रिवर्स बोरिंग से भूजल में अनुपचारित अपशिष्ट पहुंचा रही हैं कंपनियां: हिमालय नीति अभियान

बीबीएन क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ फिर सड़कों पर उतरे लोग, स्वतंत्र संस्थान से जांच की मांग
औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ नालागढ़ उपमंडल में जुटे लोग। फोटो: हिमालय नीति अभियान
औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ नालागढ़ उपमंडल में जुटे लोग। फोटो: हिमालय नीति अभियान
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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) क्षेत्र में जल, वायु प्रदूषण तथा भूजल के अत्यधिक दोहन के खिलाफ स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज 30 सितंबर 2026 को नालागढ़ उपमंडल मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया। स्थानीय लोगों का कहना था कि क्षेत्र में हो रहे खतरनाक, प्रदूषणकारी, अनियोजित और अनियमित औद्योगिकीकरण से मानव और पशु स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, साथ ही भूजल स्तर में गिरावट और वायु गुणवत्ता में कमी आ रही है। आरोप है कि कुछ औद्योगिक इकाइयां अनुपचारित अपशिष्ट रिवर्स बोरिंग के जरिए भूजल में पहुंचा रही हैं।

यह प्रदर्शन कई स्थानीय संगठनों और संघर्ष समितियों द्वारा आयोजित किया गया। इसमें 30 ग्राम पंचायतों के प्रधानों तथा जिला परिषद के पांच सदस्यों और पंचायत समिति सदस्यों ने भी हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों की ओर से हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन नालागढ़ के उपमंडल अधिकारी (एसडीएम) के माध्यम से सौंपा गया।

ज्ञापन में स्थानीय लोगों ने चार औद्योगिक इकाइयों-भारत स्पिरिट्स, किण्वन, हाइजेना लाइफ साइंसेज और शिवालिक सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़ी कथित पर्यावरणीय समस्याओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। ज्ञापन के मुताबिक, नालागढ़ क्षेत्र में अलग-अलग औद्योगिक इकाइयों से प्रभावित लोगों ने अपनी समस्याओं को लेकर अलग-अलग संघर्ष समितियां बनाई हैं और दो साल से अधिक समय से संबंधित विभागों और अधिकारियों के सामने शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कहीं पानी की समस्या है, कहीं लगातार दुर्गंध की शिकायत है, जबकि कुछ इलाकों में गंदे पानी और भूजल के लगातार इस्तेमाल को लेकर चिंता है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, इन मुद्दों को लेकर धरने और प्रदर्शन भी किए गए हैं।

ज्ञापन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि शिकायतकर्ताओं का उद्देश्य बिना जांच किसी उद्योग को दोषी ठहराना या उसे बंद करवाना नहीं है। उनकी मांग है कि क्षेत्र में उठाई जा रही पर्यावरणीय चिंताओं की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच हो, ताकि जमीन पर वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

पिछले दो वर्ष से औद्योगिक कंपनियों के खिलाफ लोग प्रदर्शन और ज्ञापन दे रहे हैं। फोटो: हिमालय नीति अभियान
पिछले दो वर्ष से औद्योगिक कंपनियों के खिलाफ लोग प्रदर्शन और ज्ञापन दे रहे हैं। फोटो: हिमालय नीति अभियान

स्वतंत्र संस्थान से जांच की मांग

स्थानीय लोगों की मांग है कि उनकी शिकायतों की जांच आईआईटी रुड़की जैसी राष्ट्रीय स्तर की तकनीकी संस्था अथवा आईआईटी, एनआईटी या सीएसआईआर स्तर की किसी स्वतंत्र संस्था से कराई जाए। जांच में भूजल, सतही जल, वायु प्रदूषण, दुर्गंध, औद्योगिक अपशिष्ट, मिट्टी और चारों इकाइयों के संयुक्त पर्यावरणीय प्रभाव को शामिल करने की मांग की गई है।

ज्ञापन में यह पता लगाने की मांग की गई है कि संबंधित फैक्ट्रियां वास्तव में कितना भूजल निकाल रही हैं और उनके कितने बोरवेल या ट्यूबवेल हैं। कंपनियों के स्थानों की जीपीएस मैपिंग, भूजल निकालने की अनुमति और वास्तविक निकासी के बीच अंतर तथा पिछले कम से कम तीन वर्षों के भूजल निकासी और पानी की खपत के आंकड़ों की भी जांच की मांग की गई है।

नदियों और जल स्रोतों की जांच की मांग

ज्ञापन में चिकनी खड्ड, महादेव खड्ड और सरसा नदी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम हिस्सों में पानी की गुणवत्ता की जांच कराने की मांग भी की गई है। इसके अलावा सभी फैक्ट्रियों के ड्रेन और संभावित डिस्चार्ज प्वाइंट की मैपिंग तथा भूजल, सतही जल, हवा, मिट्टी और औद्योगिक अपशिष्ट की स्वतंत्र एनएबीएल-मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से जांच कराने की मांग की गई है।

स्थानीय समितियों ने सभी इकाइयों के पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी), कंसेंट टू एस्टैब्लिश (सीटीई), कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) और भूजल संबंधी अनुमतियों की शर्तों के अनुपालन का ऑडिट कराने की भी मांग की है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग इकाइयों को लेकर समान प्रकृति की पर्यावरणीय शिकायतें सामने आ रही हैं, इसलिए इन्हें केवल अलग-अलग छोटी शिकायतों के रूप में देखने के बजाय पूरे क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्या के तौर पर जांचा जाना चाहिए।

ज्ञापन में कहा गया है कि यदि जांच में सभी औद्योगिक इकाइयां पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप पाई जाती हैं तो स्वतंत्र जांच से स्थानीय लोगों की आशंकाएं दूर होंगी। वहीं, यदि जांच में भूजल का अत्यधिक दोहन, बिना उपचारित या अपर्याप्त रूप से उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट, वायु प्रदूषण, दुर्गंध या अन्य पर्यावरणीय उल्लंघन सामने आते हैं तो संबंधित लोगों या इकाइयों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

…ऐसा विकास नहीं चाहिए

ज्ञापन में कहा गया है कि स्थानीय लोग उद्योगों और रोजगार के विरोध में नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास नहीं चाहते जिससे पीने का पानी, भूजल, हवा, खड्ड, नदियां, कृषि भूमि और लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो। ज्ञापन की प्रतियां हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव, पर्यावरण विभाग, हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उपायुक्त सोलन, संबंधित भूजल प्राधिकरण और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी भेजी गई हैं।

रिवर्स बोरिंग से भूजल प्रदूषित कर रही हैं इकाइयां

बीबीएन औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण और भूजल दोहन को लेकर हिमालय नीति अभियान ने गंभीर चिंता जताई है। अभियान के अनुसार, क्षेत्र में करीब 380 रेड श्रेणी और 1,400 से अधिक ऑरेंज श्रेणी की औद्योगिक इकाइयां हैं। संगठन का दावा है कि 500 से अधिक इकाइयां धुआं और गैसें छोड़ रही हैं तथा कुछ इकाइयां वैध कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) के बिना संचालित हो रही हैं।

हिमालय नीति अभियान संयोजक गुमान सिंह ने बद्दी के केंदूवाल स्थित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की क्षमता और संचालन पर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि कुछ उद्योग बिना उपचारित अपशिष्ट स्थानीय नालों और जलधाराओं में छोड़ रहे हैं या अवैध रिवर्स बोरवेल के जरिए भूजल में पहुंचा रहे हैं।

वायु में भारी धातुओं की मौजूदगी

उनका कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण का असर स्थानीय स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। संगठन के अनुसार, क्षेत्र में वायु नमूनों में पारा, सीसा, निकेल और कैडमियम जैसी भारी धातुओं तथा पार्टिकुलेट मैटर की मौजूदगी सामने आई है। उसने प्रदूषण से सांस, त्वचा और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ने का दावा किया है।

संगठन के मुताबिक सरसा नदी और चिकनी खड्ड समेत स्थानीय जल स्रोत औद्योगिक अपशिष्ट और अत्यधिक भूजल दोहन से प्रभावित हैं। उसका दावा है कि प्रदूषित जल सरसा के रास्ते पंजाब में प्रवेश कर अंततः सतलुज नदी तक पहुंचता है। इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच की मांग की गई है। हिमालय नीति अभियान के अनुसार, क्षेत्र में औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की निगरानी को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

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