

धनबाद के केंदुआडीह में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस रिसाव से तीन लोगों की मौत हो गई, जिससे झरिया कोलफील्ड की पुरानी समस्याएं फिर से उजागर हो गई हैं।
यह घटना बंद पड़ी पुटकी-बलिहारी कोलियरी से हुई, जहां भूमिगत आग और भू-धंसाव के कारण गैस सतह पर आ रही थी।
प्रशासन ने राहत कैंप लगाए हैं, लेकिन लोग स्थायी समाधान और सुरक्षित पुनर्वास की मांग कर रहे हैं।
विशेषज्ञों द्वारा स्थिति की निगरानी की जा रही है।
झारखंड के धनबाद के केंदुआडीह इलाके में दिसंबर 2025 से शुरू हुई कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) गैस रिसाव की यह त्रासदी झारखंड की कोयला खदानों की लंबे समय से चली आ रही काली विरासत को एक बार फिर उजागर कर रही है। केंदुआडीह, जो झरिया कोलफील्ड का हिस्सा है। झरिया कोलफील्ड की स्थापना 1894 में हुई, जब ब्रिटिश काल में कोयला खनन शुरू हुआ। 1916 में पहली भूमिगत आग की घटना दर्ज हुई, जो आज तक जारी है।
केंदुआडीह इलाके में बंद पड़ी भूमिगत कोलियरी से कार्बन मोनोऑक्साइड गैस का रिसाव शुरू हुआ। यह घटना भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की पुटकी-बलिहारी कोलियरी के बंद 13 और 14 नंबर सीम से जुड़ी थी, जो 15 साल से अधिक समय से बंद पड़ी है। भूमिगत आग (जो झरिया में 100 साल से जल रही है) और भू-धंसाव के कारण गैस जमा हो गई थी, और जमीन में दरारें पड़ने से यह सतह पर पहुंच रही थी।
3 दिसंबर 2025 को केंदुआडीह की राजपूत बस्ती में गैस रिसाव की पहली रिपोर्ट आई। रात में गैस इतनी घनी हो गई कि घरों के अंदर सांस लेना मुश्किल हो जाता केंदुआडीह गैस रिसाव की त्रासदी में तीन मौतें हुईं, लेकिन सभी का कारण एक ही – बंद पड़ी पुटकी-बलिहारी कोलियरी (13-14 नंबर सीम) से निकल रही जहरीली सीओ गैस।
केंदुआडीह में 3 और 4 दिसंबर 2025 को सीओ गैस रिसाव से पहले दो दिनों में दो मौतें हुईं—28 वर्षीय प्रियंका देवी (नया धौड़ा) 3 दिसंबर को और 58 वर्षीय ललिता देवी (राजपूत बस्ती) 4 दिसंबर को। दोनों मौतें दम घुटने से हुईं। सुरेंद्र कुमार सिंह (46 वर्ष) नया धौड़ा या राजपूत बस्ती में रहते थे। वे जनता मजदूर संघ के सदस्य थे। 30 दिसंबर सुबह उन्हें बेहोश पाया गया। परिवार ने अस्पताल पहुंचाया, जहां मौत हो गई।
लोकनाथ सिंह (सुरेंद्र सिंह के भाई) ने बताया कि उनके भाई सुरेंद्र सिंह 29 दिसंबर 2025 की रात सामान्य रूप से सोए थे, लेकिन सुबह परिवार ने उन्हें उठाने की कोशिश की तो वे नहीं उठे, शरीर में कोई हलचल नहीं थी। उन्हें तुरंत शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
उन्होंने आगे कहा कि गैस रिसाव 4 दिसंबर से ही शुरू हो गया था, लेकिन बाद में अचानक गैस ज्यादा निकलने लगी। खतरे को देखते हुए परिवार के सारे सदस्य तत्काल राहत कैंप में शिफ्ट हो गए थे और दूसरे जगह चले गए थे—बस सुरेंद्र सिंह अकेले घर में सोए रहे थे।
विस्थापन पर लोकनाथ सिंह ने कहा कि प्रशासन उन्हें बेलगड़िया टाउनशिप में पुनर्वास के लिए कह रहा है, लेकिन वहां कोई सुविधा नहीं है—यहां से बहुत दूर है, न रोजगार है, न शिक्षा। ऐसे में कैसे वहां चले जाएं? वे घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं और मांग कर रहे हैं कि पहले गैस रिसाव पूरी तरह बंद हो।
डॉ. अतरी गंगोपाध्याय (छाती रोग विशेषज्ञ) के मुताबिक, कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) गैस का सबसे बड़ा खतरा यही है कि यह पता नहीं चलता—यह रंगहीन और गंधहीन बेहद घातक होती है। कम मात्रा में भी यह बेहद खतरनाक है, क्योंकि यह शरीर में ऑक्सीजन की जगह ले लेती है। यह गैस हेमोग्लोबिन से मिलकर कार्बोक्सीहेमोग्लोबिन बनाती है, जो रक्त में ऑक्सीजन परिवहन को रोक देती है।
नतीजा: सिरदर्द, मतली, उल्टी, बेहोशी और अंत में मौत। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सीओ का सुरक्षित स्तर 9 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन केंदुआडीह में यह 1500 से 2000 पीपीएम तक पहुंच गया—यानी सामान्य सीमा से 30-40 गुना ज्यादा। इतना उच्च स्तर कुछ मिनटों में ही जानलेवा साबित हो सकता है।
डॉ. गंगोपाध्याय ने सुझाव दिया कि इस स्थिति को आपदा घोषित किया जाना चाहिए, ताकि आगे जान-माल का नुकसान रोका जा सके। तत्काल राहत, मॉनिटरिंग और प्रभावित लोगों की सुरक्षित शिफ्टिंग जरूरी है।
केंदुआडीह के स्थानीय निवासी रवि सिंह ने गैस रिसाव की स्थिति पर विस्तार से बताया कि वे मास्क पहनकर सो रहे थे, लेकिन फिर भी सिरदर्द और उल्टी हो रही थी। इस घटना से 40 घर सीधे प्रभावित हुए हैं। पूरे इलाके में करीब 5,000 लोग रहते हैं, जो गैस के खतरे से डरकर कहीं-कहीं शिफ्ट हो गए हैं या अन्य जगहों पर रहने लगे हैं।
उन्होंने कहा कि 5 दिसंबर 2025 से भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) ने राहत कैंप लगाना शुरू किया, जहां ज्यादातर लोग रहने लगे हैं। बीसीसीएल अधिकारी उन्हें विस्थापित (रिलोकेट) करना चाहते हैं, लेकिन रवि सिंह ने विरोध जताया कि उनका रोजगार इसी इलाके में है। बेलगड़िया जैसी जगह दूर है और वहां कोई सुविधा नहीं—न रोजगार, न शिक्षा। अगर विस्थापन करना ही है, तो सही जगह और बेहतर सुविधाओं के साथ किया जाए।
वे बोले कि रिसाव से सभी लोग डरे हुए हैं, कब फिर से गैस निकलेगी, यह पता नहीं। फिलहाल नाइट्रोजन गैस फिलिंग करके रिसाव को रोका गया है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। आज भी जो लोग यहां रह रहे हैं, वे लगातार डर में जी रहे हैं और स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।
प्रोजेक्ट ऑफिसर लखन लाल बर्नवाल ने बताया "हम मुख्य रूप से अंडरग्राउंड फायर को कंट्रोल करने पर काम कर रहे हैं। केंदुआडीह में हमने विशेषज्ञों से बातचीत की और उन्होंने नाइट्रोजन फिलिंग का सुझाव दिया। अभी तक हमने 6 टैंकर नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया है—प्रत्येक टैंकर में 14,000 लीटर लिक्विड नाइट्रोजन होता है। इसे बोरहोल के जरिए भरा जाता है।
लिक्विड नाइट्रोजन को बोरहोल में डालते ही वह गैस बन जाती है, जो ऑक्सीजन को हटाकर आग बुझाती है और जहरीली सीओ गैस के बाहर निकलने का दबाव कम कर देती है। स्थिति अभी सामान्य नहीं हुई है। गैस का प्रवाह कम-ज्यादा जारी है। हमारा लक्ष्य यही है कि यहां के लोगों को बेलगड़िया में विस्थापित किया जाए। विस्थापन और रोजगार के सवाल पर हमने सोचा है कि बेलगड़िया में कुटीर उद्योग स्थापित करने का विचार है, ताकि वहां लोगों को रोजगार मिल सके, लेकिन भूमिगत आग लगी ही हुई है और उसका फैलाव बढ़ रहा है।"
क्षेत्रीय सुरक्षा अधिकारी, बीसीसीएल ने बात करते हुए बताया कि "हम फिलहाल अंडरग्राउंड कंडीशन की डेली मॉनिटरिंग कर रहे हैं। हर दिन रिपोर्ट देखते हैं कि सीओ एमिशन (कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन) कम हो रहा है या नहीं। अंदर भूमिगत आग लगी हुई है, इसी वजह से सीओ गैस निकल रही है।
सुरक्षा की दृष्टि से हमने स्थानीय लोगों को फिलहाल राहत शिविर में रखा हुआ है। जो भी लोग एमिशन पॉइंट्स (गैस निकलने वाले मुख्य स्थानों) के पास रह रहे हैं, उनके घरों को मार्किंग कर दिया गया है और उन्हें वहां से हटा दिया गया है।
स्थायी समाधान के बारे में अभी आइआइटी-आईएसएम धनबाद, सीआईएमएफआर और पीएमआरसी प्राइवेट लिमिटेड के विशेषज्ञों द्वारा प्रभाव (इंपैक्ट) की स्टडी की जा रही है। वर्तमान में पीपीएम स्तर की बात करें तो अभी 1400 से 1600 पीपीएम तक पहुंच रहा है। जिसको कम करने की कोशिश की जा रही है।
यह त्रासदी झरिया की 100 साल पुरानी भूमिगत आग की कड़वी सच्चाई है। विकास की कीमत पर जीवन का बलिदान हो रहा है। प्रशासन और बीसीसीएल को अब वादों से आगे बढ़कर स्थायी समाधान निकालना होगा। गैस को जड़ से रोकना, सुरक्षित पुनर्वास सुनिश्चित करना और लोगों की आवाज सुनना।