शहरों में सीवेज ढो रहा अस्पतालों का रोगजनक बैक्टीरिया, एजिथ्रोमाइसिन जैसी प्रचलित एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने का खतरा

नेचर जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, यमुना में भी आस-पास के शहरों से बह कर जा रही एंटीबोयोटिक दवाओं के अवशेष
गंगा में अब भी बड़े पैमाने पर अनुपचारित सीवेज सीधे डाला जा रहा है जो इसके प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है (फोटो: विकास चौधरी)
गंगा में अब भी बड़े पैमाने पर अनुपचारित सीवेज सीधे डाला जा रहा है जो इसके प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है (फोटो: विकास चौधरी)
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हमारे शहरों का सीवेज अब सिर्फ गंदगी ढोने का काम नहीं कर रहा, बल्कि खतरनाक बैक्टीरिया को मजबूत बनाने की जगह बन गया है। एक नए हालिया शोध से पता चलता है कि नालियों और सीवर में मौजूद एंटीबायोटिक दवाओं के अंश बैक्टीरिया को इस तरह की “ट्रेनिंग” दे रहे हैं, जिससे वह दवाओं के असर से बचना सीख रहे हैं। इससे भारत में बहुत ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एजिंथ्रोमाइसिन जैसी एंटी बैक्टीरियल दवाओं के बेअसर होने का खतरा बढ़ गया है। सीवेज में मौजूद बैक्टीरिया बाद में अस्पतालों में मिलने वाले संक्रमणों जैसे ही बन जाते हैं। इसका मतलब है कि बीमारी और दवा बेअसर होने की समस्या सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे आसपास बहते सीवेज से जुड़ी हुई है।

यह खुलासा नेचर जर्नल पर प्रकाशित शोध "एंटीबायोटिक कंटेमिनेशन एंड एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस डायनेमिक्स इन द अर्बन सीवेज माइक्रोबायोम इन इंडिया" में किया गया है। 

शोध के मुताबिक, यमुना नदी में भी आस-पास के शहरी अस्पतालों से ऐसे संक्रमणकारी बैक्टीरिया पहुंच रहे हैं। इसके अलावा  कुछ एंटीबायोटिक दवाएं, जैसे अमॉक्सिसिलिन, सीवेज में इतनी मात्रा में मिली कि यह बैक्टीरिया के बीच जीनों का आदान-प्रदान बढ़ा सकती है। यानी बैक्टीरिया आसानी से दवा-रोधी जीन एक-दूसरे को दे सकते हैं।

शोध के मुताबिक, ज्यादातर प्रतिरोधी जीन (एआरजी) उन दवाओं से जुड़े थे जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती हैं, जैसे बीटा-लैक्टम और एमिनोग्लाइकोसाइड। खास बात यह है कि एमिनोग्लाइकोसाइड प्रतिरोधी जीन सीवेज में क्लिनिकल यानी अस्पताल के नमूनों की तुलना में 50% ज्यादा मिले। इसका मतलब यह भी है कि ये जीन सिर्फ इंसानों से नहीं, बल्कि पोल्ट्री, मछली पालन और अन्य पशु या कृषि स्रोतों से भी सीवेज में आ रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने यह जानने के लिए कि एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया देश भर में कितने फैले हैं और शहर में कैसे फैलते हैं, घनी आबादी वाले औद्योगिक शहर फरीदाबाद के पांच सामुदायिक स्थानों और दो अस्पतालों से बार-बार सीवेज के नमूने लिए। यहां की खुली नालियां, परि-शहरी सीवेज चैनल और अस्पतालों के अपशिष्ट अक्सर सही तरीके से साफ नहीं किए जाते और सीधे यमुना नदी में मिल जाते हैं, जिससे शहर के बाहर भी लोगों के लिए स्वास्थ्य का खतरा बढ़ जाता है।  

जब वैज्ञानिकों ने फरीदाबाद के सीवेज में बैक्टीरिया का वंशानुगत (फाइलोजेनेटिक) विश्लेषण किया तो पाया कि यह वैसे ही प्रकार (सीक्वेंस टाइप) के बैक्टीरिया थे जैसे दुनिया भर के अस्पतालों में 2019 से 2023 तक संक्रमण पैदा करने वाले पाए गए थे। वैज्ञानिकों ने अपशिष्ट जल और क्लिनकल संक्रमण में एक जैसे सीक्वेंस टाइप बैक्टीरिया ई. कोलाई (एसटी 167 और एसटी410), के. न्यूमोनीए (एसटी 15 और एसटी 37), और ऐसिनेटोबैक्टर बौमानी (एसटी2) जैसी वंशावलियां दोनों जगह पाई गईं। 

यानी फरीदाबाद के गंदे पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया अस्पतालों में पाए जाने वाले खतरनाक बैक्टीरिया जैसे ही हैं और यह किसी भी समय इंसानों में संक्रमण फैला सकते हैं।

नेचर जर्नल इंडिया में  इस शोध से जुड़े एक प्रकाशित लेख में  शोध के वरिष्ठ लेखक भाबातोष दास के हवाले से कहा गया है, “हमने सीवेज में एंटीबायोटिक की सांद्रता और एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी रोगजनकों की प्रचुरता के बीच सीधा संबंध दिखाया है।”  दास, हरियाणा के फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट (टीएचएसटीआई) के माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं। 

प्रमुख शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान यह भी  देखा कि सीवेज में कौन-कौन से बैक्टीरिया मौजूद हैं और उनमें ऐसे कौन से जीन हैं जो दवाओं को बेअसर बना देते हैं। यानी उन्होंने यह “ट्रैक” किया कि गंदे पानी में रहने वाले बैक्टीरिया कैसे बदल रहे हैं, आपस में दवा-रोधी ताकतें कैसे बांट रहे हैं और किन हालात में यह बैक्टीरिया ज्यादा खतरनाक बनते जा रहे हैं।

शोध अध्ययन करने वाली टीम ने जून से दिसंबर 2023 के बीच भारत के छह राज्यों से एकत्र किए गए सैकड़ों सीवेज नमूनों का विश्लेषण किया। इसमें सामुदायिक सीवेज और अस्पतालों के अपशिष्ट दोनों से एंटीबायोटिक अवशेषों, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन (एआरजी) और सूक्ष्मजीवी समुदायों की ट्रैकिंग की गई। उन्होंने सात दवा वर्गों की 11 व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं पाईं। 

एआरजी यानी एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन ऐसे जीन होते हैं जो बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक दवाओं के असर से बचने की क्षमता देते हैं। यह जीन बैक्टीरिया को दवा को बेअसर करने, उसे कोशिका से बाहर निकालने या उसके प्रभाव को सहने में मदद करते हैं। चिंता की बात यह है कि बैक्टीरिया यह जीन आपस में साझा भी कर सकते हैं, खासकर सीवेज जैसे वातावरण में, जिससे साधारण बैक्टीरिया भी जल्दी दवा-रोधी और ज्यादा खतरनाक बन जाते हैं।

जिन-जिन सीवेज नमूनों की जांच की गई, उनमें से 67 प्रतिशत नमूनों में कनेमाइसिन और 56 प्रतिशत नमूनों में एजिथ्रोमाइसिन नाम की एंटीबायोटिक दवाओं के अंश पाए गए। यानी आधे से ज्यादा शहरों के गंदे पानी में ये दवाएं मौजूद थीं। इससे संकेत मिलता है कि ये एंटीबायोटिक दवाएं बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रही हैं और शरीर, अस्पतालों या अन्य स्रोतों से निकलकर सीवेज में पहुंच रही हैं, जहां वह बैक्टीरिया को दवाओं के खिलाफ और मजबूत बनने का मौका देती हैं।

 शोध में पाया गया कि सीवेज में ऐसे जीन (एमपीएचए, एमपीएचई, एमएसआरई) बड़ी मात्रा में मौजूद हैं जो इस दवा को बेअसर कर देते हैं या बैक्टीरिया के अंदर से बाहर निकाल देते हैं ,जिससे दवा काम नहीं करती। इसके अलावा एक और जीन (ईआरएमबी), जो दवा के असर वाली जगह (राइबोसोम) को ही बदल देता है, वह खासतौर पर अस्पतालों से जुड़े गंदे पानी में बार-बार पाया गया। इसका मतलब है कि एजिथ्रोमाइसिन जैसी बहु प्रचलित दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध अब आम होता जा रहा है, खासकर अस्पतालों के आसपास।

शोध अध्ययन में 16 एंटीबायोटिक वर्गों के प्रति प्रतिरोध प्रदान करने वाले 170 अलग-अलग एआरजी की पहचान हुई है।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध कितना फैला है और कितना जटिल है, यह समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरीकों का सहारा लिया। उन्होंने जल्दी पहचान करने वाली टेस्ट स्ट्रिप्स से दवा-रोधी जीन खोजे (डिपस्टिक अस्से), खास मशीनों (लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री) से यह मापा कि गंदे पानी में कितनी एंटीबायोटिक मौजूद है। और सैकड़ों नमूनों का डीएनए पढ़कर (मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग) से  यह जाना कि उनमें कौन-कौन से बैक्टीरिया और जीन हैं । इसके अलावा बैक्टीरिया को लैब में पैदा करके (कल्चुरोमिक्स) के जरिए भी उनकी जांच की गई। इस पूरी प्रक्रिया में 964 बैक्टीरियल आइसोलेट्स मिले । इनमें से 681 बैक्टीरिया को 10 वर्गों की अलग-अलग 32 एंटीबायोटिक दवाओं से परखा गया और चौंकाने वाली बात यह थी कि लगभग सभी (करीब 94 प्रतिशत) बैक्टीरिया 10 से ज्यादा दवाओं के असर से बचने में सक्षम थे।

शोध के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने 305 बैक्टीरिया के एक छोटे समूह का पूरा डीएनए (जीनोम) पढ़ा, जैसे किसी किताब को लाइन-बाय-लाइन पढ़ना। इससे उन्हें पता चला कि कौन-कौन से जीन (एंटीबायोटिक प्रतिरोध बनाने वाले) मौजूद हैं और ये जीन डीएनए के  कौन से हिस्से में बैठे हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि यह  बैक्टीरिया 16 अलग-अलग परिवारों (जीन्स) और 31 प्रजातियों से थे। इसमें कुछ ऐसे रोगजनक भी शामिल थे जो इंसानों में गंभीर संक्रमण पैदा करते हैं, इनमें एशेरिचिया कोली (ई. कोली), क्लेब्सिएला निमोनिये ( के निमोनिये), मोर्गेनेला मोरगानी (एम. मोरगानी) और एंटेरोकोकस फेसियम (ई. फेसियम) शामिल थे।

इस तरह वैज्ञानिक न सिर्फ यह जान पाए कि कौन-कौन से बैक्टीरिया मौजूद हैं, बल्कि यह भी समझ पाए कि उनमें एंटीबायोटिक प्रतिरोधी ताकतें कैसे और कहां मौजूद हैं और कौन-कौन से खतरनाक रोगजनक भी हैं।

नेचर जर्नल में प्रकाशित शोध से जुड़े एक लेख में दास के हवाले से कहा गया है, “हम सीवेज और अस्पतालों के बीच सक्रिय परिसंचरण देख रहे हैं। सीवेज एक्सटेंसिवली ड्रग रजिस्टेंस (एक्सडीआर) रोगजनकों के उभरने और प्रसार का एक भंडार बनता जा रहा है।”

एक्सडीआर यानी अत्यधिक दवा-प्रतिरोधी रोगजनक। आसान शब्दों में यदि इसे समझें तो  कुछ ऐसे बैक्टीरिया जो बहुत सारी एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी हो जाते हैं।

नेचर इंडिया में प्रकाशित लेख में  बेंगलुरु स्थित टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी में रोग पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय निगरानी का नेतृत्व करने वाली फराह इश्तियाक के हवाले से कहा गया है, “सीवेज में एएमआर जीन अपेक्षित हैं, लेकिन उन्हें सीधे एंटीबायोटिक की सांद्रता से जोड़ना पर्यावरणीय निगरानी के पक्ष को मजबूत करता है, खासकर ऐसे देश में जहां एंटीबायोटिक उपयोग का नियमन कमजोर है।” 

वह आगे कहती हैं,“यदि हम पर्यावरणीय प्रतिरोध को रोकना चाहते हैं, तो सीवेज उपचार के तरीकों को बदलना और तकनीक को उन्नत करना आवश्यक है।”

भारत की विशिष्ट सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी और प्रतिरोध मार्गों को देखते हुए, शोधकर्ता स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध के विकास को ट्रैक करने के लिए एक स्वदेशी एआरजी संदर्भ डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं। 

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