डॉ अरुण कुमार महावीर कैंसर संस्थान में प्रमुख शोधार्थी हैं
डॉ अरुण कुमार महावीर कैंसर संस्थान में प्रमुख शोधार्थी हैं

ऐसे घुल रही भारी धातु

लंबे समय तक शरीर में डिपॉजिशन से शरीर में कैंसर पैदा हो रहा है
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गंगा के किनारे 18 जिलों में कंट्रोल ग्रुप में हर जिले से 40 महिलाओं के ब्लड और यूरिन, हेयर और नेल का सैंपल एकत्र किया था। इसका मकसद यह पता करना था कि प्रतिदिन कितना केमिकल ब्रेस्ट मिल्क में जा रहा है और कितना बच्चों के यूरीन से निकल रहा है। 2021 में इस परियोजना की शुरुआत की थी और 2024 में इसे पूरा किया। हम प्रमुख तौर पर तीन प्रमुख आर्सेनिक, मर्करी और लेड की जांच कर रहे थे।

हमें पता चला कि खान-पान से खासतौर से चावल, गेहूं का आटा, दाल और सब्जी में आलू में भी इन सभी हैवी मेटल्स मिले। इनको प्रतिशत में अगर कहें तो 30 से 40 फीसदी तक हैवी मेटल के अंश मिले। यह बहुत ज्यादा नहीं था। हालांकि, लंबे समय तक प्रदूषित अनाज और पेयजल से यह माताओं के शरीर में जा रहा है जबकि ऐसे शिशु जो स्तनपान कर रहे थे उनमें कुछ बच्चों में ग्रोथ में कमी दिखी।

इसका जो सबसे संभावित असर है वह बच्चों के कॉगनेटिव यानी संज्ञानात्मक शक्ति पर है। इस दौरान हमने यह भी देखा था कि कुछ भूजल नमूनों में हमें यूरेनियम की सांद्रता मिली थी। इसके बाद हमने यह सोचा कि इनमें से 40 ब्रेस्टमिल्क नमूनों की जांच में यूरेनियम की सांद्रता जांची जाए। हमें ब्रेस्टमिल्क में कुछ न कुछ यूरेनियम-238 के अंश मिले। हालांकि इसके दुष्परिणाम अभी ग्राउंड पर नहीं दिखाई दिए। कई अध्ययन जो यूरेनियम पर हैं, वह यह दिखाते हैं कि यदि लंबे समय तक यूरेनियम ब्रेस्टमिल्क के जरिए बच्चों में जाता है तो वह हड्डियों में डिपॉजिट हो सकता है और बच्चों की बुद्धिमत्ता पर असर डाल सकता है।

इसके अलावा किडनी फेल्योर की समस्या भी देखी गई है। हालांकि, अभी बिहार में मिले लेवल्स एक फाइंडिंग भर हैं। इसे और विस्तृत रूप देने के लिए कई लाख माताओं के ब्रेस्टमिल्क के अध्ययन की आवश्यकता है। खासतौर से सीजीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे राज्य जहां पानी में यूरेनियम मिला है वहां भी ऐसा अध्ययन जरूरी है। मैं 18 सालों से आर्सेनिक की जांच कर रहा हूं और मेरा मानना है कि हिमायल से आने वाली नदियां गाद के रूप में आर्सेनिक लेकर आ रही हैं और गाद का जहां-जहां फैलाव हो रहा है वहां-वहां आर्सेनिक का डिपॉजिशन हो रहा है।

बाद में यह हमारे शरीर में डिपॉजिट होकर इम्यूनिटी को कमजोर करने लगता है। शरीर धीरे-धीरे रोगग्रस्त होजाता है और लंबे समय में (10 से 15 साल) में यह कैंसर में बदल जाता है। यह भी ऑब्जर्व हुआ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारी का बोझ बढ़ रहा है और इसका लिंक कहीं न कहीं आर्सेनिक, मर्करी, लेड जैसे हैवी मेटल्स हैं।

(लेखक महावीर कैंसर संस्थान में प्रमुख शोधार्थी हैं)

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