एआई की दौड़ से 2050 तक पैदा हो सकता 61.7 करोड़ टन ई-कचरा

सिर्फ सर्वर और जीपीयू नहीं, एआई के पूरे बुनियादी ढांचे से निकलने वाले कचरे की सुनामी
एआई का कचरा ई-वेस्ट की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है
एआई का कचरा ई-वेस्ट की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता हैफोटो साभार: आईस्टॉक
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के तेजी से विस्तार के साथ दुनिया के सामने ई-कचरे की एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है। एआई के लिए बनाए जा रहे डेटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाले सर्वर, जीपीयू, नेटवर्किंग उपकरण, बिजली और कूलिंग से जुड़े सिस्टम आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में कबाड़ में बदल सकते हैं।

पर्यावरण संगठन बेसल एक्शन नेटवर्क (बीएएन) के नए आकलन के मुताबिक, 2025 से 2050 के बीच एआई से जुड़े 39.5 करोड़ से 61.7 करोड़ मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस्तेमाल से बाहर हो सकते हैं। बीएएन का कहना है कि यह अनुमान पहले लगाए गए अनुमानों से काफी बड़ा है। इसकी वजह यह है कि पहले के आकलनों में मुख्य रूप से एआई सर्वर और जीपीयू जैसे उपकरणों पर ध्यान दिया गया था। नए आकलन में एआई डेटा सेंटर के पूरे बुनियादी ढांचे को शामिल किया गया है। बीएएन के मुताबिक, 2030 तक हर साल करीब 86 लाख से 1.31 करोड़ टन एआई से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कचरे में बदल सकते हैं।

एआई का कचरा सिर्फ सर्वर और जीपीयू नहीं

एआई के पर्यावरणीय प्रभाव की चर्चा अक्सर बिजली और पानी की खपत या सर्वर और जीपीयू की संख्या तक सीमित रहती है। लेकिन बीएएन का आकलन बताता है कि तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एक एआई डेटा सेंटर में सर्वर और जीपीयू जैसे त्वरक उपकरण कुल उपकरणों के वजन का करीब 13 प्रतिशत ही होते हैं। बाकी में नेटवर्किंग उपकरण, बिजली आपूर्ति और वितरण से जुड़े सिस्टम, कूलिंग सिस्टम और बैकअप बिजली व्यवस्था जैसे उपकरण शामिल होते हैं। इसका मतलब है कि एआई की क्षमता बढ़ने के साथ केवल कंप्यूटिंग चिप ही कचरे में नहीं बदलेंगी। उन्हें चलाने वाला पूरा भौतिक ढांचा भी धीरे-धीरे ई-कचरे का हिस्सा बन सकता है। बीएएन का मानना है कि एआई उपकरणों की तेजी से बदलती तकनीक इस समस्या को और बढ़ा सकती है। नई और ज्यादा शक्तिशाली चिप आने पर पुराने उपकरण जरूरी नहीं कि खराब हों, फिर भी वे बड़े एआई सिस्टम के लिए कम उपयोगी हो सकते हैं।

उपकरणों की घटती उम्र

एआई क्षेत्र में कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने की होड़ के कारण नए उपकरण तेजी से बाजार में आ रहे हैं। ऐसे में पुराने उपकरणों को उनके पूरी तरह खराब होने से पहले ही बदलने की जरूरत पड़ सकती है। इससे ई-कचरे की मात्रा बढ़ सकती है और साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि पुराने उपकरणों का आगे क्या किया जाए। उन्हें दोबारा इस्तेमाल करना, मरम्मत करना या उनमें मौजूद उपयोगी पदार्थों को वापस हासिल करना नए संसाधनों की मांग को कम कर सकता है। लेकिन अगर इन्हें सीधे कचरे के रूप में छोड़ दिया जाता है, तो पर्यावरण पर दबाव बढ़ेगा। ई-कचरे में मौजूद सीसा, पारा और दूसरे खतरनाक पदार्थ गलत तरीके से निपटाए जाने पर मिट्टी, पानी और मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

पुराने सर्वर में डेटा का खतरा

एआई से निकलने वाले पुराने उपकरणों की समस्या का एक दूसरा पहलू डेटा सुरक्षा है।
डेटा सेंटर से हटाए गए सर्वर, भंडारण उपकरण और नेटवर्किंग प्रणालियों में कंपनियों की गोपनीय जानकारी, सिस्टम की संरचना, लॉगिन जानकारी और दूसरी संवेदनशील सूचनाएं मौजूद हो सकती हैं। इसलिए किसी उपकरण को डेटा सेंटर से बाहर निकाल देना उसकी सुरक्षा प्रक्रिया का अंत नहीं है। आईटी एसेट डिस्पोजल क्षेत्र की कंपनी री-टेक की मुख्य रणनीति अधिकारी लिंडा ली के मुताबिक, रिवर्स सप्लाई चेन में आने वाले हर उपकरण को पहले डेटा सुरक्षा के नजरिए से देखना चाहिए। उनका कहना है कि कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उपकरण सुरक्षित निगरानी में रहें, उनमें मौजूद डेटा उचित प्रक्रिया के तहत मिटाया जाए और पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

ई-कचरे की आवाजाही भी चुनौती

एआई से निकलने वाले पुराने उपकरणों की मात्रा बढ़ने पर सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि उनका पुनर्चक्रण कैसे किया जाए। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ये उपकरण आखिर कहां पहुंचते हैं और वहां उनका निपटान किस तरह होता है। बीएएन लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक कचरे की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और उसके गलत निपटान पर नजर रखता रहा है। संगठन ने पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आवाजाही पर निगरानी के लिए जीपीएस आधारित अध्ययन भी किए हैं। यह मुद्दा एआई के पुराने उपकरणों के मामले में और महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि बड़ी मात्रा में पुराने सर्वर और दूसरे उपकरण ऐसे देशों में पहुंचते हैं जहां पुनर्चक्रण की निगरानी कमजोर है, तो इससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
इसके अलावा, ऐसे उपकरणों में मौजूद डेटा की सुरक्षा भी एक चुनौती बनी रह सकती है।

भारत में पहले से ही ई-कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में देश में एआई डेटा सेंटरों और उनसे जुड़े बुनियादी ढांचे का विस्तार होने पर भविष्य में एआई से जुड़े ई-कचरे का सवाल भी महत्वपूर्ण होगा। खासकर यह देखना जरूरी होगा कि पुराने सर्वर, जीपीयू, नेटवर्किंग उपकरण और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान का इस्तेमाल बंद होने के बाद उनका क्या होता है।
क्या उन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जाता है? क्या उनके उपयोगी हिस्से निकाले जाते हैं? क्या उनका सुरक्षित तरीके से पुनर्चक्रण होता है? या फिर वे ऐसे कचरा बाजार में पहुंच जाते हैं जहां पर्यावरण और कामगारों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं? इन सवालों के जवाब एआई के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण होंगे।

एआई की कीमत सिर्फ बिजली और पानी नहीं

एआई के पर्यावरणीय असर पर अब तक हुई चर्चा मुख्य रूप से डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की जरूरत पर केंद्रित रही है। लेकिन बीएएन का नया आकलन दिखाता है कि एआई के पूरे जीवनचक्र को देखना जरूरी है। एआई के लिए जरूरी उपकरणों के निर्माण में कच्चे माल और ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। फिर उन्हें डेटा सेंटरों में लगाया जाता है और कुछ वर्षों बाद नई तकनीक आने पर बदल दिया जाता है। इसके बाद उन उपकरणों का पुन: उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण या निपटान होता है। इस पूरी श्रृंखला में अगर किसी एक चरण की अनदेखी होती है, तो एआई के पर्यावरणीय पदचिह्न का सही आकलन नहीं हो सकता।
बीएएन का अनुमान बताता है कि 2025 से 2050 के बीच एआई से जुड़े सैकड़ों करोड़ किलोग्राम उपकरण इस्तेमाल से बाहर हो सकते हैं। यह पैमाना इतना बड़ा है कि अभी से यह सोचना जरूरी है कि इस कचरे को सुरक्षित तरीके से कैसे संभाला जाएगा।
एआई को अक्सर एक डिजिटल और लगभग अदृश्य तकनीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन इसके पीछे सर्वर, चिप, नेटवर्क, बिजली और कूलिंग का एक विशाल भौतिक ढांचा मौजूद है।
एआई की असली पर्यावरणीय कीमत समझने के लिए इस ढांचे के आखिरी पड़ाव यानी ई-कचरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

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