व्हाइट-कॉलर वर्कर के परिवहन के माध्यम के रूप में साइकिल का उपयोग? दिल्ली की सड़कों के साथ मेरा अनुभव
बीते जमाने की कड़ाके की ठंड वाली सुबहें अब पुरानी बात हो चुकी हैं, सर्दियों में दिल्ली अब अपनी खराब हवा की गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। अब हालात सबसे ज़्यादा खराब होने पैर, स्कूल बंद कर दिए जाते हैं और 'वर्क फ्रॉम होम' (घर से काम करने) की सलाह जारी की जाती है, क्योंकि हवा इतनी ज़हरीली हो जाती है कि इसे 'स्वास्थ्य आपातकाल' का दर्जा देना पड़ता है।
दिल्ली का ज़्यादातर वायु प्रदूषण स्थानीय कारणों से होता है, इसलिए यह सुझाव दिया जा सकता है कि इस समस्या का समाधान दिल्लीवासियों के पास ही मौजूद है। हालाँकि यह बात पूरी तरह सच नहीं है, फिर भी बदलाव लाने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी वाले उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। खासकर अब, जब घरों और दफ़्तरों में 'एयर प्यूरीफ़ायर' आम हो गए हैं, और सरकार भी सार्वजनिक स्कूलों और दफ़्तरों में प्रदूषण कम करने के उपाय के तौर पर एयर प्यूरीफ़ायर खरीदने के लिए टेंडर जारी कर रही है, जो कहीं न कहीं उनकी बेबसी और पराजय को ही दर्शाता है।
ऐसी परिस्थिति में, अनियमित विचार ही आगे बढ़ने का सबसे तार्किक रास्ता लगता है। राजधानी दिल्ली में, जहाँ नेताओं की हैसियत का अंदाज़ा उनके काफिले की लंबाई से लगाया जाता है, और किसी आम इंसान की सामाजिक प्रतिष्ठा उसकी कार के टायरों की चौड़ाई और 'व्हीलबेस' से आँकी जाती है, वहाँ स्वास्थ्य संकट के समाधान के तौर पर साइकिल को अपनाने का सुझाव देना वाकई में एक बहुत ही अनियमित बात लगती है।
फिर भी, भारत में साइकिलें हर जगह दिखाई देती हैं। लगभग आधे भारतीय परिवारों के पास अपनी साइकिल है, हालाँकि दिल्ली में यह आँकड़ा घटकर 27.2 प्रतिशत रह गया है। लेकिन, दिल्ली में आने-जाने की औसत दूरी 4 से 6 किलोमीटर होने के कारण, यह कहा जा सकता है कि साइकिल को अपनाना कोई बहुत बड़ा या मुश्किल बदलाव नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से मुमकिन है।
विचार को आज़माना: आने-जाने का मेरा रोज़ाना का सफ़र
मेरा दफ़्तर, जहाँ मैं अभी रहता हूँ, वहाँ से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर है | इस तरह मुझे रोज़ाना औसतन 14 किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है। मेरे पास पहले से ही 21-गियर वाली एक साइकिल मौजूद थी, जिसे मैंने महामारी के दौरान खरीदा था और अपने गृह-नगर में काम पर आने-जाने के लिए इस्तेमाल करता था। इसलिए, दिल्ली में भी आने-जाने के लिए साइकिल को एक विकल्प के तौर पर अपनाना मेरे लिए बहुत ही स्वाभाविक और आसान रहा। पिछले चार महीनों में, मैंने कुल मिलाकर 550 किलोमीटर की दूरी तय की है, और हर बार सफ़र पूरा करने में मुझे औसतन 24 से 28 मिनट का समय लगा है।
संदर्भ के लिए, एक कैब या दो-पहिया वाहन को भी लगभग उतना ही समय लगता है, जिसमें 4-5 मिनट का ही फ़र्क होता है, क्योंकि हर वाहन को उन्हीं सड़कों का इस्तेमाल करना पड़ता है। जिस रास्ते पर से मैं रोज़ गुज़रता हूँ वहां साइकिल चलाने के लिए कोई अलग ट्रैक नहीं है, और 4 चौराहे और 6 ट्रैफ़िक सिग्नल आते हैं। रास्ते का आखिरी हिस्सा दिल्ली मेट्रो के फ़ेज़ IV के उस भारी निर्माण कार्य वाले हिस्से से होकर गुज़रता है, जो अब काफ़ी आगे बढ़ चुका है, जिसकी वजह से रास्ते में कई जगह ट्रैफ़िक को मोड़ा गया है। अतिरिक्त सामान की बात करें तो, मैंने अपनी साइकिल पर एक ग्लव बॉक्स लगाया है, जिससे मैं साइकिल चलाते समय अपना मोबाइल फ़ोन और दूसरा सामान सुरक्षित रख पाता हूँ।
हालात, रुकावटें और कुछ खास सहूलियतें
मुख्य सड़कों पर ट्रैफ़िक बहुत ज़्यादा होता है। यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब सड़क का एक बड़ा हिस्सा खड़ी गाड़ियों से भरा होता है, जैसा कि पूरे दिल्ली में आम बात है | ये गाड़ियाँ चाहे कानूनी तौर पर खड़ी हों या गैर-कानूनी तौर पर, इन्हें शायद ही कभी हटाया जाता है।
इसके अलावा, सड़कों पर चलने वाला ट्रैफ़िक शायद ही कभी लेन के अनुशासन' का पालन करता है। बसें, निजी गाड़ियाँ, दो-पहिया वाहन, ऑटो-रिक्शा और 5-सीटर रिक्शा सभी सड़क पर जगह पाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते रहते हैं।
फिर भी, गाड़ियां धीमी हो जाती हैं और साइकिलों को पहले निकलने देती हैं, जिससे यात्रा के दौरान सुरक्षा का एहसास बढ़ता है। साथ ही, मेरी यात्रा का समय ठीक ऑफिस के समय से मेल खाता है, इसलिए ट्रैफ़िक बहुत ज़्यादा होता है और तेज रफ़्तार से गाड़ियां चलाना मुश्किल होता है। यह एक राहत देने वाला पहलू तो है, लेकिन यह कोई व्यवस्थागत समाधान नहीं है।
मैं इस बात को मानता हूँ कि इस काम को करने की मेरी क्षमता में कुछ खास सहूलियतें छिपी हुई हैं। जिनमें सबसे बड़ी बात यह है कि मैं एक पुरुष नागरिक हूंं। मेरे काम की स्थिरता और उसका पहले से पता होना मुझे साइकिल चलाने को अपनी रोजमर्रा की आदत बनाने में मदद करता है।
मेरे ऑफिस में साइकिल खड़ी करने के लिए एक स्टैंड बना हुआ है, जिससे काम के लंबे घंटों के दौरान साइकिल को सुरक्षित खड़ा करने की चिंता नहीं रहती। मैं इस बात को भी मानता हूँ कि मेरे पास यह चुनने की विलासिता भी मौजूद है कि अगर मुझे जरूरत पड़े, तो मैं ऑफिस आने-जाने के लिए निजी कैब का इस्तेमाल कर सकता हूँ।
आने-जाने के तरीके में बदलाव: भारत से बाहर के अनुभव
एडिनबर्ग में बिताया गया मेरा समय और पूरे यूके (यूनाइटेड किंगडम) में की गई मेरी यात्राएँ इस काम को करने के लिए मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं। ओल्ड कॉलेज बिल्डिंग के आस-पास की सड़कें, जो 'नॉर्थ ब्रिज' और 'साउथ ब्रिज' के बीच पड़ती हैं, उनका इस्तेमाल कारें और साइकिलें, दोनों ही समान रूप से करती हैं। शहर की सभी सड़कों पर साइकिल चलाने के लिए अलग से जगह नहीं बनी हुई थी, फिर भी ट्रैफ़िक सिग्नलों पर साइकिलों के लिए एक खास ठहरने की जगह बनाकर उन्हें सड़क पर जगह दी गई थी।
लंदन और पेरिस शहरों में हवा की गुणवत्ता में ज़बरदस्त सुधार लाने में साइकिलों और साइकिलिंग रास्तों की भूमिका अब साबित हो चुकी है। खासकर पेरिस में, मेयर ऐनी हिडाल्गो के नेतृत्व में, ज़्यादा बाइक लेन बनाने जैसे कुछ उपायों की मदद से PM2.5 के स्तर में 30 प्रतिशत की कमी आई है। यह एक जानी-मानी बात है कि पैदल चलने वालों और साइकिलों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना, ट्रैफिक जाम की समस्या से निपटने का सामाजिक समानता बढ़ाने वाला तरीका है, और साथ ही यह शहर को ज़्यादा सुरक्षित भी बनाता है।
लंदन की मेरी यात्रा की एक तस्वीर मेरे ज़हन में बस गई है, एक साइकिल-सवार बारिश का सामना करते हुए सफ़र कर रहा है, ठीक वेस्टमिंस्टर ज़िले के बीचों-बीच, जहाँ संसद स्थित है। शहर में घूमते हुए, जब मैं लंदन के मैजिक सर्कल ज़िले में वकील के तौर पर काम करने वाले एक दोस्त से मिलने गया, तो मैंने देखा कि व्हाइट-कॉलर कर्मचारी, सूट और कोट पहने हुए, ई-बाइक से अपने काम पर जा रहे थे | यह उस सोच को दिखाता है जो इस बदलाव के लिए ज़रूरी है। नीदरलैंड्स के निवर्तमान प्रधानमंत्री, मार्क रूटे का एक वीडियो, जिसमें वे दफ़्तर से निकलकर साइकिल से अपने घर जा रहे हैं, उस सामाजिक बदलाव की एक सशक्त मिसाल है जो सोच में बदलाव आने पर आखिरकार हासिल किया जा सकता है।
भारत में बुनियादी ढांचे का विकास हमेशा से ही जनता की जरूरतों के हिसाब से होता आया है। फिर भी, मौजूदा शहरी परिवहन व्यवस्था के केंद्र में कार बनाने वाली कंपनियों के हित ही सबसे ज़्यादा हावी हैं। मुंबई में सिर्फ कारों के लिए तटीय सड़कों का विकास और शहरों के भीतर कई रिंग रोड का निर्माण, इसके प्रमुख उदाहरण हैं। व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों की अपनी आवाजाही को लेकर सोच में आया बदलाव एक बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकता है, प्रदूषण को कम कर सकता है और उनके शहरों को ज़हरीले धुएँ (स्मॉग) में डूबने से बचा सकता है।

