बिहार 2024 की विनाशकारी बाढ़ : सर्वेक्षण में पाया गया 38 फीसदी नुकसान अकेले सात जिले के 2200 परिवारों का
उत्तर भारत में बाढ़ की विभीषिका हर साल एक बड़ी आबादी को गहरा चोट पहुंचाकर जाती है लेकिन कई पीड़ितों में शामिल नहीं होते, न ही उनके नुकसान या क्षति का सही आकलन होता है। बाढ़ पीड़ितों को विस्थापित होना पड़ता है, अपनी जमापूंजी गिरवी रखनी पड़ती है और खाना तक छोड़ देना पड़ता है। यह सबकुछ सरकारी अनुमानों से बिल्कुल अलग होता है। उत्तर बिहार में 2024 की बाढ़ भी ऐसी ही विनाशकारी रही। घर-घर जाकर किए गए एक फील्ड सर्वे रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि उत्तर बिहार के सात जिलों में 2290 परिवारों को बाढ़ से कुल 126.3 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जिसमें परिवारों को भूखे-प्यासे रहना पड़ा और अपनी जमा-पूंजी गिरवी तक रखनी पड़ी।
बाढ़ की क्षति का अनुमान मेघ पाइन अभियान ने टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से किए गए एक हाउसहोल्ड-लेवल फ्लड लॉस एसेसमेंट 2024 शीर्षक वाली रिपोर्ट का है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में सरकारी अनुमान के मुताबिक कुल आर्थिक नुकसान 327.06 करोड़ रुपए का है जबकि सर्वेक्षण बताता है कि महज सात जिलों में 2290 परिवार के सर्वेक्षण में शामिल 8685 लोग अकेले इस आर्थिक नुकसान का 38 फीसदी (126.3 करोड़ रुपए) हिस्सेदारी करते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, आपदा प्रबंधन विभाग (डीएमडी) द्वारा 23 जून, 2025 को जारी फॉर्म 9 के अनुसार, 2024 की बाढ़ ने कुल 38 जिलों में से 27 जिलों को प्रभावित किया, जिससे 36,632 गांवों में 56.38 लाख लोग प्रभावित हुए। विनाश का पैमाना अत्यधिक था, प्रभावित क्षेत्रों की लगभग 97 फीसदी कृषि भूमि क्षतिग्रस्त हुई, जिसमें से 70 फीसदी जमीन पर खेती की जा रही थी। कुल 10,135 घर नष्ट हुए या रहने के अनुकूल नहीं रहे और 19 लोगों तथा 53 पशुओं की मौतें आधिकारिक रूप से दर्ज की गईं। फसल नुकसान की आर्थिक हानि का अनुमान 306.19 करोड़ और घर व पशुशाला के नुकसान का 20.87 करोड़ रुपए लगाया गया। इन दोनों प्रकार के नुकसान के अंतर्गत 27 जिलों में विभिन्न तीव्रता का प्रभाव देखा गया, जिससे कुल आर्थिक नुकसान 327.06 करोड़ रुपए का हुआ।
मेघपाईन की 8,685 लोगों की हाउसहोल्ड सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति परिवार औसत नुकसान 5.51 लाख रुपये बैठता है, लेकिन रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि औसत वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दिखाता। मध्य नुकसान 2.11 लाख रुपये है और मध्य 50 प्रतिशत परिवारों का नुकसान 1.17 लाख से 4.93 लाख रुपये के बीच केंद्रित है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में उत्तर भारत की बाढ़ केवल नदी के उफान का नतीजा नहीं थी। सितंबर 2024 के अंतिम सप्ताह में हुई भारी बारिश ने गंडक, बागमती, कोसी और महानंदा बेसिन में एक साथ बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। कई जगह एम्बैंकमेंट टूटे। कहीं पानी दो तटबंधों के बीच फंस गया और कई इलाकों में जलनिकासी पूरी तरह ठप हो गई। रिपोर्ट इस स्थिति को कंपाउंड फ्लड बताती है, जिसमें अलग-अलग बाढ़ प्रक्रियाएं एक साथ काम करती हैं और जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
सर्वेक्षण में पाया गया कि नुकसान की संरचना सरकारी आकलनों से अलग तस्वीर पेश करती है। कुल 126.3 करोड़ रुपये के नुकसान में सबसे बड़ा हिस्सा भूमि क्षति का है। रिपोर्ट के अनुसार भूमि से जुड़ा नुकसान 55.4 करोड़ रुपये रहा, जो कुल नुकसान का 47.2 प्रतिशत है। इसके बाद मकानों की मरम्मत और संरचनात्मक क्षति का नुकसान 42.0 करोड़ रुपये यानी 36.2 प्रतिशत दर्ज किया गया। घरेलू सामान, रसोई के बर्तन, कपड़े और छोटे उपकरणों का नुकसान घटनाओं की संख्या में अधिक है, लेकिन कुल मूल्य में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही। यह दर्शाता है कि बाढ़ सबसे पहले रोजमर्रा की जिंदगी को बाधित करती है, लेकिन लंबे समय की आजीविका पर सबसे गहरा असर जमीन और घर के नुकसान से पड़ता है।
तटबंध नहीं हैं सुरक्षा कवच
एम्बैंकमेंट यानी तटबंध को लेकर रिपोर्ट के आंकड़े एक स्थापित धारणा को चुनौती देते हैं। आमतौर पर तटबंधों को सुरक्षा कवच माना जाता है, लेकिन सर्वे के अनुसार एम्बैंकमेंट के बाहर या दो एम्बैंकमेंट के बीच फंसे इलाकों में रहने वाले परिवारों का कुल नुकसान 80.5 करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले एम्बैंकमेंट के भीतर बसे परिवारों का नुकसान लगभग 13 करोड़ रुपये आंका गया। यह अंतर बताता है कि तटबंध कई मामलों में जोखिम को कम करने के बजाय उसे स्थानांतरित कर देते हैं और कुछ क्षेत्रों में नुकसान का बोझ असमान रूप से बढ़ जाता है।
संपत्ति नहीं लेकिन नुकसान ज्यादा
रिपोर्ट सामाजिक समूहों के आधार पर नुकसान का विश्लेषण भी करती है। सामान्य वर्ग के परिवारों का औसत आर्थिक नुकसान सबसे अधिक पाया गया, क्योंकि उनके पास भूमि, पक्के मकान और अन्य संपत्तियां अपेक्षाकृत अधिक हैं। लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवारों का नुकसान मूल्य में भले कम दिखे, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि उनकी पहले से कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण यही नुकसान उनके लिए अनुपातिक रूप से कहीं अधिक विनाशकारी साबित होता है। इसे रिपोर्ट एसेसमेंट बेस्ट वलनरेबिलिटी पैराडॉक्स के रूप में चिन्हित करती है, जहां कम आंकड़े अधिक सामाजिक असुरक्षा छुपाए रहते हैं।
बाहर की कमाई, घर के गिरवी गहने
बाढ़ का तात्कालिक असर केवल संपत्ति तक सीमित नहीं रहा। सर्वे में शामिल 82 प्रतिशत से अधिक परिवारों को किसी न किसी रूप में विस्थापन झेलना पड़ा। 91 प्रतिशत परिवारों ने भोजन की मात्रा घटाई, 83 प्रतिशत ने जमा अनाज पर निर्भरता बढ़ाई और 75 प्रतिशत परिवारों को रिश्तेदारों या पड़ोसियों से भोजन उधार लेना पड़ा। ये आंकड़े बताते हैं कि बाढ़ के बाद खाद्य सुरक्षा सबसे पहली और सबसे व्यापक चुनौती बनकर उभरी।
जीवित रहने की रणनीतियां इस संकट की गहराई को और स्पष्ट करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 68 प्रतिशत परिवारों के लिए प्रवासी मजदूरी से आने वाली आय बाढ़ के बाद सबसे अहम सहारा बनी। इसके साथ ही 35 प्रतिशत परिवारों ने गहने गिरवी रखे, 25 प्रतिशत ने पशु बेचे या गिरवी रखे और करीब 10 प्रतिशत परिवारों को जमीन गिरवी रखने या बेचने पर मजबूर होना पड़ा। ये कदम तात्कालिक राहत तो देते हैं, लेकिन दीर्घकालिक रूप से परिवारों की आर्थिक रीढ़ कमजोर कर देते हैं।
महिला मुखिया संवेदनशील
महिला मुखिया वाले परिवारों की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील पाई गई। भले ही उनका औसत आर्थिक नुकसान पुरुष मुखिया वाले परिवारों से थोड़ा कम हो, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि उन्होंने अनुपातिक रूप से अधिक संख्या में गहने गिरवी रखे और सामाजिक नेटवर्क पर निर्भर रहने की रणनीति अपनाई। इसका अर्थ यह है कि पुनर्निर्माण और पुनर्बहाली की प्रक्रिया उनके लिए अधिक जटिल और असुरक्षित है।
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि औपचारिक वित्तीय सुरक्षा लगभग न के बराबर है। करीब 80 प्रतिशत परिवारों को किसी भी प्रकार की बाढ़ बीमा योजना की जानकारी या पहुंच नहीं थी। नतीजतन, नुकसान का लगभग पूरा बोझ परिवारों को स्वयं उठाना पड़ा। यह स्थिति बाढ़ को एक अस्थायी आपदा के बजाय दीर्घकालिक गरीबी के जोखिम में बदल देती है।
सामुदायिक बैठकों और सहभागितापूर्ण बाढ़ मानचित्रण से यह भी सामने आया कि प्रभावित लोग केवल पीड़ित नहीं हैं, बल्कि समाधान के स्पष्ट सुझाव रखते हैं। उन्होंने नावों की अग्रिम तैनाती, ऊंचे और बाढ़-रोधी घर, पशुओं के लिए सुरक्षित आश्रय, ऊंचे जलस्रोत और शौचालय, तथा स्थानीय स्तर की चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत बताई। रिपोर्ट का संकेत है कि यदि इन स्थानीय अनुभवों को नीति-निर्माण में शामिल किया जाए, तो बाढ़ प्रबंधन अधिक प्रभावी और न्यायसंगत हो सकता है।
रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि बिहार में बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक संरचनात्मक और सामाजिक संकट है, जिसमें तटबंध नीति, भूमि उपयोग, सामाजिक असमानता और जलवायु परिवर्तन एक साथ काम कर रहे हैं। 2024 की बाढ़ ने दिखा दिया है कि औसत और समेकित आंकड़े हकीकत को छुपा देते हैं। अगर नीति-निर्माण को सचमुच लोगों की जिंदगी बदलनी है, तो उसे घर-स्तर के इन आंकड़ों से होकर गुजरना होगा।
सर्वेक्षण के आंकड़े
इस सर्वेक्षण में 2290 परिवारों के 8,685 व्यक्ति शामिल किए गए। यह आंकड़ा न्यूनतम आवश्यक नमूने से बीस गुना अधिक है, जो डेटा को मजबूत और सांख्यिकीय रूप से विश्वसनीय बनाता है।
बाढ़ ने खाद्य उपलब्धता और पहुंच में समस्या पैदा की। लगभग 91 फीसदी परिवारों ने बाढ़ के दौरान भोजन की मात्रा घटा दी, 83.67 फीसदी ने संग्रहित अनाज खाया, जबकि 75 फीसदी ने रिश्तेदारों या पड़ोसियों से भोजन उधार लिया, जो अनौपचारिक सामाजिक सुरक्षा जाल पर निर्भरता को दर्शाता है। कुल सर्वेक्षण किए गए परिवारों में लगभग 82.18% विस्थापित हुए। आप्रवास की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि 68.43% परिवारों ने सहनशीलता रणनीति के रूप में रेमिटेंस (प्रेषित धन) पर निर्भर किया।
आपातकालीन बिक्री व्यापक थी। 35.07 फीसदी ने आभूषण गिरवी रखे, 24.93% ने या तो पशुधन गिरवी रखा या बेचा, 9.69 फीसदी ने जमीन गिरवी रखी, और 4.02 फीसदी ने जमीन बेच दी। ये रणनीतियां अस्थायी जीवनयापन तो प्रदान करती हैं, लेकिन परिवारों की उत्पादक क्षमता को कमजोर करती हैं, जिससे उन्हें दीर्घकालिक गरीबी और निर्भरता में फँसा देती हैं।
पिछड़े समूहों द्वारा अपनाई गई मुकाबला रणनीतियाँ वास्तव में दीर्घकालिक पुनर्वास में बाधक साबित हुईं। एसटी परिवारों में, 36% ने जीवित रहने के लिए जमीन गिरवी रखी और 56% ने पशुधन गिरवी रखा। इसके विपरीत, सामान्य परिवारों ने, भले ही आर्थिक हानि अधिक हुई हो, कम गंभीर रणनीतियों की सूचना दी, जिससे सामाजिक नेटवर्क और ऋण तक उनकी बेहतर पहुंच का पता चलता है, और वे तेजी से पुनर्प्राप्ति कर सकते हैं।
महिला-प्रधान परिवार (एफएचएच) और पुरुष-प्रधान परिवार (एमएचएच) दोनों ने बाढ़ के दौरान समान मुकाबला रणनीतियां अपनाईं, जैसे भोजन की कमी, उधार लेना और संग्रहित अनाज पर निर्भर रहना। हालांकि, महिला मुखिया अधिक वित्तीय रूप से असुरक्षित रहे, अक्सर आभूषण बेचने या गिरवी रखने पर निर्भर रहे (क्रमशः 17% और 38%, जबकि पुरुष मुखिया में 10% और 35%। महिला मुखिया ने भोजन के लिए रिश्तेदारों पर अधिक निर्भरता दिखाई (80% बनाम 74%)। पुरुष मुखिया में अप्रवास (49% बनाम 44%) और उत्पादक संपत्ति जैसे पशुधन बेचने की थोड़ी अधिक प्रवृत्ति थी (19% बनाम 16%)।
हालांकि एमएचएच की तुलना में एफएचएच ने अपेक्षाकृत कम आर्थिक हानि झेली, फिर भी बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण और पुनर्प्राप्ति के प्रयास समान रूप से तीव्र रहे। यह उनके आर्थिक बोझ की गंभीरता को दर्शाता है, जिसे वे अक्सर अलग और सीमित मुकाबला रणनीतियों के माध्यम से संभालती हैं।
बीमा प्रणाली लगभग पूरी तरह अनुपस्थित थी। लगभग 80% परिवार या तो किसी भी प्रकार के बाढ़ बीमा से अनजान थे या उन्हें इसकी पहुंच नहीं थी, जिससे प्रभावित परिवार पूरी तरह से उधार धन पर निर्भर रहे।

