धराली में मोड़ा जा रहा है खीर गंगा नदी का मार्ग, वैज्ञानिकों ने चेताया यह नई आपदा को दे सकता है जन्म

विशेषज्ञों ने 1866 में ब्रिटिश फोटोग्राफर सैमुअल बॉर्न द्वारा ली गई तस्वीर का हवाला देते हुए कहा है कि ऐतिहासिक रूप से भी खीर गंगा मंदिर के पश्चिम की ओर बहती थी
त्रासदी के ढाई माह बाद धराली की तस्वीर, फोटो: प्रदीप सती
त्रासदी के ढाई माह बाद धराली की तस्वीर, फोटो: प्रदीप सती
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उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 को आई आपदा ने सिर्फ घर, होटल और सड़कें ही नहीं बहाईं थी बल्कि हिमालयी नदियों को “कंट्रोल” करने की विकास नीति पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। आपदा के बाद खीर गंगा नदी ने अपना रास्ता बदलते हुए पश्चिम दिशा की ओर नया प्रवाह मार्ग बना लिया था। लेकिन अब सरकार उसे दोबारा पुराने रास्ते में मोड़ने के लिए कृत्रिम चैनल बना रही है। भू-वैज्ञानिक और पर्यारवणकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह समाधान नहीं बल्कि भविष्य में एक नई आपदा को न्यौता देने जैसा है।

हिमालयी ग्लेशियर से निकलने वाली खीर गंगा नदी अभी 2025 की आपदा के बाद पश्चिम दिशा में बह रही है जो अंततः भागीरथी नदी से मिलती है। इससे पहले 2013 में यह पूर्व दिशा में एक बनाए गए कृत्रिम चैनल से गुजर रही थी। फिर से नदी को इसी मार्ग पर लाने की तैयारी हो रही है। एक स्थानीय अखबार के मुताबिक, सीमा सड़क संगठन की ओर से 300 मीटर का यह चैनल तैयार किया जा चुका है।

भू-वैज्ञानिक नवीन जुयाल और पर्यावरण शोधकर्ता हेमंत ध्यानी ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ भेजे गए पत्र के जरिए चेताया है कि नाजुक हिमालय में नदी मोड़ की यह प्रक्रिया विनाशकारी साबित हो सकती है।

जुयाल और ध्यानी की ओर से भेजे गए पत्र चैनलाइजिंग द ग्लेशियल फेड रिवर्स : एनसुयरिंग सेफ्टी ऑफ इनहैंसिंग वलनरेबिलिटी ? की संयुक्त टिप्पणी में कहा गया है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों की नदियों को कृत्रिम चैनलों में बांधने की नीति भविष्य में आपदाओं का खतरा और बढ़ा सकती है। दोनों विशेषज्ञों का कहना है कि “उच्च हिमालयी नदियां अत्यधिक मलबा और बोल्डर ढोती हैं। ऐसे में कठोर संरचनाएं टिकाऊ समाधान नहीं हैं। प्रकृति लचीले और टिकाऊ नदी प्रबंधन को ही स्वीकार करती है।”

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही संवेदनशीलता

रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पहले से ही भूस्खलन, भूकंप, कमजोर चट्टानों और तेज कटाव के कारण अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालय में एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग (ईडीडब्ल्यू) के कारण तापमान भारतीय मैदानी इलाकों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। इसका असर ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, ग्लेशियल झीलों के विस्तार और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जमी हुई सतहों के कमजोर होने के रूप में दिख रहा है। उनका कहना है कि इसी कारण हाल के वर्षों में हिमस्खलन, मलबे का बहाव, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। 5 अगस्त 2025 का धराली हादसा भी इसी व्यापक जलवायु संकट का हिस्सा है।

कैसे बदला खीर गंगा का रास्ता

रिपोर्ट के अनुसार खीर गंगा एक ग्लेशियर-जनित धारा है, जो लगभग 7.5 किलोमीटर लंबी खड़ी घाटी से गुजरकर भागीरथी नदी में मिलती है। 5 अगस्त 2025 को दोपहर से शाम तक लगातार कई चरणों में भारी मलबे का बहाव आया। इसमें 10 से 15 मीटर तक मोटा मलबा जमा हुआ, जिसमें बोल्डर, बजरी और ग्लेशियर से आए अवसाद शामिल थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह मलबा ऊपरी हिस्सों में मौजूद अस्थिर मोरेन रिज से नीचे आया। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार उस दौरान केवल 8–10 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई थी। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि बर्फ और ग्लेशियर पर हुई वर्षा ने संभवतः बर्फ की परत को तोड़ा, जिससे नीचे मौजूद संतृप्त अवसाद और बोल्डर तेजी से बह निकले।

नदी ने अपना प्राकृतिक रास्ता चुना

रिपोर्ट के अनुसार शुरुआत में डेब्रिस फ्लो उस कृत्रिम चैनल में घुसा जिसे 2013 के बाद खीर गंगा को पूर्व दिशा में मोड़ने के लिए बनाया गया था। लेकिन जब चैनल मलबे से भर गया तो बाद के बहाव पश्चिम दिशा की ओर मुड़ गए और एक सहायक धारा के रास्ते भागीरथी में मिलने लगे। आपदा के बाद से खीर गंगा लगातार इसी पश्चिमी मार्ग से बह रही है। विशेषज्ञों ने 1866 में ब्रिटिश फोटोग्राफर सैमुअल बॉर्न द्वारा ली गई तस्वीर का हवाला देते हुए कहा है कि ऐतिहासिक रूप से भी खीर गंगा मंदिर के पश्चिम की ओर बहती थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय लोगों की मौखिक स्मृतियां भी इसी बात की पुष्टि करती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि नदी को पूर्व दिशा में कब और कैसे मोड़ा गया, लेकिन 2013 की आपदा के बाद सिंचाई विभाग द्वारा बनाए गए आरसीसी बंड ने नदी को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया।

2013 के बाद बढ़ा निर्माण

रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2013 की आपदा के बाद सिंचाई विभाग ने खीर गंगा के किनारे आरसीसी दीवार बनाई थी ताकि मलबा बस्तियों तक न पहुंचे।
लेकिन इस दीवार ने “झूठी सुरक्षा भावना” पैदा की, जिसके बाद नदी के बेहद करीब होटल और अन्य निर्माण होने लगे।

विशेषज्ञों ने कहा है कि यह निर्माण 7 अक्टूबर 2016 की उस अधिसूचना का उल्लंघन है, जिसे जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने जारी किया था। अधिसूचना के सेक्शन 6.3 में स्पष्ट कहा गया है कि गंगा, उसकी सहायक नदियों, तटों और सक्रिय बाढ़क्षेत्र में किसी भी प्रकार का स्थायी या अस्थायी निर्माण नहीं किया जा सकता।

अब फिर नदी को मोड़ने की कोशिश

रिपोर्ट के अनुसार अब सरकार लगभग 300 मीटर लंबा नया चैनल बनाकर खीर गंगा को दोबारा उसके “पूर्व-5 अगस्त 2025” वाले रास्ते में मोड़ने का प्रयास कर रही है। इसका तर्क यह दिया जा रहा है कि वर्तमान धारा कृषि भूमि से होकर गुजर रही है। लेकिन नवीन जुयाल और हेमंत ध्यानी ने इस कदम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि डेब्रिस फ्लो क्षेत्रों में नदी को जबरन पुराने रास्ते में भेजना भू-आकृतिक संतुलन बिगाड़ सकता है।

वैज्ञानिकों की प्रमुख चिंताएं

विशेषज्ञों ने कई संभावित खतरों की ओर इशारा किया है। डेब्रिस फ्लो सतहों पर नदी मोड़ने से कहीं अत्यधिक कटाव और कहीं भारी अवसादन हो सकता है। नदी अचानक फिर नया रास्ता चुन सकती है, जिससे नई जगहों पर खतरा पैदा होगा। चैनलाइजेशन से बहाव की गति और दबाव बढ़ता है, जिससे भूस्खलन और ढलानों की अस्थिरता बढ़ सकती है। ग्लेशियर-जनित नदियों में अचानक आने वाले बहाव कृत्रिम चैनलों को तोड़ सकते हैं। चैनलाइज्ड धाराएं अधिक केंद्रित मलबा लाती हैं, जिससे बाढ़ का विनाश बढ़ सकता है।

कानून और पर्यावरणीय नियमों पर भी सवाल

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तराखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट, 2012 में सहायक नदियों को भी “नदी” की श्रेणी में रखा गया है और बाढ़क्षेत्र सीमांकन को अनिवार्य बताया गया है। इसके अलावा, भगीरथी इको सेंसिटिव जोन अधिसूचना की धारा 2.5 में कहा गया है कि किसी भी विकास योजना को “वाटरशेड आधारित दृष्टिकोण” पर आधारित होना चाहिए और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। विशेषज्ञों का आरोप है कि इन नियमों का पालन किए बिना नदी को मोड़ने की कोशिश की जा रही है।

नदियों को नहीं, मानव हस्तक्षेप को नियंत्रित करें

रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि खीर गंगा को उस नए प्राकृतिक मार्ग पर बहने देना अधिक उचित होता, जिसे उसने 5 अगस्त 2025 की घटना के बाद स्वयं अपनाया। नवीन जुयाल और हेमंत ध्यानी ने लिखा है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्राथमिकता नदियों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि मानव हस्तक्षेप को सीमित करना होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि केदारनाथ और बदरीनाथ घाटियों में भी इसी तरह की चैनलाइजेशन परियोजनाएं चल रही हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में, जब ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) और डेब्रिस फ्लो की घटनाएं बढ़ रही हैं, तब ऐसी परियोजनाएं आपदा जोखिम कम करने के बजाय उसे और बढ़ा सकती हैं।

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