में मदद मिलती है। इससे दस्त और दूसरी संक्रामक बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।

जब बच्चे स्वस्थ रहते हैं, तो वे नियमित रूप से स्कूल जा पाते हैं, पढ़ाई में ध्यान लगा पाते हैं और खेलकूद में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यानी हाथ धोने की आदत केवल बीमारी से बचाव नहीं करती, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, विकास और बेहतर भविष्य में भी योगदान देती है।

स्कूलों में अब भी बड़ी चुनौती

हाथ धोने की अहमियत समझना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी इसके लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी है। यूनिसेफ के अनुसार, दुनिया के लगभग हर चार में से एक स्कूल में आज भी साबुन और पानी से हाथ धोने की बुनियादी सुविधा नहीं है। ऐसे में बच्चों से स्वच्छता की उम्मीद करना आसान है, लेकिन उन्हें इसके लिए जरूरी साधन देना भी उतना ही आवश्यक है।

गरीबी, प्राकृतिक आपदाएं, संघर्ष और विस्थापन जैसी परिस्थितियां इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। बाढ़ या भूकंप में पानी और स्वच्छता की व्यवस्था नष्ट हो सकती है। विस्थापित परिवारों के लिए साफ पानी और साबुन जुटाना मुश्किल हो सकता है। जहां पानी की नियमित आपूर्ति नहीं है, वहां हाथ धोने जैसी सामान्य आदत भी बड़ी चुनौती बन जाती है।

भारत में भी सुधार की जरूरत

भारत में हाथों की सफाई को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में केवल लगभग 35.82 प्रतिशत लोग खाना खाने से पहले साबुन से हाथ धोते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 25.31 प्रतिशत, जबकि शहरी क्षेत्रों में 56.05 प्रतिशत बताया गया है।

वहीं, शौचालय इस्तेमाल करने के बाद लगभग 74.15 प्रतिशत लोग साबुन या डिटर्जेंट से हाथ धोते हैं। ग्रामीण इलाकों में यह अनुपात 66.81 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 88.26 प्रतिशत है। इसके अलावा, लगभग 67.8 प्रतिशत भारतीय परिवारों में हाथों की सफाई के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होने का अनुमान है। इन आंकड़ों से साफ है कि सुविधाओं की उपलब्धता और लोगों की आदतों, दोनों पर काम करने की जरूरत है।

यूनिसेफ की पहल से मिल रही मदद

यूनिसेफ करीब 100 देशों में पानी, स्वच्छता और साफ-सफाई से जुड़े कार्यक्रम चलाता है। संगठन सरकारों, स्थानीय समुदायों और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर बच्चों तथा परिवारों के लिए सुरक्षित पानी और स्वच्छता की सुविधाएं बेहतर बनाने का प्रयास करता है।

स्कूलों, अस्पतालों और विस्थापन शिविरों में पानी की व्यवस्था, स्वच्छता प्रणाली और हाथ धोने के स्टेशन तैयार करने में मदद दी जाती है। दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखकर सुविधाओं को सुलभ बनाने पर भी जोर दिया जाता है। इसके अलावा, साबुन, हैंड सैनिटाइजर और स्वच्छता किट उपलब्ध कराने के साथ शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों और समुदाय के नेताओं को जागरूकता फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

बनें हाथों की सफाई के नायक

हाथ धोने के लिए किसी बड़े खर्च या विशेष व्यवस्था की जरूरत नहीं, लेकिन नियमित रूप से साबुन और साफ पानी का इस्तेमाल करना जरूरी है। खाना बनाने और खाने से पहले, शौचालय के बाद, खांसने या छींकने के बाद और गंदगी छूने पर हाथ अच्छी तरह धोने चाहिए। हाथों की सभी सतहों, उंगलियों के बीच और नाखूनों के आसपास साबुन लगाकर कम से कम 20 सेकंड तक हाथ रगड़ना चाहिए।

वैश्विक हाथ धुलाई दिवस का संदेश केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। माता-पिता बच्चों को यह आदत सिखाएं, शिक्षक स्कूलों में इसे बढ़ावा दें और समाज हाथ धोने की सुविधाएं सुनिश्चित करने में योगदान दे। क्योंकि साफ हाथ, स्वस्थ बचपन और सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव हैं।

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