क्या होता है डबल म्यूटेंट वायरस, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कितना है खतरनाक?

डबल म्यूटेंट शब्द वायरस के एक नए संस्करण को बताता है जिसमें पहले से पहचाने गए दो वेरिएंट की विशेषताएं होती हैं
क्या होता है डबल म्यूटेंट वायरस, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कितना है खतरनाक?
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हाल ही में एक खबर सामने आई थी जिसमें कहा गया था भारत में मिला कोरोनावायरस 'डबल म्यूटेंट' है। खबर भारत से जुड़ी है तो सोचना लाजिमी ही है, वैसे भी यह  स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है ऊपर से कोविड-19 से, जिससे पूरी दुनिया त्रस्त है। ऐसे में वायरस के बारे में सामने आई कोई भी नई जानकारी बहुत मायने रखती है। क्या होता है यह 'डबल म्यूटेशन'? कितना खतरनाक है यह हमारे लिए? तो आइये जानने की कोशिश करते हैं कुछ ऐसे ही बुनियादी सवालों के जवाब: 

क्या होता है ‘डबल म्यूटेंट’ वायरस?

यदि वैज्ञानिकों की मानें तो "डबल म्यूटेंट" शब्द वायरस के एक नए संस्करण को बताता है जिसमें पहले से पहचाने गए दो वेरिएंट की विशेषताएं होती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों की मानें तो डबल म्यूटेंट की कोई वैज्ञानिक परिभाषा नहीं है। यह बस एक अन्य म्यूटेंट है जो उस जगह के लिए नया है। 

भारत में कब सामने आया था यह ‘डबल म्यूटेंट’ वायरस?

यह म्यूटेंट भारतीय सार्स कोव-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम द्वारा भारत में मौजूद कोरोना वायरस के बारे में जानने के लिए किए गए जीनोम सीक्वेंसिंग में सामने आया था। इस जीनोम सीक्वेंसिंग से देश में कोरोना वायरस के 771 चिंताजनक और एक नए तरह के वैरिएंट का पता लगा है। इसमें ब्रिटेन के वायरस बी.1.1.7 के 736 पॉजिटिव नमूने, दक्षिण अफ्रीकी वायरस लिनिएज (बी.1.351) के 34 पॉजिटिव नमूने और ब्राजील लिनिएज (पी.1) वायरस का एक नया मामला सामने आया था। उसके साथ ही महाराष्ट्र से जो नमूने लिए थे उनमें ई484क्यू और एल452आर म्यूटेशन के अंशों वाला म्यूटेंट मिला था जिसे ‘डबल म्यूटेंट’ कहा जा रहा है। 

क्या और कैसे होता है म्युटेशन?

कोई भी जीव यहां तक की वायरस भी जब नए वातावरण और परिवेश में जाता है तो यह उसकी सहज वृति होती है कि वो अपने आप को उसके मुताबिक ढालने की कोशिश करता है। जिससे वो जीवित रह सके और अपना विकास कर सके। जब वातावरण में यह बदलाव बड़ी तेजी से होते हैं तो यह अनुकूलन म्यूटेशन के रूप ले लेता है। जिसके कारण जीवों के जीनोम में बदलाव आ जाता है। जिससे जीवों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के बदलाव आ सकते हैं। 

क्या यह ‘डबल म्यूटेंट’ वायरस स्वास्थ्य के नजरिए से खतरनाक है?

भारत में मिला यह "डबल म्यूटेंट" वायरस कितना खतरनाक है इस बारे में अभी कुछ भी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि महाराष्ट्र से लिए गए नमूनों के विश्लेषण से पता चला है कि दिसंबर 2020 की तुलना में ई484क्यू और एल452आर म्यूटेशन के अंशों वाले नमूनों में वृद्धि हुई है। इस प्रकार का म्यूटेशन दर्शाता है कि यह वायरस शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से बचने में कारगर है। साथ ही इसका प्रभाव भी पहले से कहीं अधिक है। 

यह म्यूटेशन वहां लगभग 15 से 20 फीसदी नमूनों में पाए गए हैं। लेकिन भारत में एक बार फिर जिस तरह मामलों में वृद्धि हो रही है उसमें इस म्युटेंट का कोई हाथ है इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस बाबत सही स्थिति का पता लगाने के लिए जीनोम सिक्वेंसिग और शोध अभी भी जारी हैं। 

क्या वायरस के म्युटेशन में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे विनाश की भी कोई भूमिका है?

यह वायरस बदलती परिस्थितियों में अपने आप को ढालने की कोशिश करते हैं पर जिस तरह से जंगलों का विनाश हो रहा है। जलवायु में बदलाव आ रहा है यह बदलाव उनमें म्युटेशन के रूप में सामने आ रहा है। काफी हद तक हम भी उसके लिए जिम्मेवार हैं। हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी बी में प्रकाशित एक शोध से पता चला है कि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि, जीवों में हो रहे नए म्यूटेशन्स को कहीं ज्यादा खतरनाक बना सकती है। ऐसा जीवों के प्रोटीन फंक्शन पर पड़ रहे हानिकारक प्रभावों के कारण  हो रहा है।। इसके कारण जीवों के जीनोम में बदलाव आ जाता है। यह नए परिवेश में इन जीवों के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन कई बार यह म्युटेशन जीवों पर नकारात्मक असर भी डाल सकता है।

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