

किसी समय प्राकृतिक जलस्रोतों के शुद्ध पानी वाला देहरादून शहर अब पानी के रूप में धीमा जहर पी रहा है। अत्यधिक क्लोरीन इस्तेमाल किये जाने से जहां वीआईपी क्षेत्रों का पानी कैंसर का खतरा पैदा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कई रिहायशी क्षेत्रों के पानी में टोटल कॉलीफॉर्म और फीकल कॉलीफॉर्म जैसे वैक्टीरिया की अधिकता पाई गई है। शहर के पानी में टीडीएस की मात्रा भी सामान्य से कई गुना ज्यादा है, जबकि पानी की कठोरता भी कई तरह की बीमारियों को आमंत्रण दे रही है।
उत्तराखंड राज्य में पानी और खाद्य वस्तुओं के नमूनों की जांच कर कई खुलासे करने वाली देहरादून की संस्था सोसायटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायर्नमेंटल कंजरवेशन साइंटिस्ट (स्पैक्स) ने इस बार देहरादून शहर के अलग-अलग हिस्सों से पीने के पानी के कुल 97 नमूने लेकर अपनी केन्द्र सरकार से मान्यता प्राप्त लैब में उनका परीक्षण किया। इनमें से 94 नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे।
रिपोर्ट के 41 क्षेत्रों के पानी में क्लोरीन की मात्रा निर्धारित मानक से ज्यादा पाई गई, उनमें राज्य सचिवालय, कई मंत्रियों के आवास, जिलाधिकारी आवास, जिला जज आवास आदि शामिल हैं। इसके विपरीत 50 अलग-अलग क्षेत्रों के पानी के नमूनों में क्लोरीन मिला ही नहीं। यानी इस क्षेत्रों में बिना क्लोरीन का पानी सप्लाई किया जा रहा है। ये सभी क्षेत्र घनी आवासीय बस्तियां हैं, जहां शहर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रह रहा है। उल्लेखनीय है कि मानक से ज्यादा क्लोरीन अल्सर और पेट की बीमारियों के साथ कैंसर का कारण भी बन सकता है।
देहरादून के पानी के खतरनाक वैक्टीरिया टोटल कॉलीफॉर्म और फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा भी सामान्य से कई गुना ज्यादा पाई गई है। पानी में टोटल कॉलीफॉर्म की सामान्य मात्रा 10 मोस्ट प्रोपेबल नंबर (एमपीएन) प्रति लीटर होती है, लेकिन देहरादून में कई जगहों पर टोटल कॉलीफॉर्म की मात्रा 52 एमपीएन प्रति 100 मिमी तक पाई गई है।
स्पैक्स की रिपोर्ट बताती है कि सहस्रधारा रोड के पानी के सैंपल में टोटल कॉलीफॉर्म की मात्रा 52 एमएनपी प्रति 100 मिली तक पाई गई है। इसके अलावा बंजारा बस्ती, केवल विहार, भंडारी बाग, संजय कॉलोनी और पटेलनगर जैसी बस्तियों की पानी में टोटल कॉलीफॉर्म चिन्ताजनक स्तर तक पाया गया है।
यही स्थिति पानी में मौजूद फीकल कॉलीफॉर्म वैक्टीरिया की भी है। यह वैक्टीरिया पेट संबंधी अनेक बीमारियां, दस्त, पीलिया, उल्टी और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। देहरादून के पानी में फीकल वैक्टीरिया की मौजूदगी 2 से 14 एमएनपी प्रति 100 मिली तक पाई गई है।
इसके अलावा देहरादून के पानी में टीडीएस की मात्रा 251 मिग्री प्रति लीटर से 470 मिग्रा प्रति लीटर तक पाई गई है। जो सामान्य स्तर से कई गुना ज्यादा है। किडनी स्टोन, लीवर, किडनी, आंखों, हड्यिों के जोड़ों आदि पर असर डालने के लिए जिम्मेदार पानी की कठोरता भी देहरादून के पानी में सामान्य से कई गुना ज्यादा पाई गई है। पानी की कठोरता खाना बनाने में देरी, पाइप लाइन चोक होने और एलपीजी व बिजली की खपत बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार होती है।
सोसायटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एन्वायर्नमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट (स्पैक्स) के सचिव डॉ. बृजमोहन का कहना है पानी के नमूनों की जांच की रिपोर्ट साफ करती है कि देहरादून में एक तरफ जहां वीआईपी के आवासों में सप्लाई किये जाने वाले पानी में निर्धारित मानक से कई गुना ज्यादा क्लोरीन मिलाकर इस पानी को स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहर के एक बड़े हिस्से में दिये जा रहे पानी का क्लोरीनेशन किया ही नहीं जा रहा है।
इस तरह से दोनों स्थितियां स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। वे कहते हैं पिछले कुछ वर्षों में देहरादून रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) का चलन तेजी से बढ़ा है। वीआईपी से लेकर सामान्य नागरिकों तक ने अपने घरों में आरओ लगा दिया है। यह आम धारणा बन गई है कि आरओ का पानी पीने के लिए पूरी तरह से सुरक्षित होता है और इस पानी को पीने से जल जनित बीमारियों का कोई खतरा नहीं होता। लेकिन, वे विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी की गई चेतावनी का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि आरओ का पानी स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
आरओ से पानी में मौजूद वैक्टीरिया तो बेशक खत्म हो जाता है, लेकिन इसके साथ ही आरओ पानी में मौजूद शरीर के लिए जरूरी लवण और कैल्सियम व मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों को भी समाप्त कर देता है। डॉ. शर्मा कहते हैं कि बाजार में मौजूद किसी वाटर फिल्टर को भी कोई सरकारी विभाग अथवा जिम्मेदार एजेंसी की ओर से मान्यता नहीं दी गई है। ऐसे में देहरादून में जल जनित बीमारियों से बचने का सिर्फ एक ही तरीका है कि पानी को उबालकर पिया जाए।
स्पैक्स का कहना है कि अपनी यह सालाना रिपोर्ट वह सीएम और सबंधित मंत्रियों व अधिकारियों को भी भेज रही है, ताकि लोगों को स्वच्छ पानी देने की दिशा में कदम उठाये जाएं। उनकी जानकारी में फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है, जो लोगों को साफ पानी देने का आश्वासन देती हो। डॉ. शर्मा के अनुसार देहरादून के पानी में वैक्टीरिया की अधिकता का सबसे बड़ा कारण पाइप लाइनों के पिन होल हैं। इसके अलावा सीवर लाइन की लीकेज और पीने के पानी की लाइन और सीवर लाइन का साथ-साथ चलना भी इसका बड़ा कारण है।