भारतीय महिलाओं में खून की कमी के लिए जिम्मेवार है बढ़ता प्रदूषण

पीएम 2.5 में प्रति 10 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर की वृद्धि भारत में 15 से 49 वर्ष की युवतियों और महिलाओं में एनीमिया के प्रसार को 7.63 फीसदी तक बढ़ा सकती है।
भारतीय महिलाओं में खून की कमी के लिए जिम्मेवार है बढ़ता प्रदूषण

भारत में 15 से 49 वर्ष की आयु की करीब 53.1 फीसदी महिलाएं और युवतियां ऐसी हैं जो खून की कमी और एनीमिया का शिकार हैं। देखा जाए तो भारत में जितनी फीसदी महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त है वो वैश्विक औसत से भी 20 फीसदी ज्यादा है। आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत उन देशों में शामिल हैं जहां 15 से 49 वर्ष की युवतियों और महिलाओं में एनीमिया का प्रसार सबसे ज्यादा है।

शोध के मुताबिक शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में एनीमिया का प्रसार कहीं ज्यादा है। राज्यों में भी जहां नागालैंड में 22.6 फीसदी 15 से 49 वर्ष की महिलाएं और युवतियां एनीमिया से ग्रस्त थी वहीं झारखंड में यह आंकड़ा 64.4 फीसदी तक दर्ज किया गया था।

ऐसे में यह गंभीरता से सोचने का विषय है कि ऐसा क्या है जो इतनी बड़ी संख्या में देश की महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं, जोकि उनके जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। भारत में खान-पान में पोषण की कमी इसकी एक वजह है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में बढ़ता वायु प्रदूषण भी इस समस्या को और बढ़ा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एनीमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त में मौजूद लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या या हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम हो जाती है। गौरतलब है कि शरीर में ऑक्सीजन प्रवाह के लिए हीमोग्लोबिन की आवश्यकता होती है।

ऐसे में यदि शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं और पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं है, तो उसकी वजह से शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन ले जाने के लिए रक्त की क्षमता कम हो जाती है। इसके कारण थकान, कमजोरी, चक्कर आना और सांस लेने में तकलीफ जैसे समस्याएं हो सकती हैं, कई मामलों में तो यह कमी जानलेवा भी हो सकती है।

हाल ही में इसपर इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) दिल्ली के शोधकर्ताओं की अगुवाई में एक अध्ययन किया गया है जिससे पता चला है कि वायु प्रदूषण और उसमें मौजूद प्रदूषण के महीन कण जिन्हें हम पीएम 2.5 के नाम से जानते हैं उनके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से एनीमिया का खतरा बढ़ सकता है।

शोधकर्ताओं ने इसे समझने के लिए एक मिश्रित मॉडल का उपयोग किया है जिसमें विश्लेषण से पता चला है कि पीएम 2.5 में प्रति 10 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर की वृद्धि भारत में 15 से 49 वर्ष की युवतियों और महिलाओं में एनीमिया के प्रसार को 7.63 फीसदी तक बढ़ा सकती है।

शोध के मुताबिक लम्बे समय तक पीएम2.5 के उच्च स्तर के संपर्क में रहने के कारण ऑक्सीडेटिव तनाव की वजह से सूजन और जलन पैदा हो जाती है जो शरीर में आयरन के प्रसार और अवशोषण को बाधित करता है। इसकी वजह से शरीर में हीमोग्लोबिन बनने के लिए जरूरी आयरन की कमी हो जाती है जो एनीमिया का कारण बनती है।

प्रदूषण की रोकथाम से 14 फीसदी तक घट सकता है एनीमिया का प्रसार

शोधकर्ताओं ने जो विश्लेषण किए हैं उनसे पता चला है कि यदि भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी वायु गुणवत्ता मानक 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर को हासिल कर लेता है तो उससे देश में एनीमिया का प्रसार 53 फीसदी से घटकर 39.5 फीसदी हो जाएगा। मतलब की देश में वायु गुणवत्ता में सुधार करके एनीमिया का प्रसार को 14 फीसदी तक कम किया जा सकता है। इतना ही नहीं शोध में यह भी सामने आया है कि इसकी वजह से देश में करीब 186 जिले एनीमिया के लिए 35 फीसदी के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल कर लेंगें।

जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित इस रिसर्च से यह भी पता चला है कि वायु प्रदूषण के रूप में कार्बनिक और धूल कणों की तुलना में सल्फेट और ब्लैक कार्बन एनीमिया के प्रसार के लिए कहीं ज्यादा जिम्मेवार हैं। शोध के मुताबिक देश में बढ़ते पीएम2.5 के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार उद्योग हैं। वहीं इसके साथ-साथ बिजली, असंगठित क्षेत्र और घरों से हो रहा प्रदूषण, सड़कों की धूल, कृषि अपशिष्ट जलाने और परिवहन के कारण भी देश में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ रहा है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक देश में वायु प्रदूषण में कटौती और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने से 'एनीमिया मुक्त' मिशन के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में तेजी आएगी।

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