

विश्व सुनामी जागरूकता दिवस 2026 आज मनाया जा रहा है, इस बार व्यक्तिगत और सामुदायिक तैयारी पर विशेष जोर दिया गया है।
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2015 में पांच नवंबर को विश्व सुनामी जागरूकता दिवस घोषित किया था, ताकि आपदा से बचाव बढ़े।
समुद्री भूकंप, भूस्खलन और ज्वालामुखी विस्फोट सुनामी के प्रमुख कारण हैं, जो तटीय इलाकों में भारी तबाही मचा सकते हैं।
साल 2004 की हिंद महासागर सुनामी के बाद भारत ने मजबूत चेतावनी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में कदम उठाए।
हैदराबाद स्थित भारतीय सुनामी चेतावनी केंद्र चौबीसों घंटे समुद्री हलचलों पर नजर रखता है और समय पर चेतावनी जारी करता है।
समुद्र की लहरें जितनी खूबसूरत दिखाई देती हैं, उनका विकराल रूप उतना ही विनाशकारी हो सकता है। कुछ ही मिनटों में समुद्र की विशाल लहरें तटीय बस्तियों को तबाह कर सकती हैं, घरों को बहा सकती हैं और हजारों जिंदगियों को निगल सकती हैं। सुनामी एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन समय रहते तैयारी और सही जानकारी से इसके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसी संदेश के साथ आज, पांच नवंबर को विश्व सुनामी जागरूकता दिवस 2026 मनाया जा रहा है।
इस साल की थीम 'सुनामी के लिए तैयार रहें: लचीलापन आपसे शुरू होता है'। यह थीम बताती है कि आपदा से मुकाबला केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। हर व्यक्ति, परिवार और समुदाय की सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है।
संयुक्त राष्ट्र की पहल से शुरू हुआ जागरूकता अभियान
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने दिसंबर 2015 में प्रस्ताव ए/आरईएस/70/203 के माध्यम से पांच नवंबर को विश्व सुनामी जागरूकता दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य दुनिया भर में सुनामी के खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों को प्रोत्साहित करना है।
इस साल की थीम पिछले साल की तैयारियों और निवेश पर आधारित है। अब जोर इस बात पर है कि चेतावनी मिलने के बाद लोग कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र के सेंडाई फ्रेमवर्क, 'अर्ली वार्निंग्स फॉर ऑल' अभियान और यूनेस्को के अंतरसरकारी समुद्र विज्ञान आयोग (यूनेस्को-आईओसी) के 'सुनामी रेडी कार्यक्रम' से भी जुड़ी है।
क्या है सुनामी और कैसे आती है?
सुनामी समुद्र में अचानक बड़ी मात्रा में पानी के विस्थापन से पैदा होने वाली विशाल लहरों की एक शृंखला है। यह सामान्य समुद्री लहरों से बिल्कुल अलग होती है। खुले समुद्र में इसकी गति बहुत तेज हो सकती है और यह पूरे महासागर को पार कर सकती है। तट के पास पहुंचने पर इसकी ऊंचाई और विनाशकारी क्षमता बढ़ सकती है।
'सुनामी' शब्द जापानी भाषा के दो शब्दों 'त्सु' यानी बंदरगाह और 'नामी' यानी लहर से मिलकर बना है।
सुनामी का सबसे आम कारण समुद्र के भीतर आने वाले शक्तिशाली भूकंप हैं। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से समुद्र तल अचानक ऊपर या नीचे खिसक जाता है। इसके अलावा समुद्र के भीतर या तट के पास भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट और समुद्र में उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह के गिरने से भी सुनामी पैदा हो सकती है।
2004 की त्रासदी ने भारत को सिखाया बड़ा सबक
भारत का समुद्री तट लंबा है और हिंद महासागर से जुड़े कई तटीय इलाके सुनामी के खतरे का सामना करते हैं। 26 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में आई विनाशकारी सुनामी ने भारत सहित कई देशों में भारी तबाही मचाई थी। हजारों लोगों की जान गई और तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हुई।
इस त्रासदी ने साफ कर दिया कि समुद्री आपदाओं से बचने के लिए केवल राहत और बचाव व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। एक मजबूत और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणाली भी जरूरी है।
भारत का सुनामी चेतावनी तंत्र
2004 की आपदा के बाद भारत सरकार ने हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस) में भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र (आईटीईडब्ल्यूसी) स्थापित किया। यह केंद्र पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन काम करता है और 15 अक्टूबर 2007 से लगातार 24 घंटे सक्रिय है।
यह केंद्र समुद्र के भीतर आने वाले संभावित सुनामी पैदा करने वाले भूकंपों और समुद्र के जलस्तर में होने वाले बदलावों पर नजर रखता है। इसके आधार पर संबंधित प्रशासन और संवेदनशील तटीय समुदायों को समय रहते चेतावनी और सलाह दी जाती है। इसका मकसद लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के लिए जरूरी समय देना है।
चेतावनी से ज्यादा जरूरी है सही प्रतिक्रिया
सुनामी के खतरे को कम करने में तकनीक की अहम भूमिका है, लेकिन केवल चेतावनी प्रणाली पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। समुद्र में अचानक असामान्य हलचल दिखना, पानी का तेजी से पीछे हटना या तेज भूकंप महसूस होना संभावित खतरे के प्राकृतिक संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में आधिकारिक चेतावनी का इंतजार किए बिना समुद्र तट से दूर और ऊंचे स्थान की ओर जाना चाहिए।
तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को निकासी मार्गों, सुरक्षित स्थानों और स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं की जानकारी होनी चाहिए। स्कूलों, गांवों और शहरी बस्तियों में नियमित मॉक ड्रिल भी जरूरी है।
तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव
विश्व सुनामी जागरूकता दिवस 2026 का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है- आपदा आने के बाद सोचने के बजाय पहले से तैयार रहना होगा। सरकार की चेतावनी प्रणाली, प्रशासन की सक्रियता और आम नागरिकों की जागरूकता जब एक साथ काम करेंगे, तभी तटीय समुदाय सुरक्षित बनेंगे।
समुद्र की लहरों को रोकना इंसान के हाथ में नहीं है, लेकिन उनके खतरे को समझना और समय रहते कदम उठाना जरूर हमारे हाथ में है। आखिरकार, सुनामी से सुरक्षा की पहली सीढ़ी जागरूकता है और असली मजबूती की शुरुआत हर व्यक्ति से होती है।